जेन-ज़ी : एक माफ़ीनामा
ममता पंडित
29 जुलाई 2026
इसे कोई सामान्य लेख नहीं, बल्कि एक माफ़ीनामा समझिए। यह माफ़ीनामा मेरी ही नहीं, मेरी पूरी पीढ़ी की ओर से उस पीढ़ी के नाम है, जिसे आज हम ‘जेन-ज़ी’ [Gen Z] कहते हैं।
इधर कुछ दिनों में इस पीढ़ी ने अपने बारे में बनी अनेक धारणाओं को तोड़ दिया है। हमने इन्हें क्या-क्या नहीं कहा—मोबाइल की स्क्रीन में डूबी हुई पीढ़ी, एआई पर निर्भर पीढ़ी, अपने समाज और देश से कटी हुई पीढ़ी। हमें लगता था कि तीस सेकंड की रीलों में उलझे ये बच्चे सामाजिक प्रश्नों की गंभीरता क्या समझेंगे! हमने मान लिया था कि इन्होंने गांधी, अंबेडकर और भगत सिंह को केवल किताबों में छोड़ दिया है। सच तो यह है कि हर पुरानी पीढ़ी की तरह हमने भी अपनी अगली पीढ़ी को कमतर साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शायद इसलिए कि हमारे साथ भी कभी यही हुआ था।
हर पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को संदेह की नज़र से देखती है। उसे लगता है कि उसके समय के मूल्य ही अंतिम सत्य हैं। हम भी इससे अलग नहीं थे। हमने अपने माता-पिता की आज्ञा का निर्विरोध पालन किया। सवाल पूछना हमारे संस्कार का हिस्सा नहीं था। लेकिन हमारी संतानें हर बात पर ‘क्यों’ पूछती हैं और शायद यही हमें सबसे ज़्यादा बेचैन करता है।
सच तो यह है कि हम अपने समय में वह ‘क्यों’ कभी पूछ ही नहीं पाए। अपने बड़ों से असहमति व्यक्त न कर पाने की जो कुंठा हमारे भीतर जमा रही, उसका एक हिस्सा हमने अनजाने में अपनी अगली पीढ़ी पर उतार दिया। हमने उन्हें अनुशासन सिखाने की कोशिश की, लेकिन उनकी परिस्थितियों को समझने की नहीं।
ज़रा अपने समय को याद कीजिए! क्या तब इतनी भयावह प्रतिस्पर्धा थी? क्या किसी नौकरी के लिए लाखों उम्मीदवार एक ही परीक्षा में बैठते थे? क्या भर्ती परीक्षाओं के पेपर बार-बार लीक होते थे? क्या स्कूल-कॉलेज के दिनों में ‘डिप्रेशन’ और ‘एंग्ज़ायटी’ जैसे शब्द हमारे रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा थे?
हम भाग्यशाली थे कि हमारी जवानी अपेक्षाकृत अधिक शांत और कम असुरक्षित समय में बीती। संघर्ष तब भी थे, लेकिन भविष्य के प्रति इतना गहरा अविश्वास नहीं था। मेहनत करने पर भरोसा रहता था कि देर-सबेर कोई रास्ता निकल आएगा। पर आज के युवाओं के सामने खड़ी दुनिया कहीं अधिक निर्मम है।
मेरे एक रिश्तेदार की बेटी ने बारहवीं में 97 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। इसके बावजूद वह अपनी मनचाही इंजीनियरिंग संस्था में प्रवेश नहीं पा सकी। हम उसे लाख समझाते रहे कि उसने शानदार प्रदर्शन किया है, पर उसकी अपनी नज़र में वह असफल थी। जब प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश की होड़ इतनी तीखी हो जाए कि एक-दो अंक भी भविष्य तय करने लगें, तब असफलता का अर्थ भी बदल जाता है।
इसके बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं होता। महँगी शिक्षा, कोचिंग-संस्थानों का फैलता बाज़ार, प्रतियोगी परीक्षाओं का अंतहीन सिलसिला और बार-बार होने वाली प्रशासनिक विफलताएँ युवाओं के सामने ऐसी सुरंग बना देती हैं, जिसके अंत में रोशनी दिखाई नहीं देती। वर्षों की तैयारी के बाद यदि परीक्षा रद्द हो जाए, पेपर लीक हो जाए या भर्ती ही न निकले, तो यह केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं; बल्कि किसी युवा के जीवन के कई वर्षों पर लगाया गया विराम है।
एक-एक सरकारी भर्ती के लिए लाखों आवेदन आते हैं। परीक्षा देने के लिए ट्रेनों के दरवाज़ों पर लटककर सफ़र करते युवाओं की तस्वीरें अब सामान्य हो चुकी हैं। निजी क्षेत्र में नौकरी मिल भी जाए, तो अस्थिरता और लगातार ख़ुद को साबित करते रहने का दबाव बना रहता है।
सोशल मीडिया ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। आज का युवा पूरी दुनिया से अपनी तुलना करता है। वह देखता है कि दूसरे देशों के युवाओं के पास कैसी सुविधाएँ और अवसर हैं, फिर अपनी व्यवस्था की ओर देखता है। यह तुलना हमेशा न्यायपूर्ण नहीं होती, लेकिन उसका असर वास्तविक होता है। हमने अक्सर इस बेचैनी को ‘ज़्यादा सोचने’ या ‘बच्चों की नासमझी’ कहकर टाल दिया।
ऐसे में यदि यह पीढ़ी सवाल पूछ रही है और व्यवस्था से जवाब माँग रही है, तो इसमें आश्चर्य कैसा?
