Font by Mehr Nastaliq Web

हादसा और हदस

हादसा और हदस में अंतर है, लेकिन केवल ‘आ’ की मात्रा का। जब हम कोई हादसा होते हुए देखते हैं तो ‘हदस’ जाते हैं। हम भोजपुरिया लोगों के यहाँ इसी शब्द का इस्तेमाल होता है। लेकिन तब क्या हो, जब आपके साथ ही इस तरह का कोई हादसा हो जाए? या आप जहाँ बैठे हों, वहीं इस तरह का हादसा हो जाए, तब आप क्या कीजिएगा? जिस साधन से आप जा रहे हों, उसी साधन से कोई बड़ा हादसा हो जाए तो? ठीक ऐसा ही हुआ उस दिन। जब आप अपनी आँखों के सामने ये सब देखते हैं तो आपकी आवाज़ बंद हो जाती है। आप अवाक् रह जाते हैं, कुछ कह नहीं पाते। ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है, मानो आपको साँप सूँघ गया हो।

जीवन क्या है? लोग कहते हैं, चलने का नाम ही ज़िंदगी है। लेकिन उसका क्या, जो चला जा रहा हो और अचानक उसे रौंद दिया जाए? तब आप क्या कहेंगे? दुनिया भी कितनी ज़ालिम है! वह कहेगी कि ‘बस, तुम्हारा चलना इतना ही लिखा था इस जहाँ में।’ इसीलिए गुरुदत्त ने ‘प्यासा’ मूवी में ठीक ही कहा [गीतकार : साहिर लुधियानवी] था—‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।’

तीन दिन पहले हम बनारस से निकलकर कलकत्ता होते हुए वाया ट्रेन से हल्दिया पहुँचे थे। देवरानी को बिटिया हुई थी, हमें उससे मिलने जाना था। हम नौकरीपेशा लोगों के पास मोहलत कहाँ होती है! परिवार और रिश्तेदारियों में उत्सव या दुख के मौक़े पर भी शरीक होने के लिए हमारी नज़रें छुट्टियों पर ही टिकी रहती हैं। हम देखते रहते हैं कि अगले हफ़्ते या महीने कौन-सी छुट्टी आ रही है। हाँ, रविवार को छोड़कर। यदि कोई छुट्टी सप्ताह के अंत में, जैसे शनिवार को पड़ जाए, तो रविवार भी फलीभूत हो जाता है। ऐसे में रविवार का क़द हमारी नज़रों में और बढ़ जाता है। इस बार सितंबर में जन्माष्टमी की छुट्टी हमारे लिए वरदान सिद्ध हुई। हमने एक-दो कैज़ुअल लीव लेकर हल्दिया के लिए प्रस्थान किया।

कलकत्ता से हल्दिया की दूरी महज़ 140 किलोमीटर है। आप बस, कार और ट्रेन से भी यहाँ पहुँच सकते हैं। हल्दिया पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर ज़िले में स्थित एक औद्योगिक शहर है और भारत के पूर्वी समुद्रतट का एक प्रमुख बंदरगाह भी है। यहीं इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) का प्लांट है, जहाँ सचिन (देवर) काम करता है। वह IOCL में इंजीनियरिंग विभाग में मैनेजर के पद पर कार्यरत है।

तीन दिनों में हम अपने रिश्तेदारों से मिले, बिटिया को प्यार-दुलार किया। समुद्री तटों की तरफ़ गए, जहाँ बड़े-बड़े जहाज़ और पावर प्लांट देखे। हल्दिया के छोटे-छोटे मार्केट भी देखे। मछली मार्केट गए, जहाँ तरह-तरह की मछलियाँ बिक रही थीं। लोग सिंगूर और नंदीग्राम से समुद्र के उस पार से आते और सामान बेचकर शाम होते-होते वापस निकल जाते।

यहाँ एक मोहना मार्केट है, जहाँ रोज़मर्रा की ज़रूरत का लगभग सारा सामान मिलता है। दुकानदार और मज़दूर सब उसी समुद्री रास्ते से आते हैं। इस मार्केट की ख़ासियत यह थी कि यह सुबह नौ बजे खुलता और दोपहर एक बजे भोजनावकाश के समय बंद हो जाता। फिर शाम पाँच बजे के बाद ही धीरे-धीरे दुकानें दोबारा खुलतीं। आप जितनी भी आजमाइश कर लें, अवकाश के बीच कोई सामान नहीं मिल सकता। यह इस मार्केट का नियम है, जो मुझे बहुत अच्छा लगा। यहाँ जगह-जगह मोमोज़, पानी-पूरी और झालमूड़ी की दुकानें मिलेंगी, जिनका स्वाद भी काफ़ी लाजवाब होता है।

