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अख़बार

akhbar

अमित उपमन्यु

और अधिकअमित उपमन्यु

    मैंने सरसरी निगाह से ही देखना चाहा

    लेकिन बद्क़िस्मती से उनसे नज़रें टकराईं

    और वे सब अख़बार से कूद-कूद कर बाहर आने लगे

    हत्याएँ चीटियों की तरह क़तार लगाकर शक्कर के डिब्बों की तरफ़ चल पड़ीं

    बलात्कार उछलकर दीवार पर टँगे स्वर्ण-पदकों पर झुलने लगे

    चोरी और डकैतियाँ ‘कौन बनेगा करोड़पति’ देखने में मशग़ूल हो गई

    भ्रष्टाचार ने कमांड में छलाँग मार कर ख़ुद को फ़्लश कर दिया

    लाशें, और घटना-स्थल अब तक अख़बार में ही पड़े हुए थे

    मुलज़िम पहले पेज पर मुस्कुरा रहे थे

    गवाह खेल-पृष्ठ पर पॉपकॉर्न खा रहे थे

    वकीलों के ठहाके और ‘योर ऑनर’ के हथौड़े की आवाज़ बाहर सड़क से रही थी

    क़ानून मूसलाधार बरस रहा था

    घड़ी के अलार्म से पुलिस के सायरन की आवाज़ आने लगी

    “सबको न्याय मिलेगा”

    फिर सूरज सर पर चढ़ आया

    अख़बार ऊँघने लगा

    बाक़ी सब सो गए!

    लाशें और घटना-स्थल अब भी अख़बार में ही पड़े हुए थे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रेत पथ (अंक 3-5) (पृष्ठ 49)
    • रचनाकार : अमित उपमन्यु
    • संस्करण : जुलाई 2014-दिसंबर 2015

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