Font by Mehr Nastaliq Web

हरबा लय मनक व्यथा ई

harba lay manak vyatha ii

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

हरबा लय मनक व्यथा ई

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    सुनबा लय करुण कथा ई,

    हरबा लय मनक व्यथा ई,

    की आहो रामा, नहि छै ककरो पलखति समय गमाओत रे की।

    रहितहु हर्षक बेला,

    चारू दिस विपतिक मेला,

    की आहो रामा, देखि अधीर हृदय, के धीर धराओत रे की।

    हृदये नहि निर्मल ककरो,

    सत्ये नहि संबल ककरो,

    की आहो रामा, केवल स्वप्नक मधु-संसार बसाओत रे की।

    बन्धक छै लोटा-थारी,

    आङनमे फटलै साड़ी

    की आहो रामा, के सीमा पर सीना अपन अड़ाओत रे की।

    घर-घरमे बढ़तै शिक्षा,

    भेटय ने केवल भिक्षा,

    की आहो रामा, बाँटि बेसाहक अन्न हकन्न कनाओत रे की।

    इज्जति मर्यादा गेलै,

    कलियुगकेर दादा एलै,

    की आहो रामा, सत्य-अहिंसा नाङड़ि अपन कटाओत रे की।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 305)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY