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ये बोझ कोई मज़हब नहीं उठा सकता

अगर कोहाट में तब दंगे न हुए होते तो कमले की ससुराल वहीं होती, रावलपिंडी नहीं। रहीम ख़ान उन दिनों वहीं था। सब उसका आँखों देखा था। रहीम ने लालाजी की तरफ़ से जगप्रकाश अरोड़ा के ख़ानदान के तीसरे लड़के के लिए कमला की बात कर ली थी। जगप्रकाश ज़मींदार थे। ख़ूब खाता-पीता ख़ानदान था। पहला लड़का जगप्रकाश ने गुरुद्वारे वालों को अर्पण किया। दूसरा लड़का और दो बेटियाँ सिक्खों में ब्याही गई थीं। दो लड़के मोहन, अत्तर और एक बेटी नंदा देवी अभी कुँवारी थी। तय हो गया था कि मोहन की नौकरी लगते ही शादी की जाएगी। इतने में माकन सिंह का लड़का एक मुसलमान लड़की के साथ भाग गया और हिंदू-मुसलमान तनाव शुरु हो गया। पोठोहार में आजतक ऐसा तनाव समुदायों ने बीच नहीं देखा गया था। यह घटना सिर्फ़ माचिस की तीली थी। बारूद पहले ही बिछ चुका था। जन्माष्टमी पर सनातन धर्म सभा वालों ने भजनों की एक किताब निकाली थी—कृशन संदेश, जिसके एक भजन में मुसलमानों को अरब भेज देंगे और काबा में भव्य विष्णु मंदिर निर्माण करेंगे जैसी बातें कही गई थीं। ग़ुस्से में लोकल मुसलमान नेताओं ने मस्जिदों में मीटिंग करनी शुरु कर दी कि पता नहीं किस दिन ये मार-काट मचा देंगे और हमारी कोई तैयारी नहीं होगी। सनातन सभा वालों को पता लगा तो उन्होंने भी छतों पर असलहा जमा करना शुरु कर दिया। उस दिन बाज़ार से गुज़रते हुए रहीम ने एक झड़प देखी।

“सर फिर गए हैं तुम सब लोगों के। पहले तुसाँ मारो या पहले वो लोग मारें जो ख़ून बहेगा ओ साड्डा बुढापा ख़राब करने के लिए होगा। अम्न से रहो, बातचीत करो, कौन-सा मसअला है जेड़ा हल नहीं हो सकदा।” पास के गाँव से आए एक उम्रदराज़ मौलवी समझा रहे थे।

“आपको पता नहीं हिंदू अख़बार गुरु घंटाल ने क्या-क्या लिखा है, इस्लाम के बारे में? भूल गए रंगीला रसूल? और अब ये कृशन संदेश? क्या बातचीत करें इनसे बताइए! आए दिन ये कुछ न कुछ भड़काने वाली बात करते हैं। हमारा भी मुल्क है। कहाँ भाग जाएँ हम। या इनके ज़ुल्म सहते रहें? आपसे कुछ नहीं हो सकता तो आप चुप बैठें।” ग़ुस्से में अहमद ग़ुल कुछ समझना नहीं चाहते थे।

“जैसी आप लोगों की मर्ज़ी, लेकिन बेगुनाहों का ख़ून बहना तय है। ये बोझ इस्लाम क्या कोई मज़हब नहीं उठा सकता। मेरी इल्तिजा बस इतनी है कि टाउन हॉल में आज मीटिंग चल रही है, सनातन धर्म सभा के लीडरान की। थोड़ा सब्र कर लो। देखो, क्या कहते हैं!” कहकर मौलवी निकल गए।

इलाक़े का सारा मिज़ाज गरमा गया था। मुसलमान लीडर क्या कह रहे हैं, सब बातें पहुँच रही थीं जीवन दास तक। उधर टाउन हॉल में मीटिंग में सनातन सभा के सेक्रेटरी जीवन दास भाषण दे रहे थे।

“हालाँकि इन्होंने भी अपने अख़बार में हिंदू विरोधी बातें लिखकर हमें भड़काने की कोशिश की। जवान ख़ून तो यह सब बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करता, रौ में बहकर कुछ न कुछ कर जाता है। लेकिन चलो, हो गया जो हो गया। ऐसी कोई नीयत हमारी थी नहीं। तो बात को यहाँ ख़त्म करते हैं। किताब का वह पन्ना फाड़कर अलग कर देते हैं।” यह कहकर पैम्फ़ेलेट से जीवन दास ने वह पन्ना फाड़ दिया और बाक़ी कुछ साथियों ने भी बाक़ी पैम्फ़ेलेट से वह पन्ना फाड़ दिया। कुछ युवा जीवन दास के भी विरोध में थे। जगप्रकाश अरोड़ा और उनके बेटे मोहन और अत्तर भी इस मीटिंग में थे। जगप्रकाश जीवन दास के साथ खड़े थे और मोहन अपने दोस्तों के साथ बहुत पीछे।

