गोपेश्वर सिंह की आलोचना-पद्धति के कुछ पक्ष
कमलेश वर्मा
15 जनवरी 2026
गोपेश्वर सिंह की आलोचना-पद्धति के बारे में बात करने का यह अर्थ नहीं है कि वह शास्त्रीय या सैद्धांतिक आलोचना लिखते हैं। उन्होंने व्यावहारिक आलोचना ही लिखी है। वह किसी साहित्य-सिद्धांत की बहस में भी प्रमुखता से शामिल नहीं रहे हैं। 1990 के बाद की आलोचना में उनकी उपस्थिति निरंतर महत्त्वपूर्ण रही है। इस दौर में भूमंडलीकरण से संबंधित साहित्य-सिद्धांतों पर बहसें हुई थीं। मगर गोपेश्वर सिंह ने इन बहसों से ख़ुद को नहीं जोड़ा। वह व्यावहारिक आलोचना के क्रम में साहित्य-सिद्धांतों से टकराते ज़रूर रहे हैं।
आलोचक अपनी पसंद और समय की ज़रूरत के अनुसार अपनी ज़िम्मेदारी तय करता है। कोई ज़रूरी नहीं कि वह अपनी हर पसंद को आलोचना में ढाल सके या अपने समय की ज़रूरत के मुताबिक़ आलोचना लिखने में सफल हो ही जाए! आलोचना चयन के अर्थ में व्यक्तिनिष्ठ होती है, मगर अपनी प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठ होती है। एक आलोचक अपनी पसंद का विषय तो चुन सकता है, मगर अपने आलोचकीय विवेक का आधार वस्तुनिष्ठता/तथ्यात्मकता को बनाए रखता है। इससे उसकी समझदारी का परिचय मिलता है।
गोपेश्वर सिंह की आलोचना किसी महत्त्वाकांक्षी योजना के अनुसार नहीं लिखी गई है। वह अपने आलोचना-कर्म को लेकर कोई दावा करते हुए दिखाई नहीं देते हैं। उनकी लिखी हुई आलोचना के तीन पक्ष हमेशा दिखाई पड़ते है—रचना, सामाजिक-राजनीतिक परिवेश और पहले की मौजूद आलोचना। उनका ध्यान ‘रचना’ पर सबसे पहले जाता है, मगर टिकता है ‘सामाजिक-राजनीतिक परिवेश’ पर ज़्यादा देर तक। वह अपनी बात कहते समय इसका पूरा ख़याल रखते हैं कि अब तक की आलोचना में कितना कुछ कहा जा चुका है।
किसी साहित्यिक सिद्धांत के सहारे रचना में प्रवेश करना उनकी प्रवृत्ति नहीं रही है। ‘भक्ति आंदोलन और काव्य’ पुस्तक के लेख कबीर, सूर, मीरा, तुलसी, शंकरदेव आदि कवियों पर अलग-अलग हैं। इन लेखों में वह इन कवियों की काव्यात्मक प्रवृत्ति पर विचार करते हैं और पहले से आ रही आलोचना में हस्तक्षेप करते हैं। इस क्रम में वह मुक्तिबोध की लिखी हुई आलोचना पर अलग से अध्याय लिखते हैं। कहने का अर्थ यह है कि गोपेश्वर सिंह आलोचना की बुनियादी सामग्री को तैयार करने में पर्याप्त श्रम, समय और समझ का उपयोग करते हैं। तब जाकर वह अपने निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। निष्कर्ष निकालते समय भी उनमें उर्ध्वबाहु घोषणा की आदत नहीं देखी जा सकती है। वह फटकार कर किसी फ़ैसले को हमारे सामने नहीं लाते, बल्कि एक वैचारिक व्यक्ति की तरह तथ्य-आधारित कुछ प्रस्ताव लेकर आते हैं। ‘भक्ति आंदोलन और काव्य’ के अध्यायों को पढ़कर हम जान पाते हैं कि गोपेश्वर सिंह कहना चाहते हैं कि प्रतिपक्ष बनाकर सगुण और निर्गुण का अध्ययन उचित नहीं है। लोक और शास्त्र को परस्पर विरोधी मानकर भक्ति कविता का अर्थ निकालना ठीक नहीं है। ऐसा करने पर हम किसी एक छोर पर जा खड़े होते हैं, जहाँ से अनेक पक्ष दिखाई ही नहीं पड़ते हैं। इस पुस्तक की भूमिका में गोपेश्वर सिंह ने लिखा है :
