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गत्र-गत्र फाटल छै

gatr gatr phatal chhai

विभूति आनंद

विभूति आनंद

गत्र-गत्र फाटल छै

विभूति आनंद

और अधिकविभूति आनंद

    लोक के तोड़ि-ताड़ि, राखैए ई व्यवस्था

    घट्टी बटखारा स' नापैए ई व्यवस्था

    अधिनायकी चेहरा के, खध्धर स' झाँपिक'

    तड़पा-तड़पा लोक के, मारैए ई व्यवस्था

    वाद-प्रतिवाद मे, बाझल अछि माथा

    मुर्दा बुझि लोक के, गाड़ैए ई व्यवस्था

    कोन-कान्ह मे लहकैए, पसरैए आगि

    साम्प्रदायिक रंग द', बाँचैए ई व्यवस्था

    मकड़ाक जाल स', चूल्हि कतो सज्जित

    पचसल्ला कौरा द’, परतारैए ई व्यवस्था

    चाकर बनल लोक, कानैए दिन-राति

    भत्ताक मृगतृष्णा मे, ओझराबैए ई व्यवस्था

    गत्र-गत्र फाटल छै, सहस्त्रो टा छिद्र

    प्योन लगा अपना के, साटैए ई व्यवस्था

    स्रोत :
    • पुस्तक : उठा रहल घोघ तिमिर (पृष्ठ 11)
    • रचनाकार : विभूति आनन्द
    • प्रकाशन : भारती संस्थान, पटना
    • संस्करण : 1981

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