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अगर मैं प्रेम न करता

agar main prem na karta

विशाल कुमार

विशाल कुमार

अगर मैं प्रेम न करता

विशाल कुमार

और अधिकविशाल कुमार

    अगर मैं प्रेम करता,

    तो वंचित रह जाता।

    ज्ञान के रहते हुए भी

    अज्ञानी रह जाता,

    अनभिज्ञ रह जाता

    अपने स्वयं से।

    समझदार समझकर बैठा था,

    बिना किसी समझ के

    जीवन बिताए जा रहा था,

    जिसे उद्देश्य समझकर

    वह तो उद्देश्य थे ही नहीं!

    अंतहीन उद्देश्य, उद्देश्यहीन होने के समान हैं!

    अंत की चाह में दौड़े चले जाते हैं,

    अंत तो होता ही नहीं!

    कोई ठहराव भी नहीं आता।

    दौड़-सा है अंतहीन उद्देश्य,

    दौड़ में तो सिर्फ़ होड़ है।

    रुकना मना है, सोचना मना है,

    रोकना भी मना है।

    सिर्फ़ दिखती है ‘जीत’,

    जीत जिसे जीतकर ख़ुशी भी नहीं मिलती,

    क्योंकि अगली दौड़ शुरू हो चुकी होती है।

    एक बार फिर

    लोगों को हराना है,

    पूरा ध्यान हराने पर केंद्रित है।

    जीत से ज़्यादा हराना महत्वपूर्ण है!

    जीत ख़ुशी तो नहीं देती,

    लेकिन हार हीनता, अपकर्ष देती है।

    जीतने वाले व्यक्ति को मिलती है ऊँचाई,

    ऊँचाई, जहाँ वह ‘अकेला’ है।

    सब तो नहीं जीत सकते न,

    जीतता कोई ‘एक’ ही है।

    एक कितना भी कर लो,

    अकेला ही होगा!

    जैसे-जैसे बढ़ती है ऊँचाई,

    बढ़ता जाता है अकेलापन।

    लेकिन अंतहीन है यह सफ़र,

    क्योंकि भूख कभी मरती है क्या?

    वैसी ही होती है जीत की भूख,

    चाँद, मंगल—इससे भी आगे जाएगी यह भूख!

    लेकिन जो चाँद पर बसाएगा अपना डेरा,

    अकेला ही तो होगा!

    इतनी बुरी भी नहीं है यह दौड़,

    लेकिन इससे विपरीत भी है कुछ।

    तार्किकता में नहीं, स्थिरता में,

    बेकरारी में नहीं, इंतज़ार में।

    प्रेम, इंतज़ार के आनंद से रूबरू कराता है,

    बतलाता है

    कि इंतज़ार भी इतना सुखदायी,

    साथ ही बेचैन कर सकता है।

    फ़ायदे-घाटे के जोड़-घटाव

    से इतर,

    क्या मुकम्मल भी हो सकता है ठहराव?

    क्या ठहरा भी जा सकता है?

    ठहराव ज़रूरी है

    किसी को समझने के लिए,

    सबसे ज़रूरी

    अपने आप को ‘समझने’ के लिए।

    कितना कुछ निरर्थक समझे जा रहे हैं,

    सबसे ज़रूरी—

    अपने आप को समझे बिना!

    निरर्थक ही तो है।

    अगर मैं “मैं” नहीं,

    अगर मुझे मेरे स्वयं का ज्ञानबोध नहीं,

    चोला ओढ़ रखने से क्या मिलेगा?

    वह, जो मुझे चाहिए भी नहीं?

    तो किसे चाहिए? किसके लिए इतना कुछ?

    ख़ैर,

    प्रेम सजना है, सँवरना है, निखरना है।

    प्रेम मरे, बेजान जीव में चंचलता है।

    प्रेम गिरि की कठोरता में कोमलता है।

    कोमलता से ही सृजन होता है,

    प्रेम सृजन की जननी है।

    अपना सृजन, साझा सृजन,

    सृजन की ख़ुशी—अपनी ख़ुशी,

    अपनी ख़ुशी से भी कुछ बेहतर हो सकता है क्या?

    प्रेम बुनियाद है एक ख़ुशहाल समाज की,

    सब व्यक्तिगत स्तर पर भी ख़ुश

    और ख़ुशी का साझापन भी।

    कोई हीनता नहीं, कोई दूरी नहीं,

    सबसे ज़रूरी—

    ‘स्वयं’ और ‘अलग’ का फ़ासला नहीं।

    सारी समस्याएँ, सारी उलझनें ख़त्म होंगी,

    सारी दूरियाँ, अलगाव खत्म हो जाएँगे,

    जब लोग प्रेम में होंगे।

    झूठे हैं वे लोग

    जो कहते हैं

    प्रेम केवल एक से ही हो सकता है!

    प्रेम का कोई बंधन नहीं,

    यह विशेषण नहीं—क्रिया है।

    क्रिया की जाती है,

    क्रिया प्रवृत्ति का हिस्सा हो सकती है।

    प्रवृत्ति की चीज़ें सोच-समझकर नहीं की जातीं।

    मेरी कल्पना में प्रेम काफ़ी वृहद है।

    मैं कल्पना करता हूँ—

    परिवार, जो प्रेम में हो,

    गाँव-शहर, जो प्रेम में हों,

    देश, जो प्रेम में हो,

    संसार, जो प्रेम में हो।

    अगर मैं प्रेम करता,

    तो मैं वंचित रह जाता

    इन सब कल्पनाओं मात्र से।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विशाल कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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