‘बाइनरी’ में देखने की इधर जो प्रवृत्ति विकसित हुई है, उसका प्रभाव भक्तिकाव्य संबंधी आलोचना पर भी पड़ा है। यही कारण है कि कुछ का स्वीकार और कुछ के नकार का चलन भक्तिकाव्य संबंधी विमर्श में इधर ख़ूब दिखाई देता है। [भक्ति आंदोलन और काव्य, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2017, पृष्ठ 7-8]
गोपश्वर सिंह के भक्तिकाल-संबंधी विचारों में हुए विकास को ठीक से देखा जाए तो हम पाते हैं कि उन्होंने धीमी गति से अपने सूत्रों को तलाशा है। कवियों को देखने के सूत्र वह निर्मित करते हैं; मगर आचार्य की तरह नहीं, बल्कि एक सहृदय की तरह। उनकी निगाह कवियों पर तो रहती ही है, वह आलोचकों को बहुत सावधानी से अपनाते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर मैनेजर पांडेय तक को स्वीकार करते समय उनकी यह सावधानी देखी जा सकती है।
गोपेश्वर सिंह के प्रिय आलोचक हैं—नलिन विलोचन शर्मा, विजय देव नारायण साही और मुक्तिबोध। यह कहा जा सकता है कि वह आचार्य रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह की तरफ़ कभी-कभी ही झुकते हैं। इन तीनों दिग्गज आलोचकों के प्रभाव से बचकर हिंदी आलोचना में कुछ जोड़ पाना आसान काम नहीं है। महान् आलोचकों के बीच से रास्ता निकालते हुए कुछ कह पाने का एक उदाहरण इस उद्धरण में देखा जा सकता है :
शमशेर को लेकर एक और कठिनाई है। वह घोषित तौर पर प्रगतिवादी हैं। मार्क्सवाद में उनकी निष्काम आस्था है। कम्यून में रह चुके हैं। साम्यवाद के समर्थन में और मज़दूरों-जुलूसों पर उन्होंने ढेरों कविताएँ लिखी हैं। मन से लिखी हैं और अच्छी लिखी हैं। लेकिन प्रकृति और प्रेम के वह नायाब कवि हैं। उनका यह रूप उनको निख़ालिस प्रगतिवादी कवि कहने में प्रगतिवादी आलोचकों के सामने कठिनाई पैदा करता है और प्रगतिवाद विरोधी साही जैसे आलोचक को यह सुभीता देता है कि वह कह सके कि वह ‘विशुद्ध सौंदर्य’ हैं, उनकी कविता के केंद्र में सौंदर्य है और इस सौंदर्य का कुछ भी लेना-देना मार्क्सवाद से नहीं है। शमशेर को लेकर आलोचना में एक कठिनाई और है। शमशेर ने ग़ज़लें भी लिखी हैं। ग़ज़ल का जो भी रुतबा उर्दू में हो, हिंदी में ग़ज़ल लिखने वाले कवियों की कोई ख़ास हैसियत नहीं है। हिंदी के आलोचक चाहे रामविलास शर्मा हों, साही हों या नामवर सिंह, उनकी काव्य-रुचि में हिंदी की ग़ज़लें नहीं आतीं। इसलिए नई कविता संबंधी जो बहसें हैं, उनके केंद्र में शमशेर यदि अज्ञेय, मुक्तिबोध आदि की तरह नहीं हैं तो क्या आश्चर्य! [आलोचना के परिसर, गोपेश्वर सिंह, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 32-33]
