जनमे से बाटे उधार हमार
janme se bate udhaar hamar
जनमे से बाटे उधार हमार जिनगी
जरिए से लागत मुआर हमार जिनगी
बरजीला कतनो ऊ कुछऊ ना माने
नाचेले लंगटे उधार हमार जिनगी
दिन-रात सपना-प-सपना सजावे
लागेले बहुते मयार हमार जिनगी
पछता रहल कइ के अनघा अनरकम
जोहत बा मउवत के द्वार हमार जिनगी
कइसे कहीं नीक नइखे ई लागत
आखिर त हउए इयार हमार जिनगी
- पुस्तक : सुर न सधे (पृष्ठ 54)
- रचनाकार : नागेन्द्र प्रसाद सिंह
- प्रकाशन : लोग प्रकाशन, पटना
- संस्करण : 2000
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