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शंखनाद : नौवीं फ़ेल डॉ. साहब

भगवत् कृपा से, कुछ अपने करम और कुछ दूसरों की मेहरबानी से, जीवन में किसी और चीज़ की भले ही कमी हो, बदनाम होने और बेइज़्ज़त होने के मौक़ों की कोई कमी नहीं रही। मज़े की बात यह है कि अभी भी इसमें कोई कमी नहीं आई है। यह बदस्तूर जारी है।

इस क्रम में यह घटना ख़ासतौर पर तब की है, जब मैं दर्जा नौ में पढ़ता था। यह तो सिर्फ़ भौतिक बात हुई कि मैं नौवीं में पढ़ता था, पर आध्यात्मिक बात यह थी कि उन दिनों फ़िल्मकार बनने के सपने ने मुझे काट खाया था। यह सपना बेइज़्ज़ती का स्थायी सबब था। लेकिन इसके चलते मेरे जीवन का हर पल सिनेमैटिक अनुभव में तब्दील हो गया था। इसके प्रभाव में जीवन-जगत में जो कुछ भी घटित हो रहा था, वह इस खोज को समर्पित रहता था कि “इसे सिनेमा के मुहावरे में कैसे कहेंगे?”

लिहाज़ा, आध्यात्मिक रूप से मेरा बौद्धिक स्तर तीसरी क्लास, मतलब थर्ड क्लास से भी नीचे का था। बल्कि सच कहें तो अभी भी उसी के आस-पास है। इस अधम क़िस्म की आध्यात्मिक यात्रा तथा पढ़ाई के ज़रूरी उपादानों—जैसे किताबें, कॉपियाँ और पेन इत्यादि—के अभाव के चलते मन डबल शिफ़्ट की शूटिंग में ही लगा रहता था। इसका सुपरिणाम यह हुआ कि छमाही के अलावा मैं सालाना परीक्षा में भी सम्मान फ़ेल हुआ।

छमाही परीक्षा से तुरत पहले मुझे मामा के यहाँ जाने का सौभाग्य मिला। अलबत्ता, मामा के साथ पैदल-पैदल ही जाना था। यानी बस्ती से अम्बेडकर नगर, तत्कालीन फ़ैज़ाबाद।

दुबौलिया बाज़ार से दक्षिण में अथाह बिखरी रेत मुझे जीवन की विराटता का अनुभव करा रही थी और मेरा फ़िल्मकार उस पर एक रोमांटिक-सा सीक्वेंस शूट कर रहा था। लेकिन सेरवा घाट पर जब हिलती नाव में बैठा तो डर के मारे मामा के पास दुबक गया। रोमांटिक सीक्वेंस स्थगित करके हॉरर पर आ गया।

कुल-मिलाकर मैं इतना डर गया कि बड़ी-बड़ी आँखों में गहरा काजल लगाए बैठी हमउम्र लड़की को देखना भी भूल गया। शुरुआती हलचल के बाद जब नाव धारा में पहुँची तो लड़की निर्मल जल देख रही थी और मैं मामा का टेक लिए कनखियों से निर्मल लड़की के चेहरे पर कैमरा क्लोज़-अप में लगाए बैठा था। बीच धार में नाव ने ऐसा झटका दिया कि मेरे मुँह से चीख़ निकल गई। इससे नाव में मेरे बग़ल ही खड़ी बकरियाँ भागने लगीं और लड़की को हँसी आ गई। उसके साथ की औरत ने, जिसके अपने घूँघट का एक सिरा दाँत में दबा रखा था, इशारे से लड़की को बरजा। पर मेरे भोदूपने को देख-देखकर लड़की मंद स्मिति में अटक गई।

मामा ने भाँजे का हौसला बढ़ाया और जनता को बताया कि भाँजा है और पहली बार नाव पर बैठा है। मामा मेरे बचपन की कायरता के क्रांतिकारी क़िस्से कहने लगे। अब मेरे पास सिवाय आँखें बंद करके सो जाने की एक्टिंग के अलावा कोई चारा न था। लड़की अब आँखें और बड़ी करके मुझ डरपोक पर हँस रही थी।

मामा आस-पास के गाँव और उनसे मेरे परिवार की रिश्तेदारियों के बारे में बताते चल रहे थे। उन अनदेखी जगहों के बारे में, जहाँ हमारी आजियों-परदादियों का बचपन बीता था, जहाँ से हमारी जड़ें जुड़ी थीं। उनसे गुज़रते हुए उस अजनबी परिवेश तक में मुझे लग रहा था कि मैं अपने आँगन में ही चल रहा हूँ।

आज जब मैं उस अनुभव को फिर याद कर रहा हूँ तो लगता है कि जैसे उस दिन मैं प्रार्थनाओं के वलय में चल रहा होऊँ।

चिनगी, इलफ़ातगंज, गोसाईंगंज, महबूबगंज, मिझौरा और पता नहीं कौन-कौन से पड़ाव थे रास्ते में। मिझौरा में तब तक चीनी मिल नहीं बनी थी। गाँव-गाँव में कोल्हार चल रहे थे, जिससे गाँव गुड़ की सोंधी महक में धुएँ से लिपटे हुए थे।