इस अंश में यह बात सामने आती है कि गोपेश्वर सिंह रचना के आधार पर कुछ नया तलाशते हैं। वह शमशेर की रचनाओं से कुछ सूत्र तलाश कर साही, रामविलास शर्मा या नामवर सिंह से कुछ अलग बात कहने का प्रयास करते हैं। इस कोशिश में किसी तरह की उग्रता या तेज़ आवाज़ में बात करने की आदत उनमें नहीं देखी जा सकती है। मगर एक तरह की विनम्र दृढ़ता देखी जा सकती है कि गोपेश्वर सिंह कहना चाहते हैं—शमशेर प्रगतिवादी भी हैं और इस ‘परिसर’ के बाहर भी उनकी अहमियत है। यहाँ भी वह उसी ‘बाइनरी’ से बचने का रास्ता सुझा रहे हैं जो भक्त कवियों पर लागू की जाती रही है। एक बड़े रचनाकार का दायरा बड़ा और वैविध्य से भरा होता है, उसे वैचारिक शब्दावलियों से समझने की सुविधा तो ली जा सकती है, मगर उन शब्दों के दायरे में उस रचनाकार को बाँधा नहीं जा सकता है। ‘आलोचना के परिसर’ को तोड़ने का काम गोपेश्वर सिंह की आलोचना करती है, मगर आक्रमण के बग़ैर!
गोपेश्वर सिंह जिस तरह की भाषा में आलोचना लिखते हैं, उसे रेखांकित करने की ज़रूरत है। इस भाषिक विशेषता को उनके समय के आलोचकों की भाषा के साथ मिलाकर देखना चाहिए।
गोपेश्वर सिंह का कुल आलोचनात्मक लेखन बहुत ज़्यादा नहीं है। उन्होंने प्रभूत मात्रा में कभी भी नहीं लिखा। एक बात यह भी कही जा सकती है कि उन्होंने अनावश्यक नहीं लिखा। उनके भाषणों में आवृत्ति रही है, मगर व्यवस्थित लेखन में प्रायः आवृत्ति नहीं देखी जा सकती है। इधर के दिनों में भाषणों को लिपिबद्ध करने का चलन दिखाई पड़ा है। ऐसे संकलनों में आवृत्ति खूब देखी जाती है। बड़ा नाम हो जाने के बाद व्यक्ति का सब-कुछ कहा हुआ संकलित करने के लायक़ मान लिया जाता है। मगर यह चलन ठीक नहीं है। ऐसी पुस्तकों में प्रायः पिष्ट-पेषण दिखाई पड़ता है। परस्पर विरोधी बातें भी निःसंकोच शामिल कर ली जाती हैं। एक लेखक जब स्वयं लिखता है तो वह अंतर्विरोधों के प्रति सावधान रहता है। इसलिए लिखित परंपरा की पुस्तकों में गंभीरता और व्यवस्था अपेक्षाकृत ज़्यादा होती है। गोपेश्वर सिंह की आलोचनात्मक पुस्तकों में संकलित भाषणों को अलग करके बात की जाए तो यह कहा जा सकता है कि वह प्रायः दुहराते नहीं हैं।
आलोचना की भाषा की जो दुर्गति इन दिनों चल रही है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि गोपेश्वर सिंह ने एक साफ़-सुथरी भाषा में अपनी बात कही है। आलोचना की भाषा को अबूझ बनाने में तीन-चार कारण होते हैं। एक कारण है किसी दूसरी भाषा का प्रभाव ग्रहण करना, दूसरा कारण है सिद्धांतों के सहारे आलोचना लिखने का प्रयास, तीसरा कारण है हिंदी आलोचना की भाषा-परंपरा की अवहेलना करना आदि। गोपेश्वर सिंह के समकालीन आलोचकों में कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अँग्रेज़ी भाषा का प्रभाव ग्रहण किया, जैसे—पुरुषोत्तम अग्रवाल। कुछ ने सिद्धांतों के सहारे आलोचना की भाषा बनाई, जैसे—अजय तिवारी। कुछ ने हिंदी आलोचना की भाषा-परंपरा की अवहेलना की, जैसे—सुधीश पचौरी। यह कहने के पीछे ऐसी मंशा नहीं है कि इन आलोचकों के महत्त्व को नहीं समझा जा रहा है। इन तीनों आलोचकों ने अलग-अलग ढंग से हिंदी आलोचना को बहुत कुछ दिया है। यहाँ केवल आलोचना की भाषा की बात की जा रही है।
