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अबकी जब मउर चढ़ाइब तोरा माथे

abki jab maur chaDhaib tora mathe

प्रकाश उदय

प्रकाश उदय

अबकी जब मउर चढ़ाइब तोरा माथे

प्रकाश उदय

और अधिकप्रकाश उदय

    दहेज में भेंटल नगद एक लाख रुपया

    घलुए में घरे अइली छुई-मुई कनिया।

    छुई-मुई कनिया के देह जइसे ओखर

    एक आँख गड़ही या एक आँख पोखर।

    सिलवट अस मुखड़ा माँछी अस नाक

    दाँतन के तरे-तरे लुंज-पुंज गाल।

    रंग देख दंग साले दुलहा मुँहचोर

    जहाँ-तहाँ पकिया रंग, जहाँ-तहाँ गोर।

    —गाँव में सोर!

    कंक बाप कहले—हे बेटा कंगाल,

    सेहिता के बरध के का गिनबे दाँत?

    बड़ा होई अनघा बत्तिस ना चँउसठ

    ले बेटा लाख, अकबकइले का भउँचट?

    भाग मान अलऊ तोर कनिया रोगियाह

    बड़ा जीही बहुते हप्ता ना साल—

    थोरे दिन धीरज के धरन धरि लटक ले

    थोरे दिन सबुर के सितुहा में सटक ले

    अबकी जब मउर चढ़ाइब तोरा माथे

    तोर किरिए चलब नया दुनिया के साथे

    एक पइसा लेब ना दहेज मोर बाबू

    चहबे, कइ देव लभमरेज तोर बाबू

    जनि जिउ जार, मन मार मोर बाबू

    काबू कर,

    काबू!

    स्रोत :
    • पुस्तक : बेटी मरे त मरे कुँआर [भोजपुरी कविता-संग्रह] (पृष्ठ 4)
    • रचनाकार : प्रकाश उदय
    • प्रकाशन : कौशल्या प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1988

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