Font by Mehr Nastaliq Web

उमिर के लास कान्ही

umir ke laas kanhi

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

उमिर के लास कान्ही

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

और अधिकनागेन्द्र प्रसाद सिंह

    उमिर के लास कान्ही पर उठवले ढो रहल बानी

    समय के दाग छाती पर जे लागल धो रहल बानी

    करम कइलीं जे जिनगी भर समय टाँकत रहल सबके

    ओही इतिहास के बाँचत बेआकुल हो रहल बानी

    जवानी भर लुटवलीं हम, रहे जे पास में हमरा

    ना अब कुछ पा रहल बानी, ना अब कुछ खो रहल बानी

    रहे उमड़ल नदी में जब लहर हमरा मतइला के

    ओही क्षण के ललक के हम अब संजो रहल बानी

    जनम भर करम के धरती बनवली हँऽ जे हम सुंदर

    ओही में नाँव के बिरवा सम्हर के बो रहल बानी

    स्रोत :
    • पुस्तक : सुर न सधे (पृष्ठ 22)
    • रचनाकार : नागेन्द्र प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : लोग प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2000

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY