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आग रहे हवा

aag rahe hava

मिथिलेश ‘गहमरी’

मिथिलेश ‘गहमरी’

आग रहे हवा

मिथिलेश ‘गहमरी’

और अधिकमिथिलेश ‘गहमरी’

    आग रहे हवा रहे

    कइसे बताईं का रहे

    अब, जमाना नइखे जब

    आदमी, देवता रहे

    लोग हँसत मिलल, मगर,

    मन में सजल चिता रहे

    घाट के रार नाव से

    अइसे त' काल्ह ना रहे

    बाग भले पुरान हो

    फूल नया-नया रहे

    दुश्मनो, मीत बन सके

    एकरो रास्ता रहे

    साँच के जे कहे ना साँच

    ओकरो बदे सजा रहे

    स्रोत :
    • पुस्तक : केकरा से माँगीं अँजोर (पृष्ठ 84)
    • रचनाकार : मिथिलेश ‘गहमरी’
    • प्रकाशन : सत्यांश उपक्रम (प्रा.) लिमिटेड, बलिया
    • संस्करण : 2019

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