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खिली है धूप शरद के दिन हैं

khili hai dhoop sharad ke din hain

ओम निश्चल

ओम निश्चल

खिली है धूप शरद के दिन हैं

ओम निश्चल

और अधिकओम निश्चल

    खिली है धूप शरद के दिन हैं

    हवा नरम है शरद के दिन हैं।

    धुला-धुला सा आसमान नज़र आता है

    जैसे कोई फ़क़ीर गलियों में गाता है

    चित्‍त चंचल है शरद के दिन हैं

    बजती छागल है शरद के दिन हैं।

    फिर बहारों में उन्‍माद है खुमारी है

    सिरहाने पान सरौता है सुपारी है

    बैठकी ख़ूब है शरद के दिन हैं

    दिल में महबूब है शरद के दिन हैं।

    साँझ देखो तो नवोढ़ा की तरह आती है

    और महफ़िल में रौनक-सी पसर जाती है

    चाँद पुरनम है शरद के दिन हैं

    रात कुछ नम है शरद के दिन हैं।

    धान के हरेपन में कोई लहर-सी है

    शस्‍य श्‍यामल धरा घनाक्षरी-सी है

    नदी के घाट बोलते हैं शरद के दिन हैं

    हृदय में प्‍यार घोलते हैं शरद के दिन हैं।

    कहीं रहूँ कि मुझे ताजमहल दिखता है

    चांदनी रात में कान्‍हा का दिल मचलता है

    गोपियाँ नाच रही हैं शरद के दिन हैं

    छंद रस बाँच रही हैं शरद के दिन हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ओम निश्चल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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