कहू की कथा कहुना जीबि रहल छी
kahu ki katha kahuna jibi rahal chhi
कहू की कथा कहुना जीबि रहल छी
फाटल गुदरी अपन हम सीबि रहल छी।
दाम श्रम केर संचित भजा हाटपर
बोझ महगी बनल हम लीबि रहल छी।
भार परिवार जिनगी बनल ठूँठ सन
आब सूदिक जहर हम पीबि रहल छी।
कोना बाँचत प्रतिष्ठा विवशता भरल
धसल टांग दलदलमे खीचि रहल छी।
पौरुष गमा हम ने बैसी, अछि चिन्ता
चिन्ताकुल माथ अपन पीटि रहल छी।
- पुस्तक : कान्ह पर लहास हमर [मैथिली गजल संग्रह] (पृष्ठ 3)
- प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
- संस्करण : 1983
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