जाग्रत रूपी जीव है
jagrat rupi jeew hai
जाग्रत रूपी जीव है, शब्द सोहागा सेत।
जर्द बुन्द जल कूकुही, कहहिं कबीर कोई देख॥
जीव ज्ञान का रंग का है, परंतु भ्रांति एवं विषय-वासनापूर्ण शब्दरूपी सुहागा पाकर यह स्वर्णमय चेतन जीव अपने पद से पिघलकर जड़-बुद्धि का हो गया है। अतएव यह कर्म-वासनावश पिता के वीर्य एवं माता के रज में मिलकर जल बुदबुदारूप शरीर को धारण करता है। सद्गुरु कबीर कहते हैं कि इस प्रकार कोई बिरला ही समझता है।
- पुस्तक : बीजक: पारख प्रबोधिनी व्याख्या (पृष्ठ 371)
- संपादक : अभिलाष दास
- रचनाकार : कबीर
- प्रकाशन : कबीर पारख संस्थान
- संस्करण : 1969
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