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बापूसँ

bapusan

आप्त वचन बापू! अहाँक जे, हम सब तँ छी सबटा बिसरल,

जतऽ प्रकाशक पुञ्ज-जरै छल, ततहि अन्हार आइ अछि पसरल।

अहिंसाक जे नञ् समास छल, सत्यक आइ पछोड़ पकड़ने,

सबतरि जग भरि विचरि रहल अछि, मानवताकेँ सतत जकड़ने।

विश्व-बन्धुताकेर बात तँ, वचने धरि सम्प्रति अछि सीमित,

क्रिया रूपमे सांघातिक, शस्त्रास्त्रक अछि भण्डार अपरिमित।

स्वार्थक महाव्याल बीहरिसँ, रहि-रहि कऽ फुफकारि रहल अछि,

धर्मक रक्षाकेर नामपर, म्लेच्छक दल ललकारि रहल अछि।

शत्रु मित्रमे भेद बुझत से, बुद्धि सभक भुतिआय गेल अछि,

शंकर कहुना रुद्र बनथु, बस तकरे एक उपाय भेल अछि।

भौतिकताक दौड़मे देखू मानवता चल गेल रसातल,

शुम्भ-निशुम्भ लङौटा कसने, ठोकय ताल अहंसँ मातल।

अर्थे सभ्यताक परिचायक, अर्थ बनल अछि मूल अनर्थक,

बापू! बुझना जाइत अछि जे, गेल अहँक बलिदान निरर्थक।

सज्जन जे जन छथि धरतीपर, तनिका लोक बुझै छनि कायर,

अछि विज्ञान भिड़ल जे कहुना, ब्रह्मा बाबा होथु 'रिटायर'।

दीन-हीन सौँसे संसारक, जन-साधारण अछि आतंकित,

सेवाव्रती फलाहारी सब, सेवेकेँ कऽ देल कलंकित।

संस्कृतिकेर विकासक नामेँ, विकृति प्रकृतिकेँ करय प्रदूषित,

क्रूरताक मस्तकपर देखी चन्द्रकान्तमणि आइ विभूषित।

महाविनाशक क्षणक आगमन सम्भावित हो, तेहन लगै अछि,

कहितहुँ सब ही फोलि, हृदयमे भाव अजस्र अनन्त जगै अछि।

किन्तु भेल कण्ठावरोध, तेँ मनहि अहुछिया काटि रहल छी,

कुसियारक पोर जकाँ, पछबामे अपने फाटि रहल छी।

रामराज्य तँ एक ‘ह'कारक, योगेँ आइ 'हराम' राज्य अछि,

कदाचार युगधर्म बनल, तेँ सदाचार सर्वथा त्याज्य अछि।

नगर-नगरमे चौक-चौकपर, प्रस्तरमूर्त्ति अहँक स्थापित,

गामक देश कहबितो बापू! गामे भऽ रहले विस्थापित।

गणतन्त्रक शासक गणपतिकेर, धोधि क्रमहि फुलले जा रहलनि,

पता लगयबा लय अवैध धन, पुलिसक दल हुलले जा रहलनि।

भीतर नाला गन्हा रहल अछि, बाहरसँ सब सीधा-सादा,

बापू! सरिपहुँ एतऽ ध्वस्त अछि जनतन्त्रक सबटा मर्यादा।

स्रोत :
  • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 374)
  • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
  • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2025

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