“जो डर गया वो सनातनी कैसा? कुछ ग़लत नहीं किया हमने। जो उन्होंने लिखा उसी का जवाब दिया है। हम आगे भी ऐसे ही जवाब देंगे। अल्फ़ाज़ दा जवाब अल्फ़ाज़ नाल ते बंदूक दा बंदूक नाल।” अचानक मोहन की आवाज़ आई। कुछ युवा आवाज़ें मोहन के साथ थीं। मुसीबत की इस घड़ी में आर्यसमाजी भी सनातनियों के साथ खड़े थे। जगप्रकाश अरोड़ा को जीवन दास ने कान में कुछ कहा। ज़्यादातर समझ गए थे कि नब्बे फ़ीसद से उलझना मूर्खता होगी, हम मुट्ठी भर हैं उनके सामने।

“जो हुआ सो हुआ। हम आगे ख़ून-ख़राबा नहीं चाहते। यह डरना नहीं है, लिहाज़ है जो हम कमिश्नर साहब का कर रहे हैं। पोठोहार का माहौल बिगाड़ने का इल्ज़ाम हमारे सर क्यों जाए!” जगप्रकाश ने वहीं से तेज़ आवाज़ में कहा।

पीछे लड़कों के बीच खुसुर-पुसुर चलती रही। माफ़ी की बात से कोई संतुष्ट न था। इधर मीटिंग का ब्यौरा तैयार किया गया जिसमें लिखा था कि पैम्फ़ेलेट की सभी प्रतियों से वह पन्ना हटा दिया जाएगा और मुस्लिम समुदाय की भावनाएँ दुखाने के लिए माफ़ी भी माँगी गई।

“जगप्रकाश, रिपोर्ट की एक कापी कमिश्नर अहमद ख़ान को भिजवा दो और मुस्लिम लीडरों को भी। ख़ास तौर से अहमद ग़ुल को।” जीवनदास बोले।

“कमिश्नर शायद समझ जाए, लेकिन आपको लगता है अहमद ग़ुल मान जाएगा? वह कब से मौक़े की तलाश में है।” जगप्रकाश ने संशय से पूछा।

“यह सब गांधी जी के ख़िलाफ़त मूवमेंट को सपोर्ट करने की वजह से हुआ है। वो कुछ भी करें लेकिन यहाँ कुछ हमारी वजह से हुआ तो अनशन पर बैठ जाएँगे। उन्हें समझ नहीं आता कि अनशन की धमकी से हिंदू-मुसलमान को ज़्यादा दिन साथ नहीं रखा जा सकता। हमारे फ़र्क़ बुनियादी हैं। कुछ भी तो नहीं मिलता!” जीवन दास के हाथ में एक किताब थी। उसे अपने झोले में रखते हुए उन्होंने जगप्रकाश को संजीदा ढंग से देखा।

“तैयार रहिए, कुछ भी हो सकता है। चुपचाप मंदिरों, गुरुद्वारों में सभाएँ कीजिए और रणनीति तैयार कीजिए। भनक न लगे। अपनी बहन-बेटियों की आबरू बचाना हमारा काम है। गांधी जी और कांग्रेस के भरोसे छोड़ कर नहीं बैठ सकते।” कहकर जीवन तेज़ी से निकल गए।

मस्जिद के बाहर भीड़ लगी थी। रहीम की ड्यूटी वहीं थी जब अहमद ग़ुल के पास सनातन धर्म सभा के रेज़ोल्यूशन की कापी पहुँची और उसने बदले में एक मीटिंग बुला ली।

“हम इसे नहीं मानते। उन्हें लगता है एक काग़ज़ के बूते हमें बेवक़ूफ़ बना देंगे तो ऐसा नहीं होगा। हम सुप्रिटेंडेंट और कमिश्नर के दफ़्तर पर धरना देंगे। जीवन दास को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए। इनकी आदत है जब सामने से कोई आकर अड़ जाए तो माफ़ी माँग लेंगे, बिल में छिप जाएँगे कुछ दिन और मौक़ा पाकर पीठ पीछे ख़ंजर गड़ा देंगे। अभी माकन सिंह का लड़का हमारी मुसलमान लड़की लेकर भागा है। कल को इनकी हिम्मत बढ़ी तो हमारी औरतों की अस्मत बचाना मुश्किल हो जाएगा।” अहमद ग़ुल और क़ाज़ी साहब ने भीड़ को अपने पीछे लिया और कमिश्नर दफ्तर चल पड़े। रहीम को लग रहा था दोनों तरफ़ से कुछ तो ग़लती हो रही है। माफ़ी आ गई उसे मान लेना चाहिए। कमिश्नर दफ़्तर के बाहर वह प्रीतम से टकरा गया।

“बात हमारे हाथों से बाहर निकल चुकी। बलोच और मुल्तान फौजिच रह के देखो, ऐ कदी साड्डे नाल खड़े ना होसाँ।” प्रीतम अपने एक साथी से कह रहा था कि अचानक रहीम ने कंधे पर हाथ रखा।

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सुजाता के सद्य प्रकाशित उपन्यास ‘दरयागंज वाया बाज़ार फ़त्ते खाँ’ से एक अंश

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