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असत्य-जीवन

asatya–jivan

पल्लवी जयराम

पल्लवी जयराम

असत्य-जीवन

पल्लवी जयराम

और अधिकपल्लवी जयराम

    स्त्रियाँ नहीं कह सकीं

    अपने जीवन का सत्य

    वो करती रहीं प्रेम

    और छिपाती रहीं

    अपने अंदर की अनंत गहराइयों को,

    अपने जीवन को

    यथार्थ को

    अपने बीते हुए कल को।

    उन कलों को

    जिनका निर्माण

    पुरुषों ने ही किया था।

    उनको पता था कि

    वो जिनसे कर रही हैं प्रेम

    या पा रही हैं

    उनसे कहा गया सत्य

    केवल वंचना लाएगा।

    आख़िर,

    किस प्रेम की तलाश में रहीं वे?

    उन्होंने अपने आस–पास

    निर्मित कर लिए

    असत्य के आवरण

    वे असत्य ठीक वैसे ही थे

    जिनसे पुष्ट हो रहा था

    पुरुषों का अहंकार।

    स्त्री को गहन प्रेम में भी

    ध्यान रखना पड़ा

    कहीं पुरुष अहंकार खंडित हो जाए।

    और पुरुष ख़ुश रहा ये सोचकर

    मेरे पास है जो स्त्री

    वो,

    ठीक मेरे मानदंडों की है।

    इस तरह

    घुटती रही आत्मा,

    तड़पती रही चेतना,

    व्याकुल रहा मन,

    और परेशान हृदय।

    बीमार समाज की फिटनेस

    रखे ध्यान

    बनाते आदर्श–दाम्पत्य।

    अंततः विदा हुआ

    जर्जर जीवन

    त्यागता हुआ, स्त्री होने के अभिशाप को

    जलती रही लौ

    गिरती रही राख

    चटकती हड्डियाँ

    जिनमें लिखा था–

    मैंने असत्य को जिया है।

    सत्य नहीं कह पाई

    तुम्हारी दुनिया में

    सत्य को स्पेस नहीं

    तुम दयनीय और निरीह हो

    क्योंकि तुममें नहीं है, आत्मबल

    कि अपना असली चेहरा भी देख सको।

    स्रोत :
    • रचनाकार : पल्लवी जयराम
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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