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हम तो बाटे एक लरिका नदान बाबू जी

hum to bate ek larika nadan babu ji

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

हम तो बाटे एक लरिका नदान बाबू जी

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    हम तौ बाटे एक लरिका नदान बाबू जी,

    कुल बिपतिऐ बा कपारे हम किसान बाबू जी,

    फटी लँगोटी, टुटहा जूता, बिगड़ा ताना-बाना,

    लाख जतन जौ करी, तौ पाई पेट भरै कै दाना,

    एक दिन मिलि जइहैं माटी परान बाबू जी,

    कुल बिपतिऐ...

    जेतनै भार परै उपरा हम ओतनै ओका झेली,

    सूखी रोटी खाइ के अपने लरिकन के सँग खेली,

    कैसे बितिहैं अब तौ मँहगा हर सामान बाबू जी,

    कुल बिपतिऐ...

    कानी-कौड़ी पास नहीं आकास चढ़ी मँहगाई,

    रात-रात भै जागि के नैना भोर भये पथराई,

    जब से बिटिया होय गै घरवा मा सयान बाबू जी,

    कुल बिपतिऐ...

    पँचवे ताईं पढि के बेटवा बनिगे राम पुजारी,

    जौनी जौनी डगरा जाई लोगय कहैं भिखारी,

    हमरे होठवा नाही खेलिहैं मुस्कान बाबू जी,

    कुल बिपतिऐ...

    खाद-बीज सरकार देय तौ बेंच लेंय अधिकारी

    कुछ तौ सूखा बूड़ा लइगा कुछ का लाग बिमारी,

    बड़े मनई के हाथे कुल जहान बाबू जी,

    कुल बिपतिऐ...

    सीना खोले सीमा पै अब दुस्मन करैं गोहार,

    केहु के हाथे बरछी भाला केहू लेहे अंगार,

    मोरे हथवा थमावा अब कमान बाबू जी,

    कुल बिपतिऐ...

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 29)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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