गोपेश्वर सिंह की पुस्तकें आलोचना की भाषा में कुछ ताज़गी पैदा करती हैं। वे नई पीढ़ी को जिस प्रकार की समझ दे सकती हैं, उसका उल्लेख करना आवश्यक है। यह आलोचना समाज, राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन और साहित्य की समझ को सुलझी हुई भाषा में संप्रेषित करती है। यहाँ तक कि ‘भक्ति’ और ‘रहस्य’ को समझने-समझाने के क्रम में भी वह किसी मायावी भाषा का सहारा नहीं लेते हैं। वह सावधान हैं और उनकी प्रवृत्ति है कि साफ़ जुबान में अपनी बात कही जाए। यहाँ तक कि कबीर के रहस्यवाद के सामाजिक पक्ष को जितनी सुलझी भाषा और दृष्टि के साथ गोपेश्वर सिंह ने व्यक्त किया है, मेरी जानकारी में (जो ग़लत भी हो सकती है) इतनी स्पष्टता लिए हुए कोई भी अन्य अकादमिक आलेख हिंदी में मौजूद नहीं है। इस क्रम में गोपेश्वर सिंह द्वारा अनूदित एवेलिन अंडरहिल लिखित भूमिका को भी देखना चाहिए। यह अनुवाद हिंदी भाषा के स्वाभाविक प्रवाह के अनुकूल है तथा इसका महत्त्व भी कबीर के रहस्यवाद को समझने से जुड़ा है।
गोपेश्वर सिंह दार्शनिक प्रश्नों के बजाय ऐतिहासिक प्रश्नों के आधार पर आलोचना-कर्म को दुरुस्त करना चाहते हैं। ‘भक्ति आंदोलन और काव्य’ के आलेखों में इस प्रयास को रेखांकित किया जा सकता है। के. दामोदरन, इरफ़ान हबीब, हरबंस मुखिया, सतीश चंद्रा के हवाले से यह पुस्तक उन ऐतिहासिक आधारों को हमारे सामने रखती है, जिनसे भक्तिकाल और काव्य की व्याख्या को विश्वसनीय और असरदार बनाया जा सके।
गोपेश्वर सिंह समाजवादी हैं। वह राजनीतिक रूप से समाजवादी आंदोलनों में शामिल भी रहे हैं। जे.पी. आंदोलन के वह कार्यकर्ता रहे हैं। उन्होंने लंबे समय तक समाजवादियों का संग-साथ रखा है। हिंदी आलोचना में संभवतः वह पहले आलोचक हैं जिसने समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया के विचारों को ध्यान में रखकर भक्ति-काव्य के उद्देश्यों को समझने-समझाने का प्रयास किया है। लोहिया से तुलसी के लिए शब्द लेकर लिखा गया उनका आलेख है—‘तुलसीदास : अझेल हमलों के बीच’।
आलोचना के लोकतंत्र की बात पुरानी है, बहुवचनात्मकता की भी चर्चा कुछ दशकों से हो रही है। ‘बहुवचन’ नाम की पत्रिका शायद इसी संकल्प के साथ निकाली गई होगी। हिंदी आलोचना के लोकतंत्र ने स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श के विकास में चाहे जिस प्रकार की भूमिका निभाई हो, यह मानने में किसी की असहमति नहीं होगी कि राजनीतिक लोकतंत्र की तरह ही आलोचना के लोकतंत्र के लक्ष्य को हासिल करना आसान काम नहीं है। ‘वर्चस्व’ और ‘मुक्ति’ के बीच चलने वाली खींच-तान में एक द्वंद्वात्मक रिश्ता लोकतंत्र की ज़मीन पर भी दिखाई देता है। ‘मुक्तिकामी’ पक्ष