Font by Mehr Nastaliq Web

तन यह अवध हुआ जाता है

tan ye avadh hua jata hai

ओम निश्चल

ओम निश्चल

तन यह अवध हुआ जाता है

ओम निश्चल

और अधिकओम निश्चल

    ये कनेर के फूल अनूठे

    सुबह-सुबह अंजुरी में भर दूँ

    बन जाऊँ अनुराग तुम्हारा

    तुम भी अनुरागी बन जाओ!

    रात गए सोकर जागी है

    अभी-अभी यह चंचल तितली

    सुबह-सुबह की भोर कह रही

    फुनगी पर है किरण सुनहरी

    मंदिर के देवता जगे हैं

    मन में रस के भाव पगे हैं

    बन जाऊँ मैं कृष्णा तुम्हारा

    तुम मेरी मीरा बन जाओ।

    चंचल मन के वृंदावन में

    नाच रही वृषभान किशोरी

    गोकुल की गलियों में घर-घर

    मची हुई है हँसी ठिठोली

    फागुन के यह दिन बौराए

    बैरागी मन रास आए

    तन यह अवध हुआ जाता है

    मन से तुम मथुरा बन जाओ।

    कल-कल छल-छल यमुना बहती

    रास मची है तीरे-तीरे

    लहरें बजा रही हैं जैसे

    मन में आठों याम मंजीरे

    प्राणों में बजती सुर लहरी

    छेड़ रही है राग भैरवी

    मैं मल दूं गुलाल गालों पर

    तुम निर्झर अबीर बन जाओ।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ओम निश्चल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY