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गीते सन मन गाउ स्नेहिके

gite san man gau snehike

विभूति आनंद

विभूति आनंद

गीते सन मन गाउ स्नेहिके

विभूति आनंद

और अधिकविभूति आनंद

    मोन हमर मथुरा-वृंदावन,

    छी अहाँक हरिद्वार

    कहू स्नेहिके शुद्ध हृदय सँ,

    कोनाकऽ उतरू पार!

    हम संवेदनशील कामना,

    सृष्टि करी विस्तार

    ब्रह्मा देलनि स्वाद तकर,

    भोगे टा निस्तार! आउ स्नेहिके...

    भोग रोग छी हमहूँ मानल,

    विवश किन्तु संसार

    इएह भाव तँ रुचिमे भेटल,

    संभव नहि प्रतिकार! आउ स्नेहिके...

    शील आर संकोच बिसारल,

    मनमे अछि अभिसार

    रागक जीवन वैरागी अछि,

    हाँफल जाइत कहार! आउ स्नेहिके...

    कोशिश तें करइछ पुरबैया,

    लऽ आमंत्रण-थार

    गली-महल्ला आतंकी सन,

    काँपय ठाढ़ विचार! आउ स्नेहिके...

    मंदिर धन सन अहो स्नेहिके,

    हऽम ठाढ़ पछुआर

    निकलू अहँ मन-राग सुनाबी

    इएह थिक मूलाधार! आउ स्नेहिके...

    अहाँ गंग केर शुचिता-सम छी,

    हम यमुना लाचार

    सरस्वती अन्तःसलिला रहि,

    कऽ जयती उद्धार! गाउ स्नेहिके...

    स्रोत :
    • पुस्तक : पीयर रौद पियरगर धरती (गीत-संग्रह) (पृष्ठ 12)
    • रचनाकार : विभूति आनन्द
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2018

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