छुट्टियों की अवधि कितनी कम होती है! वे पलक झपकते ही ओझल होने के लिए तैयार बैठी रहती हैं। आज हमारी वापसी का दिन था।

हम हल्दिया बस स्टॉप पर पहुँच चुके थे। हमें कलकत्ता के लिए निकलना था। हमारी शाम की ट्रेन हावड़ा से थी। हम घर से दोपहर डेढ़ बजे के क़रीब निकल चुके थे। मौसम लुका-छिपी का खेल खेल रहा था। मतलब, बारिश होने जैसा मौसम था। जो कपड़े सूख चुके थे, उन्हें उठाकर घर के भीतर रख दिया गया था और जो थोड़े गीले रह गए थे, उन्हें पंखे के नीचे सूखने के लिए डाल दिया गया था। देवर की नवजात बच्ची देवश्री को प्यार करके हम घर से निकल गए।

जैसे ही हम बस स्टॉप पहुँचे, वहाँ कोई बस नहीं लगी थी। यहाँ सरकारी बसों का एक निर्धारित समय होता है। लेकिन अब तक तो यही समझ आया था कि सरकारी चीज़ों का कोई समय नहीं होता; जब मर्ज़ी हो, तभी चीज़ें चलेंगी। लेकिन ठीक दो बजे बस अपने निर्धारित समय पर चल पड़ी। वह दस मिनट पहले ही आकर खड़ी हो गई थी। सुमित और सचिन जाकर टिकट ले चुके थे। सचिन, उसकी बिटिया और ससुर जी हमें विदा करने आए थे।

आश्रीर्य बिटिया का मन नहीं था कि वह आयांश (मेरा बेटा) को जाने दे। इन तीन दिनों में दोनों की नोक-झोंक, खेलना-झगड़ना और रूठना-मनाना जारी रहा था। अब जाने का वक़्त था तो वह अपने भाई को कैसे जाने देती! ज़ाहिर-सी बात है कि एक ही परिवार के लोग जब नौकरी के चलते एक छत के नीचे रहने के बजाय अलग-अलग शहरों में रहने को मजबूर और बेबस होते हैं, तो इसका सारा भुगतान छोटे बच्चों और बुज़ुर्गों को ज़्यादा करना पड़ता है। यह रिश्तों का प्रवास है। इसे कोई साहित्य कैसे दर्ज करेगा, यह वक़्त और आने वाली पीढ़ियाँ बताएँगी।

आयशी से बहाना किया गया कि हम कलकत्ता जाकर सुई लगवाएँगे और शाम की बस से वापस आ जाएँगे। बच्चों को बेवक़ूफ़ बनाना पुरानी पीढ़ी को कभी नहीं आएगा। आज के बच्चे समझ जाते हैं कि यह पीढ़ी उन्हें बेवक़ूफ़ बनाने की कोशिश करेगी, लेकिन वे बेवकूफ़ नहीं बनेंगे। आयशी ज़िद पर अड़ी रही, लेकिन उसकी ज़िद किसी काम की न थी। फिर भी उसने रोते-धोते, आधे मन से हमें विदा किया।

ठीक दो बजे हमारी बस निकल पड़ी। उसकी रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि हमारे चेहरे पर कम से कम एक पाव धूल जमा हो चुकी थी। हवा में धूल उड़ाती वह बस रास्तों को चीरती हुई जा रही थी। कभी छलाँग लगाती, कभी उठापटक करती—ठीक ‘राग दरबारी’ के ट्रक की तरह। वह केवल आने वाले बस स्टॉप पर रुकती और फिर रफ़्तार पकड़ लेती। इस तेज़ रफ़्तार बस में यात्री चढ़ते और उतरते जा रहे थे।

मैंने बाईं तरफ़ खिड़की का एक कोना पकड़ लिया था। चूँकि बारिश की वजह से हवा में ठंडक थी, लेकिन अगर ऐसा न भी होता, तो जिस रफ़्तार से बस चल रही थी, खिड़कियों से हवा का भीतर आना स्वाभाविक था। हमारी सीटें 35, 36 और 37 थीं। लेकिन खिड़की वाली सीट पर आयांश जी ने अपना सिक्का जमा लिया था। मेरा भी मन खिड़की के पास बैठने का था। हमारी सीटें पीछे से तीसरी पंक्ति में थीं। इसलिए मैंने सामने ही बाईं तरफ़ वाली खिड़की चुन ली और वहीं बैठ गई।

