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आगि जो लागि समुद्र में

aagi jo laagi samundr me

कबीर

कबीर

आगि जो लागि समुद्र में

कबीर

और अधिककबीर

    आगि जो लागि समुद्र में, धुवाँ परगट होय।

    की जाने जो जरि मुवा, की जाकी लाई होय॥

    साधक के हृदयरूपी समुद्र में ज्ञान की आग लग गई। इसमें तो धुआं प्रकट होता नहीं है कि बाहर से कोई आग का अनुमान कर सके। इस आग को वही जानेगा जो इसमें जलकर मर चुका है, अर्थात ज्ञानाग्नि से जिसकी सारी आसक्तियां जलकर समाप्त हो गई हैं और वह जीवन्मुक्त हो चुका है या इसे वह सद्गुरु जानेगा जिसने इस आग को लाकर साधक के ह्रदय में लगाई हो।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बीजक: पारख प्रबोधिनी व्याख्या (पृष्ठ 448)
    • संपादक : अभिलाष दास
    • रचनाकार : कबीर
    • प्रकाशन : कबीर पारख संस्थान
    • संस्करण : 1969

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