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हम नियति की कुटिल दृष्टि में पड़ गए

hum niyti ki kutil drishti mein paD ge

विशाल समर्पित

विशाल समर्पित

हम नियति की कुटिल दृष्टि में पड़ गए

विशाल समर्पित

और अधिकविशाल समर्पित

    हम नियति की कुटिल दृष्टि में पड़ गए

    दूर जाने का निर्णय हमारा था

    वेदना से हृदय का नगर पट गया

    साथ में यह हमारे गलत घट गया

    किन्तु आगे बढ़े सत्य स्वीकार कर

    दुर्दिनों का समय एक दिन कट गया

    अब कहीं दूर नक्षत्र रूठे नहीं

    और प्रतिकूल कोई सितारा था

    दुःख भरी ही होती, प्रणय की डगर

    हम यहाँ पर मिले ही होते अगर

    कल्पना की कथा सत्य होती नहीं

    यह समझते हुए उम्र बीती मगर

    तुम बिछड़ते समय रो दो इसलिए

    अश्रुपूरित नयन से निहारा था

    प्रेम की साँकरी-सी गली छोड़ दी

    भावना की नदी इक तरफ़ मोड़ दी

    कृष्ण ने राधिका से कहा कुछ नहीं

    दूर जाते हुए बाँसुरी तोड़ दी

    लौट आते बिरज, कृष्ण होकर विवश

    किंतु क्यों राधिका ने पुकारा था।

    स्रोत :
    • रचनाकार : विशाल समर्पित
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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