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गुत्थियाँ उलझी रहेंगी

gutthiyan uljhi rahengi

प्रदीप बहराइची

प्रदीप बहराइची

गुत्थियाँ उलझी रहेंगी

प्रदीप बहराइची

और अधिकप्रदीप बहराइची

    गुत्थियाँ उलझी रहेंगी,

    यदि समय तुम मौन होगे।

    वाह्य मंडल है सुवासित

    शून्य है अंतस में ख़ुशबू,

    वेदना ही वेदना है

    वेदना का मोल बस तू,

    कामनाएँ नित मरेंगी,

    यदि समय तुम मौन होगे।

    कब क़सम खाई हमने,

    हाथ कब हमने जोड़े,

    उसने ली थीं फेर नज़रें

    उसने ही संबंध तोड़े,

    ये व्यथाएँ चिर बढ़ेंगी,

    यदि समय तुम मौन होगे।

    तन अचेतन हो रहा है

    हर जतन कर हार बैठा

    हाँ चकित हूँ घाव पर ये

    नेह का प्रतिकार कैसा

    पीर नद कलकल बहेंगी,

    यदि समय तुम मौन होगे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रदीप बहराइची
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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