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आत्मा का शोक

aatma ka shok

गरिमा सिंह

गरिमा सिंह

आत्मा का शोक

गरिमा सिंह

और अधिकगरिमा सिंह

    टूटने और उखड़ने के बाद,

    ‘मृत्यु’ के भयानक दंश को झेलते हुए,

    ‘आत्महत्या’ की चीख़;

    जब ख़ुद के भीतर से सुनाई देती है—

    तब आप लगभग मर चुके होते हैं!

    जीवन बोझ बनकर,

    बैताल की तरह—

    पीठ पर लद जाता है;

    और ज़िम्मेदारियाँ,

    किसी अबोध बच्चे की तरह—

    उँगली थामे साथ चलती हैं;

    इन्हीं जीवन और ज़िम्मेदारियों के बीच—

    ‘मृत्यु’ भी कहीं चिपकी रहती है!

    सुख से पूर्ण जीवन में,

    दु:ख की कहीं भी

    जब छाया नहीं होती;

    तब मृत्यु-बोध का गहन अंधकार—

    कहाँ से उतर आता है?

    ‘मृत्यु’ का विचार—

    जीवन का एक भयानक रस-बोध है!

    मैं ‘मृत्यु’ के गुहा-अंधकार में उतर आईं हूँ…

    ‘विश्वास की एक पतली डोरी’—

    जीवन के इस छोर से उस छोर तक बँधी थी,

    संबंधों के घात-प्रतिघात के थपेड़ों से—

    कमज़ोर होती गई और टूट गई…

    तोड़ने वाले नाम हैं मेरे पास—

    अनगिन तारों की तरह!

    ‘परछाईयाँ’—

    पीछा नहीं छोड़तीं,

    और ‘चुप्पियाँ’-

    तोड़े नहीं टूटतीं,

    एक भयानक अंधकार—

    भीतर जज़्ब होता चला जाता है,

    और जीने की इच्छाएँ—

    जलकर राख़ हो जाती हैं!

    रोशनी चुभती है

    और अंधेरा दुलारता है

    लोग भयानक रूप से—

    डरावने लगते हैं,

    अकेलापन साथी बन जाता है,

    पीड़ा, दु:ख और उदासी

    हृदय से रिसती हुई—

    चेहरे पर इकठ्ठी हो जाती है

    और आँखों से धारासार बरसती हैं!

    ‘निराशाएँ’

    उतरती हैं—

    काले लिबास में;

    और ‘अवसाद’

    ढँक देता है—

    जीवन की समस्त आकांक्षाएँ;

    तब कई रातें—

    उनींदियों में काटी जाती हैं…

    अचानक किसी गहन रात में—

    ‘कोई’ फूट-फूटकर रोता है…

    सैकड़ों काली बिल्लियाँ—

    एक साथ सड़क पर उतर आती हैं…

    और अपनी काली आँखों से—

    मुझे घूरती हुई,

    हजारों बार मेरा रास्ता काटती हैं…

    मैं जानती हूँ—

    कोई नहीं जाएगा इस ओर से;

    लेकिन निर्लिप्त भाव से मैं—

    अपने क़दम उन्हीं रास्तों पर रखती हूँ,

    जिन पर बिल्लियों के पंजों के—

    गहरे निशान हैं…

    चाँद पर धब्बे,

    इतने गहरे हैं कि

    हर बार निराशाएँ,

    राहु की तरह—

    उसे ग्रस लेती हैं…

    रात के सन्नाटे में,

    कई अजीबो-ग़रीब आकृतियाँ—

    मुझे अपनी ओर खींचती हैं…

    मैं हाथ आगे बढ़ाती हूँ—

    लेकिन वह हिल नहीं रहा…

    पैर को ज़मीन पर रखना चाहती हूँ—

    लेकिन वह बिस्तर पर ही जम गया है…

    बगल में सो रहे बच्चे को—

    गले लगाना चाहती हूँ,

    लेकिन ख़ुद को इतनी हल्की महसूस करती हूँ

    कि हवा की तरह ऊपर उठने लगती हूँ…

    एक आदमी है,

    उसे जगाने के लिए मुँह खोलती हूँ,

    लेकिन आवाज़ नहीं निकलती…

    देह में कल से—

    जो अकड़न और दर्द थी;

    वह एकदम से ग़ायब हो गई…?

    इस गहन अंधकार में,

    महसूस कर रही हूँ—

    एक तीखी रोशनी…

    जो मेरे भीतर प्रविष्ट हो रही है…

    ‘देह बंधन है! आत्मा अजर-अमर है!’

    और धीरे-धीरे—

    देह मुक्त हो रही है…

    आत्मा स्वतंत्र है?

    याकि यह

    आत्मा का शोक है!!!

    स्रोत :
    • रचनाकार : गरिमा सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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