रास्ते में कई जगह रुकना हुआ, जहाँ मनुहार करके हमें गुड़ खिलाया गया। गन्ने का ताज़ा हरा रस और गुलौरी की आग में भुने आलू, धनिया और लहसुन के पत्ते की चटनी परोसी गई।

देर शाम बेनीपुर पहुँचने के बाद मेरी मेमेरी भाभियों ने शर्मीले देवर की पुत्रवत् ख़ातिरदारी की। सुबह उठा तो मामा नदारद थे। भाभियों से पता चला कि वह मैनेजर साहब के यहाँ गए होंगे।

अब मैनेजर साहब कौन हैं, यह तब तक नहीं पता चल पाया...

अगली सुबह मामा मेरी जिज्ञासा के शमन के लिए मुझे ख़ुद तैयार कराकर मैनेजर साहब के घर ले गए। रविवार का दिन था। धूप में एक तख़्त पड़ा था, उसके आस-पास दो-तीन कुर्सियाँ रखी थीं। मैनेजर साहब धूप में बैठे तेल-फुलेल मलकर नहाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने मामा और मामा के भाँजे को सादर बिठाया। घर की तरफ़ मुख़ातिब होकर चाय-पानी लाने का निर्देश दिया और ख़ुद नहाने चले गए।

उनके आदेश पर अंदर से प्रत्युत्तर आया—“लाई पापा!”

मैंने कुर्सी ऐसे एंगल पर मोड़ ली कि ‘लाई पापा’ पर नज़र रखी जा सके और नायक-नायिका के प्रथम साक्षात्कार को पर्दे पर कैसे दिखाया जाए, इस संभावना को जिया जा सके।

‘लाई पापा’ के तसव्वुर को चकनाचूर करते हुए एक कृशकाय लड़की एक ट्रे में धनिया की पत्तियों में लिपटी, भाप उठती मटर की घुघुरी और चाय लेकर आई थी।

‘लाई पापा’ जनित और एक सिनेमाई दृश्य के असमय कलविलित हो जाने की निराशा से उबरने के लिए मैं खाने पर फ़ोकस करते हुए गरमागरम घुघनी का एक बड़ा चम्मच भरकर उदरस्थ करने ही जा रहा था कि मामा ने कुहनी मारकर रोक दिया और सरगोशियों में कुछ कहा, जिसका आशय यह था कि हल से छूटे बैल की तरह नहीं, आदमी की तरह खाओ। कहीं भागी थोड़े ही जा रही है...

मैनेजर साहब पूजा-पाठ करके आ गए थे। मामा दोनों हथेलियों को जोड़कर विलंबित लय में ताल दे रहे थे और मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। मामा ने खँखारा, जो उनकी चिर-परिचित खँखार से अलग था और क़ायदे से मुझे चौकन्ना हो जाना चाहिए था। पर मेरे जीवन और क़ायदेपन का कोई संबंध न रहा है।

मैनेजर साहब से हाल-चाल की रस्म निपटाने के बाद अचानक मेरा तार्रुफ़ कराते हुए बोले, “ये मेरा भाँजा है और डॉक्टरी पढ़ रहा है।”

खौलती चाय और मामा की बात का ऐसा असर हुआ कि चाय का कप छूटते-छूटते बचा।

मैनेजर साहब ने अब उदीयमान फ़िल्मकार को फ़ोकस में लिया। फ़िल्मकार महोदय छुईमुई से सिकुड़ गए। उन्होंने अविश्वास से जानना चाहा कि मैंने सी.पी.एम.टी. परीक्षा कब पास की।

मामा को बचाने को कृतसंकल्पित भाँजा सी.पी.एम.टी. ही पहली बार सुन रहा था। लिहाज़ा ज़्यादा दूर न जाकर तुरत ही झूठ बोलने के इरादे छोड़ दिए और स्वीकार किया कि मैं अभी सिर्फ़ नौवीं में पढ़ रहा हूँ।

उन्होंने मुझे परिश्रम से पढ़ने की सलाह दी और मामा को उनका प्रिय वाला ज़र्दा खिलाया। थोड़ी देर गपशप के बाद हमें विदा किया।

तो देवियो और सज्जनो, बात यह थी कि मैनेजर साहब अपनी बी.ए. पास कृशकाय लड़की के लिए वर की तलाश में हलकान थे। मामा मुझे उनके सुपुर्द करके उनकी मदद करना चाह रहे थे। इस क्रम में मैं पिट गया।

रास्ते भर मामा-भाँजे के बीच अबोला पसरा रहा।

अगली सुबह मेरी सुबकती भाभियों ने मुझे विदा किया। मामा मुझे सीधे दौड़ते हुए उन्हीं राहों से घर ले आए और मेरी माँ और अपनी बहन से बोले, “तुम्हारा यह लड़का बैल है।”

माँ ने अपने बैल को कलेजे से लगा लिया। कारण? बैल के बच्चे माँ को ज़्यादा प्रिय होते हैं...

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