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बुनते-बुनते थकने लगी हूँ...

bunte bunte thakne lagi hoon. . .

नीतू गुजराल

नीतू गुजराल

बुनते-बुनते थकने लगी हूँ...

नीतू गुजराल

और अधिकनीतू गुजराल

    सिरों को पिरो के बुनते बुनते थकने लगी हूँ,

    अपनी ही नज़रों में धीमा चलते-चलते गिरने लगी हूँ,

    सवालों की जकड़न के घेरों से बहुत घुटने लगी हूँ,

    जवाबों की रस्सी से बँधी हुई ज़ुबान से बहुत उकताने लगी हूँ,

    अपनी ही शक्ल को बदलने में लगी हूँ,

    अपनी पेशानी की रोशनी को धीमा करने के जतन करने लगी हूँ,

    अंधेरों की दोस्ती को सलामी देने लगी हूँ,

    रोशनी को अलविदा कहने की हिम्मत जुटाने लगी हूँ,

    चाँद सितारों से दूर कहीं तपिश की तमन्ना करने लगी हूँ,

    छाँव से दूर सूरज की जलन में साँसों को सेकने लगी हूँ,

    बड़ी उड़ान को छोड़ छोटी किश्ती में ठिकाना ढूँढ़ने लगी हूँ,

    अपने महासामुद्र के इंतज़ार को किनारे रख के,

    छोटे-छोटे पक्षियों के झुँडों से कतराना छोड़ने लगी हूँ,

    अपनी चमकती आँखों को पर्दों के पीछे छुपाने लगी हूँ,

    मन के गुलाबी मोतियों को समुद्र की तहों में दफ़नाने में जुट गई हूँ,

    आसमान को छोटा होते देख, मुस्कुराते हुए,

    धरती के आगोश में धीरे-धीरे समाने लगी हूँ...

    स्रोत :
    • रचनाकार : नीतू गुजराल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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