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भीड़ का चेहरा

bheeD ka chehra

ज्योति शर्मा

ज्योति शर्मा

भीड़ का चेहरा

ज्योति शर्मा

और अधिकज्योति शर्मा

    मैंने भीड़ को देखा है

    वो जब चलती है

    तो उसके हज़ार पाँव होते हैं

    लेकिन एक ही दिमाग़

    और वो दिमाग़

    किसी और का होता है

    उस भीड़ में

    मेरा पड़ोसी था

    वो आदमी

    जिसकी बीवी बीमार थी

    जब मैंने उसके घर

    खाना पहुँचाया था

    उस भीड़ में

    वो लड़का था

    जो बेरोज़गार था

    दो साल से

    और जिसकी आँखों में

    एक थकान थी

    जो मैंने पहचानी थी

    घृणा

    उन्हें कहीं से मिली थी

    मुफ़्त में

    जो रोज़गार नहीं मिला

    जो इज़्ज़त नहीं मिली

    जो उम्मीद नहीं मिली

    उसकी जगह

    घृणा भर दी गई

    यह जादू नहीं है

    यह बहुत पुरानी

    और बहुत गंदी राजनीति है

    मैं उस भीड़ से नफ़रत नहीं करती

    मैं उस हाथ से नफ़रत करती हूँ

    जिसने उन्हें चलाया।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ज्योति शर्मा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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