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अज्ञात नागरिक

agyat nagarik

अनुवाद : सुरेश सलिल

डबल्यू. एच. ऑडेन

डबल्यू. एच. ऑडेन

अज्ञात नागरिक

डबल्यू. एच. ऑडेन

और अधिकडबल्यू. एच. ऑडेन

    (जे एस/07/एम 378 की यादगार के बतौर सरकार की तरफ़ से लगाया गया शिलालेख)

    सांख्यिकी विभाग ने एक ऐसे शख़्स के बतौर उसकी शिनाख़्त की

    जिसके ख़िलाफ़ सरकारी तौर पर कोई शिकायती मामला नहीं दर्ज हुआ

    उसके चालचलन को लेकर सभी रपटें एकमत थीं

    कि पुरानी चलन वाले एक शब्द के आधुनिक अर्थों में वह संत-महात्मा था,

    क्योंकि अपने हरेक काम से उसने व्यापक समुदाय की सेवा की।

    जंग के दिनों को छोड़कर, सेवामुक्त होने के दिन तक

    उसने एक फ़ैक्टरी में काम किया और कभी कोई लफड़ा नहीं किया

    बल्कि 'फ़ज मोटर्स' के अपने मालिकों को अपने काम से ख़ुश रखा,

    तब भी उसने कभी कोई हड़ताल नहीं तोड़ी, वह उनके ख़िलाफ़ था

    बल्कि यूनियन की सूचना के अनुसार, उसने अपनी देनदारी वक़्त से की।

    (हमारी रिपोर्ट यूनियन की सूचना को सही मानती है) और हमारे सामाजिक मनोविज्ञान-कार्मिकों का कहना है

    कि वह अपने साथ के लोगों में लोकप्रिय था

    और गाह-ब-गाह पी-पिला भी लेता था।

    प्रेस वाले कायल हैं कि वह एक अख़बार रोज़ ख़रीदता था

    और यह कि विज्ञापनों को लेकर उसकी प्रतिक्रिया

    एक लिहाज़ से सामान्य हुआ करती थी,

    उसके नाम से ली गई पॉलिसियों से साबित होता है

    कि उसने पूरे तौर पर बीमा कराया हुआ था, और उसके 'हेल्थ कार्ड' से

    पता चलता है कि वह एक बार हस्पताल में भरती हुआ था और

    वहाँ से ठीक होकर बाहर आया था।

    उत्पादकों के शोध विभाग और ऊँचे दर्जे की रिहाइशी चीज़ों का धंधा

    करने वालों में से दोनों के ही ब्योरे बताते हैं

    कि क़िस्त योजना के फ़ायदों को लेकर वह पूरी तरह संजीदा था

    और एक 'मॉडर्न मैन' की ज़रूरियात की सभी चीज़ें उसके पास थीं—

    जैसे कि फ़ोनोग्राफ़, रेडियो, कार, फ्रिजिडेयर और ऐसी ही दूसरी चीज़ें।

    जनमत संबंधी हमारे शोधकर्ता सहमत हैं

    कि साल-दर-साल के घटनाक्रम को लेकर उसके विचार बहुत संतुलित

    हुआ करते थे :

    शांतिकाल में शांति का पक्षधर और जंग के दिनों में सीधे मोर्चे पर।

    वह विवाहित था और पाँच बच्चों का बाप था,

    बच्चों के बारे में संतुलित परिवार-विशेषज्ञ का कहना है

    कि उसकी पीढ़ी के किसी बाप के लिए इतने बच्चे ठीक ही थे।

    और हमारे शिक्षकों का कहना है कि उनके पढ़ाने के तरीक़ों को लेकर

    उसने कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया।

    ...तो यह माना जाए कि वह आज़ाद था? ख़ुश था?

    —यह सवाल ही बेतुका है;

    कुछ भी ग़लत हुआ होता, तो निश्चित रूप से हमारी जानकारी में आता।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 227)
    • रचनाकार : डबल्यू. एच. ऑडेन
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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