बस शुरू-शुरू में ख़ाली थी। सोचा, जिसकी सीट है, अगर कोई आया तो देखा जाएगा। इसलिए मैं वहीं जमी रही। लोग आते गए, बैठते गए और उतरते गए। मेरी बग़ल में एक लड़की बैठी थी और उसके ठीक बगल में एक आदमी खड़ा था। मुझे लगा कि वह लड़की उस आदमी की वजह से बहुत असहज हो रही है। मैंने उससे पूछा, ‘क्या तुम्हें कोई दिक़्क़त हो रही है?’ उसने ना में सिर हिला दिया। लेकिन जब मैं उससे यह पूछ रही थी, तब सामने खड़ा आदमी थोड़ा सतर्क हो गया।

उस लड़की के चेहरे पर एक डर था। पता नहीं क्यों, उसकी उम्र में मेरे साथ भी जब ऐसा हुआ था, तब मैं भी इसी तरह के डर से भयभीत थी। आज तक हम लड़कियाँ यह बात समझ ही नहीं पाई हैं और न जाने कब समझ पाएँगी कि सबसे ज़रूरी बात क्या है। हमारी ट्रेनिंग भी ऐसी नहीं है कि हमारे साथ कुछ ग़लत हो तो हम वहीं उठकर उसका सामना कर सकें। दे दें वहीं एक घूँसा या तमाचा! इतना भी न सही, कम-से-कम शब्दों के बाण तो चला ही सकती हैं। भरे समाज में उस व्यक्ति को ग़लत हरकत करने में डर नहीं लगता, तो हम उसे उसके किए पर शर्मिंदा करने से क्यों डरें? लेकिन यह ट्रेनिंग से ही संभव हो पाएगा। हमारा समाज इतना विकसित नहीं हुआ है कि हम ऐसे लोगों को कुछ बोल सकें और उन्हें उनके किए की सज़ा दिला सकें। ख़ासतौर से जब लड़कियों के बोलने पर पितृसत्तात्मक मानसिकता वाले लोग कुछ सुनने को तैयार ही न हों।

उस आदमी की बहन सामने वाली सीट पर बैठी थी। भीड़ इतनी थी कि धक्का-मुक्की भी चल रही थी। नौकरीपेशा आदमी, औरतें, लड़के-लड़कियाँ, मज़दूर इत्यादि सब चढ़ रहे थे और उतर रहे थे। बस अपनी रफ़्तार से चल रही थी। मैंने हाथ में घड़ी नहीं पहनी थी, इसलिए समय का पता नहीं चल पा रहा था।

भीड़ को कम होता देख मैंने पास ही खड़े एक लड़के से अपना बैग उतारने के लिए कहा। उसने सीट के ऊपर सामान रखने की जगह से मेरा बैग उतारकर दे दिया। मैंने अपना फ़ोन बैग में रख दिया था। इसलिए समय का पता न होना इसका प्रमुख कारण था। वैसे भी आजकल लोग घड़ी की जगह समय देखने के लिए आदतन फ़ोन का ही इस्तेमाल करते हैं।

मैंने देखा, तीन बजने वाले हैं। मुझे अपनी स्टूडेंट को मैसेज करना था कि मैं निकल चुकी हूँ। वह बीएचयू से एमए पूरा करने के बाद अपने शहर कलकत्ता लौट आई थी। वह मुझसे मिलना चाहती थी। उसे भी हावड़ा पहुँचने में दो घंटे लगते। इसलिए पहले ही सूचित कर देना सुविधाजनक होता।

उसे सूचित करके मैंने अपना फ़ोन फिर से बैग में रख दिया। बैग से एक किताब निकाल ली, जिसे बनारस से निकलते वक़्त अपने पास रख लिया था। दो दिन की यात्रा में चार कहानियाँ पढ़ चुकी थी और सुबह-सुबह घर से निकलते वक़्त भी एक कहानी पढ़ ली थी। इरादा था कि इस यात्रा में किताब पढ़कर ख़त्म कर दूँगी, लेकिन ऐसा संभव न हो सका। पढ़ने के इरादे से किताब निकाली और पढ़ने लगी।

