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अहाँ बिनु घर अनजान

ahan binu ghar anjan

अशोक कुमार मेहता

अशोक कुमार मेहता

अहाँ बिनु घर अनजान

अशोक कुमार मेहता

और अधिकअशोक कुमार मेहता

    अहाँ बिनु लागए घर अनजान

    दिन बितए नहि, राति कटए नहि

    तहिना साँझ-बिहान।

    जहियासँ अहाँ गेलौं नहिरा

    आन्हर बौक बनल छी बहिरा

    भूख-पिआस सेहो निपत्ता

    देखि सेज सुनसान।

    मोन पड़ैए ओहि दिनुक झगड़ा

    घीयापुता लेल मचबैत रगड़ा

    विकट जाड़मे मुखमण्डल पर

    अहाँक बुनकल घाम।

    बनैये रोटी भारत केर नक्शा

    हम भेल छी बिनु तालाक बक्सा

    अहाँ नइ छी, तुबि रहल-ए

    टाट पर लतरल पान।

    अनका देखने हँसी लगै छल

    यैह दिन देखब, से के बुझै छल

    केओ नहि गमलनि हमर व्यथाकेँ

    जीवन बनल मसान।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पंछी बनी गगन केर… (मैथिली गीत-संग्रह) (पृष्ठ 31)
    • रचनाकार : अशोक कुमार मेहता
    • प्रकाशन : अनुप्रास प्रकाशन, मधुबनी
    • संस्करण : 2024

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