आज सड़कों पर दिखाई देने वाला विरोध एक दिन का ग़ुस्सा नहीं है। यह वर्षों से जमा होता आया असंतोष है। किसी भी समाज के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि उसके सबसे मेहनती और सबसे शिक्षित युवा अपने भविष्य को लेकर इतने असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
यहीं आकर मुझे लगता है कि माफ़ी हमें माँगनी चाहिए।
हम इसलिए नहीं कि हमने हर समस्या पैदा की, बल्कि इसलिए कि जिन समस्याओं को हमें अपने समय में चुनौती देनी चाहिए थी, उनके साथ हम समझौता करते रहे। हमारी ज़िम्मेदारी थी कि अगली पीढ़ी को हम अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद व्यवस्था सौंपते; लेकिन हमने उन्हें ऐसी व्यवस्था दी, जहाँ मेहनत से पहले अनिश्चितता खड़ी दिखाई देती है।
इस बीच हुए आंदोलन ने मेरी अपनी कई धारणाएँ भी बदली हैं। हमें लगता था कि यह पीढ़ी गांधी, अंबेडकर और भगत सिंह को भूल चुकी है। लेकिन जब मैं इन्हें शांतिपूर्वक विरोध करते, पुलिस की लाठियाँ खाते हुए भी संयम बनाए रखते देखती हूँ, तो महसूस होता है कि हमने गांधी को जितना पढ़ा, उससे कहीं कम जिया। जब ये युवा फ़ैज़ की नज़्में गाते हुए गांधी, अंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीरों के साथ सड़कों पर उतरते हैं; तो वे हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि जाग्रत नागरिक चेतना से भी जीवित रहता है।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि अपने अधिकारों की लड़ाई किसी राजनीतिक दल का विस्तार बने बिना भी लड़ी जा सकती है। स्वतंत्र नागरिक चेतना ही किसी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त होती है।
सच कहूँ तो इस मामले में यह पीढ़ी हमसे अधिक साहसी निकली। हम क्रांति की बातें करते रहे, उसके सपने देखते रहे, उस पर कविताएँ और लेख लिखते रहे; लेकिन अपने ही जीवन में अन्याय के सामने अक्सर चुप रहे। हमने समझौतों को व्यावहारिकता का नाम दिया, जबकि इस पीढ़ी ने सवाल पूछने का साहस दिखाया।
अगर आप इनका साथ नहीं दे सकते, तो कोई बात नहीं। लेकिन कम-से-कम इन्हें समझने की कोशिश कीजिए। बिना जाने-समझे इन्हें देशविरोधी, दिशाहीन या निकम्मी पीढ़ी कह देना सबसे आसान काम है। ये कोई बाहरी ताक़त नहीं हैं। ये हमारे ही घरों के बच्चे हैं, हमारे समाज का वर्तमान और इस देश का भविष्य हैं। इनकी निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाने से पहले हमें अपनी उस पीढ़ी से सवाल करना चाहिए जिसने इन्हें एक ऐसी व्यवस्था सौंपी, जिसमें सपनों से अधिक असुरक्षा और अवसरों से अधिक अविश्वास है। क्योंकि सच यही है—हमने जेन-ज़ी को बहुत जल्दी परख लिया, बहुत देर से समझा। और शायद, हमने उनके साथ न्याय नहीं किया।
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