Font by Mehr Nastaliq Web

बीज

beej

सुशील कुमार

और अधिकसुशील कुमार

    एक

    किसानों की देह-गंध

    और धरती का सत्व-जल

    सोखकर बीज

    मिट्टी की कोख़ में

    ऋतु की आहट का

    बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं

    प्रतीक्षा की यह बेला

    बड़ी नाजु़क है

    हर बीज के लिए!

    कुछ तो बह जाएँगे

    तेज पानी में बतास में

    कुछ सूर्य की तपिश में जल जाएँगे

    कुछ को चिड़िये-टिड्डे चुग लेंगे

    तो कीट-पतंगे कुछ को घुन लेंगे

    जो बच पाएँगे आपदाओं से

    उनकी ही कठोर त्वचा सहलाएगी ऋतु और

    वे सुगबुगाने लगेंगे अखुँआने को

    दरकाने लगेंगे मिट्टी की परत धीरे-धीरे

    और कनखे फेंककर धरती पर

    नई पौध में बदल जाएँगे

    हाँ, बचे रहेंगे बीज इसी तरह

    पृथ्वी पर हमेशा

    प्रकृति से अहर्निश संघर्ष करके।

    दो

    जानते हैं किसान

    बचे रहेंगे बीज सर्वदा धरती पर

    हर मुसीबत के बावजूद

    संभालकर रखेंगे वे

    बीज की पोटलियाँ खमार में

    मालूम है उन्हें—

    लहलहाते खेत हैं बचे हुए बीज में

    जीवन, भविष्य और सपना साबूत है तब तक

    जब तक बचे हैं बीज इस धरती पर

    बीज से किसान का संबंध अटूट है!

    तीन

    प्रचार माध्यम से वे

    चिल्ला मचा रहे—

    सुनो-सुनो किसानों,

    नये बीज आए हैं

    ख़ुशहाली साथ लाए हैं

    भूख से अधिक अन्न देते

    बिन मौसम खेत लहलहाते

    बीज बचाने की ज़रूरत ही क्या

    जब मुफ़्त नए बीज लाए हैं

    बिन मेहनत के दाने पाओ

    खेतों में नए बीज लगाओ।

    चार

    नए बीज के करार पर

    सरकार ने दस्तख़त कर दिए हैं

    तमाम असहमतियों के बावजूद

    किसानों ने घुटने टेक दिए हैं

    बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ खेतों में

    नए बीज गिरा रही

    नये बीज नई तकनीक ला रही

    हाल-फाल-बैल-ट्रैक्टर सब बेकार हो गए

    खेत फ़ार्म-हाउस में तब्दील हो रहे

    देसी खेती दम तोड़ रही

    ज़मीन अपनी है

    पर मंडी उनका है

    लोग अपने हैं

    पर बीज उनका है।

    पाँच

    किसान जुत रहे फ़ार्म-हाउसों में

    कोल्हू के बैल की तरह

    सरकार ने नए बीज पर

    सब्सीडी हटा ली है

    किसान नए बीज-खाद ख़रीद रहे

    नए संयंत्र, नए उपकरण लाने को

    अपने माल-असबाब-जमीन

    बैंको-सूदखोरों को गिरवी रख रहे

    कहीं मर रहे

    कहीं मार रहे

    तो कहीं आत्म-हत्या कर रहे

    मगर देसी बीज कोठार-खलिहानों में सड़ रहे।

    छह

    भूख पर बहसें अब और

    नहीं चलेगी

    कोई अपने पेट पर हाथ मलेगा

    भूख से ज़्यादा बहुत ज़्यादा अन्न मिलेगा

    पर मन लपकेगा देसी बीज के स्वाद पर

    और लोग मन मसोसकर रह जाएगे

    हम वही खाएँगे

    जो वे उपजाएँगे

    वरना हमारे कुनबों में वे

    भूख की बाढ़ पसार देंगे

    हमारे खेतों को बंजर बना देंगे

    खेत बेशक अपनी है

    पर खाद-पानी भी अब उनका है

    पट्टे पर नाम अपना है तो क्या हुआ

    क्योंकि भूख पर तो पेटेंट उनका है!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुशील कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY