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आदि और अंत

aadi aur ant

प्रफुल्ल शिलेदार

प्रफुल्ल शिलेदार

आदि और अंत

प्रफुल्ल शिलेदार

और अधिकप्रफुल्ल शिलेदार

    आदि और अंत

    नहीं...

    अनादि अनंत

    बीच के अपार में

    अविकल कुछ भी नहीं

    सब कुछ बहता रहता है

    लेकिन बहाव निरंतर नहीं

    पाँवों तले बीतता रास्ता

    कहाँ शुरू होता है और कहाँ ख़त्म

    नज़रों की पहुँच में नहीं

    लेकिन यह सीधी-सादी राह नहीं

    वह कितनी जगह विखंडित हुई है

    यह पैदल चलने वाले पाँव ही बता सकते हैं

    यह समुद्र नीला-जामुनी

    कब से भीतर ही भीतर डोल रहा है

    उसकी गहराई में बसे शार्क को या व्हेल को ही नहीं

    यहाँ की सुरमई को या बांगड़े को पूछकर देखो

    अनगिनत दरारें दिखती हैं मछलियों को

    उसकी लहरों के बीच गहराई तक गई हुई

    समुंदर की दरारें यहाँ की मछलियों को और

    समुंदर के पानी को ही भरनी पड़ेगी

    जैसे अपने ज़ख़्म भरने के लिए

    ख़ुद होकर आगे आती है

    अपनी ही मांसपेशियाँ और

    कई दिनों तक लड़कर भर देती हैं घाव

    और इस बहते समय की दरारें

    जीने की धारा में

    नुकीले चाकू जैसी चुभती रहती हैं

    उन्हें भरने के लिए कौन-सी सामग्री लगेगी

    कौन-सा शस्त्र कौन से आयुध

    कौन-सा रसायन लगेगा

    किसी को तो आगे आना ही होगा

    ढूँढकर लाने होंगे

    काल के सूक्ष्मातिसूक्ष्म नैनो कण

    शब्दों को घिसकर उजलाकर

    चकाचौंध काल के प्रवाह की दरारें

    भरनी पड़ेगी

    है कोई वास्तुविद

    कोई शल्यविद

    कौन है शस्रज्ञ कौन विधिज्ञ

    दर्शनी अभियंता कुशल कारीगर

    अवकाश के दरमियान

    काल को गढ़ने वाला

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रफुल्ल शिलेदार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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