फाटि गेलै धरती आ टूटल आकाश हमर
phati gelai dharti aa tutal akash hamar
फाटि गेलै धरती आ टूटल आकाश हमर
कनहा पर लादल छै अपने लहास हमर।
बितल कइएक युग, भोरक प्रत्याशामे
ने उगलै सुरुज, आस भेलै उदास हमर।
रहतै की बाट हमर जिनगी केर अन्हारे
डुबल घन बीच, मनक उजरा प्रकाश हमर।
औषधि बिनु नेना गरीबक बीमार जेना
कुहरै छै कुहरै अछि, ओहिना हुलास हमर।
दर्दक अभिव्यक्तिक ने शब्द कोनो भेटि रहल
गुमसुम हम मुर्ति जकाँ, प्राण अछि हतास हमर
- पुस्तक : कान्ह पर लहास हमर [मैथिली गजल संग्रह] (पृष्ठ 27)
- रचनाकार : कलानन्द भट्ट
- प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
- संस्करण : 1983
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.