अरशद नदीम की माँ को पंजाबी बोलते देखकर
arshad nadim ki maan ko panjabi bolte dekhkar
ऋषभ पाण्डेय
Rishabh Pandey
अरशद नदीम की माँ को पंजाबी बोलते देखकर
arshad nadim ki maan ko panjabi bolte dekhkar
Rishabh Pandey
ऋषभ पाण्डेय
और अधिकऋषभ पाण्डेय
हुई एक सुबह कि पड़ोसी मुल्क में
पंजाबी बोलते हुए एक माँ के अल्फ़ाज़
भाषा के सबसे सुंदर संदर्भों की कहानियाँ
बयाँ कर रहे थे
उसकी भाषा में थोड़ा लाहौर था
थोड़ा अमृतसर,
थोड़ी-सी मिठास सियालकोट की थी
और थोड़ा-सा अपनापन पठानकोट का
बाबा बताते हैं कि जब देश आज़ाद हुआ
वह आठ वर्ष के थे
उनकी स्मृति में एक दृश्य कौंधता है
कि जब आज़ादी की ख़बर गाँव-गाँव फैली तो
गाँव का पच्चीस बरस का एक मुसलमान लड़का
नीम के पेड़ पर चढ़ गया
और पेड़ की पुलुई पर तिरंगा तान कर
अवधी लोकगीत की कुछ धुनें गाई थीं
बाबा की स्मृति में लोकगीत गाता हुआ एक नवजात राष्ट्र था
जिसकी पास भाषा की वह आदत शामिल थी
जिसमें बहुत कुछ बिगड़ने की साजिश के साथ
कुछ सुलझती हुई मनुष्यता लोकगीत थे
और इधर पाकिस्तान में पंजाबी बोलते हुए
अरशद नदीम और उसकी माँ को देखते हुए
मुझे भाषा की उस सुंदरतम आदत पर आश्चर्य होता है
जहाँ एक भाषा ही है जहाँ दो संप्रदायों और राष्ट्रों के बीच
अगाध मोहब्बत और खुन्नस के अठहत्तर बरस बाद भी
उस भाषा के भीतर की साझा मनुजता का दोहराव जारी है
और शाश्वत जारी रहेगा
जब तक भाषा जीवित है।
- रचनाकार : ऋषभ पाण्डेय
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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