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बंबई की बू

bambii ki bu

प्रफुल्ल शिलेदार

प्रफुल्ल शिलेदार

बंबई की बू

प्रफुल्ल शिलेदार

और अधिकप्रफुल्ल शिलेदार

    दिल्ली से दोस्त आया

    ...यार इस शहर की

    एक अजीब-सी बू आती है

    किस चीज़ की है यह बू

    अरे यह समुंदर की गंध है भाई

    बहुत दुखी है वह

    और समुंदर में जो मछलियाँ है ना

    उनके चीख़ने की गंध भी उसमें घुली हुई है

    यहाँ की हवा में भी कितना पानी है देख

    और इस पानी में है नमक

    यहाँ के मेहनतकश इंसान का पसीना

    पसीने के नमक की गंध

    इस शहर में लाखों लोग

    जहाँ जगह मिले वहीं बसेरा कर लेते हैं

    बस एक क़ब्र जितनी जगह मिल जाए

    तो काफ़ी है यहाँ

    अपनी मिट्टी छोड़कर आए हैं उगने-बढ़ने के लिए

    कितने बढ़ गए है यह पेड़-पौधे

    एक-दूसरे से मिलते हैं तब महकने लगती है

    यादों में खोई मिट्टी की गंध

    पेट्रोल की डीजल की नुक्कड़ के चाय की

    तड़के की मच्छी की रोटी की गंध

    शरीर के आधे पेट में भड़की

    भूख की गंध भी सरसराती रहती है

    भूखे पेट तक पहुँचकर

    फेंके गए सड़े अन्न की

    पुराने चोक हुए गटर की

    क़रीब से गुजरती पावडर या सेंट की महक

    खुले में किसी के पेशाब की

    कचरे में फेंके गए मरे हुए चूहे की

    अधजले सपनों की गंध भी

    अनजाने में ही घुल जाती है इन्ही में

    अजीब दास्ताँ है इस शहर की

    कई तरह की गंध मिलजुल कर रहती है यहाँ

    मोहम्मद अली रोड की गंध

    घुल जाती है गिरगाँव की गंध में

    पेडर रोड की गंध

    फैलती है क़ुलाबा-कोलीवाडा में

    फाउँटेन से तेज़ हवा सीधे घुसती है

    गेटवे की नाक से आर-पार साँय-साँय

    यह शहर सज-धजकर चमकीली मालाएँ पहनकर

    एक पाँव समुंदर में डुबो कर

    ग्राहक की ओर नज़र लगाए बैठा

    दूसरा पाँव गैंग्रीन से ग्रस्त

    फँसा हुआ कीचड़-गाद में

    इसके एक मुलायम सुघड़ पाँव पर

    फ़िदा है दुनिया

    दूसरे सड़े पाँव से रही है बू

    दोनों पाँवों के बीच आसरा लिए हैं

    लाख़ों रहगुज़र

    रात भर कराहती चीख़ती कालिख की बू

    झरती है इस शहर के रग-रग से

    सूरज उगने से पहले ही आने लगती है

    घड़ी की चाकू जैसी नुकीली सुई से हुए

    गहरे ज़ख़्मों से रिसते

    ख़ून की गंध

    बंद पड़ी हुई मिल के कंपाउंड के वीराने में बैठकर

    ललचाई नज़रों को नज़रअंदाज़ करते हुए

    काई भरे खँडहरों के बीच दिन-रात ताने-बाने बुनने में डूबे

    कबीर ने इस शहर का वस्त्र कौन से धागों से बुना है

    बार-बार यहाँ आओगे ना

    तो इस शहर की गंध का नशा आने लगेगा

    पूरी दुनिया में यह बू बस यही मिलेगी

    इसी के जूनून में लाख़ों लोग यहाँ चले आते हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रफुल्ल शिलेदार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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