थोड़ी ही देर में बस में जगह हुई तो मेरी बग़ल में बैठी लड़की अपने गंतव्य पर पहुँचने के लिए उतर गई। आयांश, जो अब तक अपने पिता के साथ खिड़की के पास बैठा था, मेरे पास आकर बैठ गया।

“मम्मा, क्या कर रही हो?”
“किताब पढ़ रही हूँ, बेटा।”

इतना कहकर मैंने किताब बंद कर दी और उसके साथ बातें करने लगी।

अब हम दोनों खिड़की के पास बैठकर बाहर के दृश्य देखने लगे। चलती हुई बस की खिड़की से बाहर की दुनिया को देखकर उसके मन में हज़ार सवाल उठ रहे थे। बच्चा है, उसके मन में हज़ार सवाल रोज़ नहीं, बल्कि मिनटों में उठते हैं। वह पूछता जाता और मैं हैरान होती जाती कि पाँच साल का यह बालक कितने और कैसे सवाल करता है!

“मम्मा, वो बिल्डिंग पीली क्यों है? नारियल के पेड़ यहाँ इतने सारे क्यों हैं? वो तो केरल में ज़्यादा मिलते हैं।” और फिर ऐसे ही अनगिनत सवाल। 

उसके हाथ में लिटिल हार्ट बिस्किट का एक पैकेट था, जिसमें गिनकर पाँच ही छोटे-छोटे दिल के आकार के बिस्किट थे। हम दोनों का दिल भी उन्हीं पाँच लिटिल हार्ट पर अटका हुआ था।

कहीं वह स्टूडेंट पहुँच तो नहीं गई है, इसी उद्देश्य से बैग से मोबाइल निकाला और समय भी देख लिया। चार बजने वाले थे। इतने में अचानक बस उछली और साइड से जा रही एक बाइक से टकरा गई। मैं अपनी आँखों से देख रही थी कि बाइक पर बैठा आदमी बस की तरफ़ लुढ़क गया। ड्राइवर ने बस की स्पीड इतनी तेज़ कर रखी थी कि उसने बस रोकी भी नहीं। वह लगभग 500 मीटर तक बस को भगाता ले गया।

यह हादसा देखकर मैं हदस गई थी। इस घटना ने मेरे तन-मन में एक अजीब-सी बेचैनी और हदस को उत्पन्न कर दिया। अचानक बस में गहमागहमी होने लगी। कुछ ही मिनटों में बस धीरे-धीरे पीछे खिसकने लगी। बस में बैठे लोग अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहे थे कि आख़िर हुआ क्या है? इतने में ड्राइवर चलती बस से उतरकर भाग गया।

अब सभी लोग हदस चुके थे। भगदड़ की स्थिति पैदा हो गई। लोग बस से उतरने के लिए भागने लगे। मैं अभी अपनी जगह पर ही बैठी थी और यह संज्ञान लेने की कोशिश कर रही थी कि आख़िर हुआ क्या है। सामने वाली सीट से सुमित भी भागने की कोशिश करने लगे। मैंने उन्हें मना किया। लेकिन सब इस हादसे से हदस गए थे।

बस के इस तरह पीछे खिसकने से हाइवे पर पीछे से आ रही गाड़ियों से टकराने का ख़तरा था। इसीलिए लोगों में अफ़रा-तफ़री मची हुई थी। मेरे साथ आयांश था। मैंने उसे सीने से चिपका लिया और सुमित से कहा कि ऊपर रखा हुआ बच्चे का बैग ज़रूर ले लें। किसी भी छोटे-से-छोटे हादसे से बच्चों के चेहरे पर डर तुरंत दिखाई देने लग जाता है।

अब हम भी भीड़ के साथ नीचे उतरने लगे। नीचे उतरकर लोग चिल्ला रहे थे, ग़ुस्सा कर रहे थे और बांग्ला में कुछ-कुछ कह रहे थे। हिंदीभाषी होने के कारण मैं उनकी बातें समझ नहीं पा रही थी, लेकिन उनके चेहरे के हाव-भाव से समझ रही थी कि वे सभी ड्राइवर पर ही ग़ुस्सा कर रहे हैं। लेकिन बस ड्राइवर तो भाग चुका था।

