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गुरु की भेली जिव डरे

guru ki bheli jiw Dare

कबीर

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गुरु की भेली जिव डरे

कबीर

और अधिककबीर

    गुरु की भेली जिव डरे, काया सींचनहार।

    कुमति कमाई मन बसे, लाग जुवा की लार॥

    भोगों से इन्द्रियों को तृप्त करने वाले देहाभिमानी लोग सच्चे सद्गुरु की शरणाधीनता एवं संगत से अथवा उनके मिष्ट उपदेशों से डरते हैं-दूर भागते हैं। कुबुद्धिपूर्वक कमाए हुए धन एवं भोग-ऐश्वर्य में ही उनका मन बसता है। उन्हें जुआ के व्यसन के समान अंट-संट धन कमाकर उसे भोगने की आदत हो जाती है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बीजक: पारख प्रबोधिनी व्याख्या (पृष्ठ 607)
    • संपादक : अभिलाष दास
    • रचनाकार : कबीर
    • प्रकाशन : कबीर पारख संस्थान
    • संस्करण : 1969

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