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कानि रहल-ए कंगना

kani rahal e kangna

राम चैतन्य धीरज

राम चैतन्य धीरज

कानि रहल-ए कंगना

राम चैतन्य धीरज

और अधिकराम चैतन्य धीरज

    बरस बीतल दू बरस बीतल पहु नहि आयल छी अँगना

    कानि उठल माथा केर सिन्नूर, कानि रहल-ए कंगना।

    चिट्ठीपर छी आस राखि पिय हम सिंगार सजौने

    तेल-फुलैल सेंट जुट्टीमे जूही फूल लगौने

    अयना लग भऽ ठाढ़ देखै छी सोहाग रातिक सपना

    कानि उठल माथा केर सिन्नूर, कानि रहल-ए कंगना।

    साओनक घटा-घोर अछि लागल मेघ करैए घड़घड़

    एसकरि अन्हरिया रातिमे संगी छाती बाजै घड़घड़

    चौंकि उठै छी नीनोमे की कहि गेलहुँ अहाँ पहुना

    जहिना लिखबेँ पत्र बतहिया दौड़ल अयबो तहिना

    कानि उठल माथा केर सिन्नूर, कानि रहल-ए कंगना।

    हमर कोन अपराध कहू जे जीबैते घूटि मरै छी

    घधकल आगिक घघड़ामे व्यर्थे हम जरै छी

    बिसरि गेलहुँ निर्मोही प्रिय नहि मोन पड़ैए वैना

    कानि उठल माथा केर सिन्नूर, कानि रहल-ए कंगना।

    स्रोत :
    • पुस्तक : द्विपर्णा [मैथिली गीत एवं गजल] (पृष्ठ 10)
    • रचनाकार : राम चैतन्य धीरज
    • प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
    • संस्करण : 1982

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