धीरे-धीरे भीड़ में शामिल लोग अपनी-अपनी मंज़िल की ओर प्रस्थान करने लगे। हम लोगों की भी ट्रेन थी—शाम 7:55 बजे विभूति एक्सप्रेस। हमें इसी ट्रेन से बनारस के लिए निकलना था। इसलिए चाहकर भी हम वहाँ देर तक नहीं रुक पाए। हम दूसरी बस का इंतज़ार करने लगे।

पीछे से आ रही बसों से मैं दो बार पूछ चुकी थी कि क्या वे धर्मतला जाएँगी? लेकिन हर बार ‘ना’ में उत्तर मिला। दो-तीन बसें निकल जाने के बाद यह चौथी बस थी, जो धर्मतला जा रही थी। हम उसमें सवार हो गए।

मैं बस ड्राइवर के ठीक सामने वाली लेडीज़ सीट पर बैठ गई। वहाँ एक लड़की भी बैठी थी, जो पहली दुर्घटना वाली बस में ही बैठी हुई थी। वह भी उस हादसे से हदस गई थी। उसका चेहरा साफ़-साफ़ बता रहा था।

ड्राइवर एक तरफ़ गाड़ी चला रहा था और बात भी कर रहा था। चूँकि वह पीछे से आ रहा था, इसलिए उसने हाइवे पर पड़ी तीन लाशों को देखा था। वह उस दृश्य के बारे में बता रहा था, जो उसने रास्ते में देखा था। वह अपने आस-पास बैठे यात्रियों को बता रहा था कि दुर्घटनास्थल पर बहुत भीड़ इकट्ठा है और पुलिस वहाँ पहुँच चुकी है।

मैं इस सोच में पड़ गई कि जो तीन लोग घर से यह सोचकर निकले होंगे कि उन्हें कहीं पहुँचना है, इस जीवन में अभी और चलना है, वे अब इस दुनिया से बहुत दूर चले गए। वह भी एक दर्दनाक हादसे के चलते, जिसमें उनकी कोई ग़लती नहीं थी।

मेरी आँखों ने प्रत्यक्ष देखा था कि बस ने बाइक वाले को धक्का मारा और बाइक सवार के ऊपर से बस गुज़रती हुई आगे निकल गई। मेरा मुँह अवाक् रह गया था और आँखें स्तब्ध थीं। लेकिन बाइक पर तीन लोग सवार थे, यह मुझे नहीं पता था। मैंने तो एक ही व्यक्ति को देखा था, जो बाइक चला रहा था। यह दृश्य सड़क पर चलने और यात्रा करने के मेरे साहस को कमज़ोर किए जा रहा था।

जिस दूसरी बस में अभी मैं बैठी थी, उसका ड्राइवर जब इस घटना के बारे में बता रहा था, तब सुमित पीछे से मुझे डाँट रहे थे कि ड्राइवर से बात करके उसका ध्यान मत भटकाओ, नहीं तो दूसरा हादसा भी हो सकता है। मैं पहले वाले हादसे से ही इतनी हदस चुकी थी कि अब दोबारा बस में बैठकर कोई हादसा नहीं देखना चाहती थी।

मेरा मन और मेरी वे दो आँखें कितनी दहशत में थीं, इसका वर्णन करना भी मेरे लिए ठीक-ठीक संभव नहीं हो पा रहा है। आप जिस बस में बैठकर कहीं जा रहे हैं, उसी बस के ड्राइवर ने किसी का एक्सीडेंट कर दिया हो और एक सेकंड के भीतर ही कोई व्यक्ति मौत के घाट उतर गया हो—भले ही उसमें आपकी कोई भूमिका न हो।

जब मैं पहली बस में बैठी थी, तभी उस ड्राइवर की गाड़ी चलाने की रफ़्तार के बारे में सोच रही थी कि इतनी तेज़ गाड़ी चलाकर उसे आख़िर कहाँ जाना है? अब, जब उसने तीन लोगों की जान ले ली थी, तब समझ में आ रहा था कि इतनी तेज़ गाड़ी चलाकर उसे जेल की सलाखों के पीछे जाना था। भले ही वह मौक़े से भाग गया हो, लेकिन एक न एक दिन पकड़ा तो जाएगा ही।

इस हादसे से पैदा हुई हदस कब तक बनी रहेगी, मैं नहीं बता सकती। लेकिन हमारा यह तंत्र कब समझेगा कि जान बचाने की इस दौड़ में हम और कितनी जानें ख़त्म करने का लाइसेंस अपने पास लिए हुए चल रहे हैं!

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट