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दादर स्टेशन प्लेटफ़ॉर्म क्रमांक चार

dadar steshan pletfaurm krmaank chaar

प्रफुल्ल शिलेदार

प्रफुल्ल शिलेदार

दादर स्टेशन प्लेटफ़ॉर्म क्रमांक चार

प्रफुल्ल शिलेदार

और अधिकप्रफुल्ल शिलेदार

    मैं पुल पर जाने के लिए

    दुखते कंधे गर्दन उँगलियाँ घुटने

    सब की गठरी बाँधकर

    भरी लोकल से हड़बड़ाते हुए उतरकर

    प्लेटफ़ार्म पर उतरे सैकड़ों लोगों के साथ

    सीढ़ीयों की ओर चलने लगता हूँ

    भीड़ की लहरों के साथ सीढ़ी के पायदान तक पहुँच कर

    पुल से उस पार जाने के लिए

    सीढ़ीयाँ चढ़ने लगता हूँ

    चलती गाड़ी में कूदकर खिड़की के पास

    हलकी नींद लेकर फ्रेश हुए मुस्टण्डे भी

    मेरे साथ सीढ़ीयां चढ़ने लगते हैं

    फर्स्ट क्लासवाले सेकंड क्लासवाले

    लगेज डिब्बे से उतरी कोली औरतें, टिफ़िनवाले, सामान वाले

    हैंडीकैप डिब्बे से उतरे अपाहिज, गर्भवती औरतें

    उसी डिब्बे में ज़बरदस्ती घुसे हुए हट्टे-कट्टे

    भीड़ में जगह बनाते पाकिटमार उचक्के लफंगे

    लुच्चे गर्दुले नौकरीपेशा धंधेवाले दुकानदार एजेंट

    सिनेमा सीरियल चैनेल में

    अख़बार में विज्ञापनों में काम ढूँढ़ने वाले

    जिन्हें काम पर जाना है

    जिन्हें कुछ काम नहीं...बेकार फालतू

    थके हुए बूढ़े हिजड़े कच्चे-बच्चे

    मर्दों के साथ-साथ चलती औरतें

    सभी एकाग्र होकर सीढ़ी चढ़ने लगते हैं

    सीढ़ी के पायदान पर

    बराबर पाँव रखने लगते हैं

    एक-एक पाँव भीड़ के धक्के से

    अगली पायदान पर डालते हुए

    नि:शब्द होकर एक लय में सीढ़ी चढ़ने लगते हैं

    कुछ क्षणों के लिए

    सीढ़ी चढ़ने का

    एक भव्य म्यूरल बन जाता हैं

    जी को मानों सदियों से प्यास लगी हो

    इसी तरह सभी सीढ़ीयों की ओर चले आते हैं

    सीढ़ी चढ़ना सब के लिए साधना होती है

    विपश्यना होती हैं प्रेयर होती है इबादत होती है

    अंतर्मुख होकर लिया हुआ

    आत्मशोध होता है

    भीड़ में मेरे अपने एकांत से

    सैकड़ों लावारिस एकांत लाग-लपेट करने लगते हैं

    सीढ़ी चढ़ने का दृश्य भव्य कोरस बनकर

    मेरे एकांत को पार्श्वसंगीत देने लगता हैं

    किसी भी निर्देशक की सूचनाओं के बगैर

    सीढ़ी चढ़ने की क्रिया सभी लोग निपुणता से करते रहते हैं

    सीढ़ी चढ़ना पायदान ख़त्म होने तक ही रहना है

    सीढ़ी चढ़ते समय साथ देने वाली बेजुबान आवाज़ें

    सीढ़ी ख़त्म होते ही दो हिस्सों में बंट जाने वाली है

    सीढ़ी ख़त्म होते ही यह सब लोग

    बाई ओर जाएँगे या दाहिनी ओर मुड़ेंगे

    इस बात से मैं सीढ़ी चढ़ते वक्त बिलकुल बेख़बर हूँ।

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रफुल्ल शिलेदार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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