Font by Mehr Nastaliq Web

हम केकरा पर करीं सिंगार?

hum kekra par karin singar?

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

हम केकरा पर करीं सिंगार?

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    हम केकरा पर करीं सिंगार?

    सावन बीतल, भादो बीतल

    बीति गइल संउसे बरसात

    टुटही मड़ई में ठिठुरत

    बीतल जाड़ा के लमहर रात

    बहे फगुनवा के बयार

    तबहूं ना अइलें पिया हमार

    अब तकले इहो ना जनली

    होला कइसन चढ़ल जवानी

    ढरकि गइल बरसाते में

    अखियन के गगरिन्ह के सभ पानी

    सगरे उड़त अबीर, धुआं अस

    जिनिगी अब उड़त हमार

    कउआ, कोइलि, काग सभन के

    खोरा में हम खीर खिअवनीं

    आदमी के के कहो, बदरिअन

    के रोजे परदेस पठवनीं

    पथरइलीस आंखि, बाट जोहत

    हो गइल सांझि भिनुसार

    हम केकरा पर करीं सिंगार?

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम कबीर के बानी (चयन : अरविन्द कुमार) (पृष्ठ 21)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 2009

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY

    हिन्दवी उत्सव 2026

    रजिस्टर कीजिए