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तप रहे हैं आज

tap rahe hain aaj

प्रदीप बहराइची

प्रदीप बहराइची

तप रहे हैं आज

प्रदीप बहराइची

और अधिकप्रदीप बहराइची

    तप रहे हैं आज कल संबंध सारे

    लुप्त धीरज मंद रिश्तों के ये धारे।

    क्षुब्ध होकर तोड़ना अच्छा नहीं है

    ख़ुद समझ तू उम्र में बच्चा नहीं है

    उठ बचा ले टूटते अनुबंध सारे।

    हम बहुत कुछ जानकर अंजान होते

    मौन होकर रिक्तता को नित्य ढोते

    लग ही जाते अंततः अपने किनारे।

    छल रही है हीनता संवाद में अब

    घुट रही है ज़िंदगी प्रतिवाद में अब

    ख़त्म कर ये, बैठ अपनों संग प्यारे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रदीप बहराइची
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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