अहाँ जीबिते मनुक्खकेँ जरा रहल छी
ahan jibite manukkhken jara rahal chhi
अहाँ जीबिते मनुक्खकेँ जरा रहल छी
घेरि गामेकेँ स्वाहा करा रहल छी।
हाथ पीड़ाक धनगर विकट शोरमे
दानवी-वृत्तिकेँ दनदना रहल छी।
ने बूझल बूढ़, नेना, ने मौगी, मरद
भागय जे बन्नुकसँ उड़ा रहल छी।
मनुष्यता भागल क्रूरतासँ अहाँक
सामंती-प्रथा पुनि चला रहल छी।
कने सोचू कोना खींचि नूआ अहाँ
पांचालीकेँ नङटे बना रहल छी।
कोरवी तत्व लऽ अहाँ शकुनि बनल
नरमेघक ई पासा रचा रहल छी।
- पुस्तक : कान्ह पर लहास हमर [मैथिली गजल संग्रह] (पृष्ठ 12)
- रचनाकार : कलानन्द भट्ट
- प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
- संस्करण : 1983
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