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मकान बा सटल-सटल

makan ba satal satal

कृष्णानन्द कृष्ण

कृष्णानन्द कृष्ण

मकान बा सटल-सटल

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    मकान बा सटल-सटल

    हिया मगर बँटल-बँटल

    रहल भइल इहाँ कठिन

    सनेह मोल बा घटल

    पहाड़ पीर हो गइल

    मयार आँख ना सटल

    जहर भरल हवा इहाँ

    बा साँस-साँस से कटल

    तमाम उम्र कट गइल

    भरम ना प्रीत के हटल

    स्रोत :
    • पुस्तक : नया सूरज चढ़ल जाता (पृष्ठ 18)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2000

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