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जन्म जन्मों की प्रतीक्षा

janm janmon ki prtiksha

रत्नेश अवस्थी

रत्नेश अवस्थी

जन्म जन्मों की प्रतीक्षा

रत्नेश अवस्थी

और अधिकरत्नेश अवस्थी

    जन्म जन्मों की प्रतीक्षा का यही अंतिम चरण है,

    मुस्कुराहट कुछ नहीं बस आँसुओं का आवरण है,

    भोर की लाली जाने क्यों हमीं पर तमतमाए,

    हम यही तो चाहते बस सो रहे मन को जगाए,

    क्या हमारे प्राण बोझिल हो गए हैं इस धरा पर,

    जबकि अपने सब दुखों को मर्सिए ख़ुद ही सुनाए,

    क्या हमारी देह का उठना ही मन का जागरण है,

    मुस्कुराहट कुछ नहीं बस आँसुओं का आवरण है,

    जब कभी टूटा हृदय तो चीख़कर हम रो पाए,

    आँख की रख कोर गीली उत्तरोत्तर मुस्कुराए,

    हम अभागे वो पथिक हैं जो नई पहचान लेकर,

    घूमते हैं एक चेहरे पर कई चेहरे सजाए,

    कुछ दुःखों की ओस में भीगा हुआ अंतःकरण है,

    मुस्कुराहट कुछ नहीं बस आँसुओं का आवरण है,

    आँसुओं ने ही सुनी है इस हृदय की चीख़ कातर,

    पर उसे गाया सदा ही होठ पर मुस्कान लाकर,

    है यही अंतिम निवेदन इस जहाँ में प्रेमियों से,

    जब कभी जाएँ जहाँ से भेजना बस मुस्कुराकर,

    घोर इस कलिकाल में झूठा हुआ सद् आचरण है,

    मुस्कुराहट कुछ नहीं बस आँसुओं का आवरण है,

    हम तुम्हारे प्रेम को बिसार कर प्रिये,

    जी रहें है तुमसे तुमको हार कर प्रिये,

    ख़्वाब-ख़्वाब तुमको हम सजाते रोज़ हैं,

    याद करके तुमको हम भुलाते रोज़ हैं,

    तुम से हार कर ये ज़िंदगी अधीर है,

    अब मिलन की कल्पना भी एक पीर है,

    थक गए हैं हम तुम्हें पुकार कर प्रिये,

    जी रहें है तुमसे तुमको हार कर प्रिये,

    तुम हमारी ज़िंदगी में बा-कमाल हो,

    हल नहीं हुआ जो तुम वही सवाल हो,

    तुमको सोच कर यूँ रोज़ गुनगुनाते हैं,

    बस तुम्हारे नाम के ही गीत गाते हैं,

    गढ़ रहे ये चित्र हम निहार कर तुम्हें,

    जी रहें है तुमसे तुमको हार कर प्रिये,

    कल्पना के इस जहाँ में तुम हमारी हो,

    तुम प्रिये हो राधिका-सी तेजधारी हो,

    तुम हो मेरी साधना तुम्ही प्रसाद हो,

    तुम अबोध कल्पना का साधुवाद हो,

    गए हैं तन को हम उतारकर प्रिये,

    जी रहें है तुमसे तुमको हारकर प्रिये,

    स्रोत :
    • रचनाकार : रत्नेश अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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