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कृषक गीत

krishak geet

हम कृषक गबै छी गीत खेत-खरिहानक हौ,

अछि अपना श्रमक भरोस आश भगवानक हौ।

हम मानि रहल छी अपनाकेँ कर्मक अधिकारीटा,

कर्मक अधिकारीटा।

हम जानि रहल छी दुनिञाकेँ बस फड़ मँहकारीटा,

बस फड़ मँहकारीटा।

हम श्रमिक राखी लोभ कतहु सम्मानक हौ,

हम कृषक गबै छी गीत खेत-खरिहानक हौ।

लहलहा उठय बाध-वोन बस हमर पसेनासँ,

बस हमर पसेनासँ।

थरथरा उठय घोर दरिद्रा कृषकक सेनासँ,

बस कृषकक सेनासँ।

हमहीँ सेनानी हरित-क्रान्ति अभियानक हौ,

हम कृषक गबै छी गीत खेत-खरिहानक हौ।

धरतीक भूख नहि मेटा सकत चन्दापर गेलासँ,

चन्दापर गेलासँ।

अन्तरक मैल नहि धोआ सकत समता कहि देलासँ,

समता कहि देलासँ।

मिलि करह जोगाड़ सभक हित पान-मखानक हौ,

हम कृषक गबै छी गीत खेत-खरिहानक हौ।

हमरा प्रयोजन लोकमतक, हम अपनहिँ मतदाता,

हम अपनहिँ मतदाता।

नव बाट देखाबथु हमरा केवल कृषि अनुसन्धाता,

बस कृषि अनुसन्धाता।

हम उठा कोदारि करब पुनि युद्ध भयानक हौ,

हम कृषक गबै छी गीत खेत-खरिहानक हौ।

राखी लालसा अमरताक, हम मर्त्तयक वासी छी,

हम मर्त्तयक वासी छी।

गृहमे रहितहु जँ पूछी तँ असली संन्यासी छी,

असली संन्यासी छी।

अछि छूति मात्र नहि हमरामे अभिमानक हौ,

हम कृषक गबै छी गीत खेत-खरिहानक हौ।

स्रोत :
  • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 302)
  • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
  • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2025

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