संघर्ष करते हुए ‘वर्चस्वकामी’ बनने का लोभ-संवरण नहीं कर पाता है। भक्तिकाल से संबंधित आलोचनाओं में दलित-पक्ष की बहुतायतता को हम सब अच्छी तरह से जानते हैं। इसका समर्थन या विरोध एक अलग बात है। मगर यह मानना पड़ेगा कि भक्ति-काव्य की आलोचना का दलित-पक्ष दमदार दावेदारी के साथ उभरकर स्थापित हो गया है। हिंदी आलोचना के जनतंत्र से जाति-आधारित वर्गों में सबसे बड़ा वर्ग ‘पिछड़ी जातियों का वर्ग’ अब तक बाहर रहा है। भक्ति-काव्य के अनेक कवि पिछड़ी जातियों से रहे हैं; जिनकी चर्चा निम्न जाति, शूद्र आदि कहकर की जाती रही है। गोपेश्वर सिंह ने इस असंगति को दुरुस्त किया है और हिंदी आलोचना को नई सामाजिक शब्दावली से जोड़ा है। वह लिखते हैं, “पिछड़े और दलित एक नहीं हैं।” [भक्ति आंदोलन और काव्य, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2017, पृष्ठ 150] इसी पंक्ति के क्रम में उन्होंने ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ की भी चर्चा की है। आचार्य शुक्ल से लेकर आज तक भक्ति-काव्य की जो आलोचना लिखी गई, उसमें जाति-आधारित केवल दो ही वर्ग समझ में आते थे—ऊँची जातियाँ और नीची जातियाँ। ‘नीची जातियाँ’ के नाम से जो कुछ उपलब्ध हो सका वह सबका सब ‘दलित-विमर्श’ के हिस्से में चला गया।
गोपेश्वर सिंह ने पिछले पाँच-सात वर्षों में हुई सुगबुगाहट को सही तरीक़े से पहचाना भी है और 2016 में लिखे लेख ‘भक्ति आंदोलन और मुक्तिबोध’ में इस बात को स्थापित भी किया है। इसी लेख में उन्होंने तेलुगु के ‘मोल्ला रामायण’ की चर्चा की है और लिखा है कि इसकी रचयिता मोल्ला ‘अति पिछड़ी कुम्हार जाति’ की थीं। जातियों के विन्यास के प्रति गोपेश्वर सिंह की सजगता इस पुस्तक में देखते बनती है। यह संभव ही नहीं है कि आप सामाजिक विश्लेषण करने बैठे हों और जाति-आधारित विन्यास को लीप-पोतकर आगे बढ़ जाएँ। हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना के महत्त्व को भूले बग़ैर यह कहा जा सकता है कि उसमें जाति-आधारित सामाजिक विन्यास को ठीक से समझने का प्रयास नहीं किया गया है; यद्यपि यह मानना चाहिए कि आलोचना में जो सामाजिकता आई है, उसे लाने में सबसे बड़ी भूमिका मार्क्सवादी आलोचना की ही है।
गोपेश्वर सिंह ने आलोचना की कसौटियों के दुरुपयोग से भी हिंदी आलोचना को बचाने का प्रयास किया है। मैं फिर से कहना चाहता हूँ कि वह कभी भी महत्त्वाकांक्षी आलोचक नहीं रहे हैं और न ही उन्होंने कोई प्रबल दावेदारी की घोषणा की है। उनका आग्रह है कि पक्ष-प्रतिपक्ष बनाकर अध्ययन की पद्धति को छोड़ना चाहिए तभी कबीर के साथ-साथ तुलसी के क्रांतिकारी महत्त्व को समझा जा सकेगा। लोक और शास्त्र, सगुण और निर्गुण, ऊँची जाति और नीची जाति, लोकधर्म और लोकविरोध आदि पक्ष-प्रतिपक्ष बनाकर भक्तिकाव्य की जो आलोचना आज तक होती रही है; उससे बचने का संकल्प गोपेश्वर सिंह बार-बार व्यक्त करते हैं और उसके लिए तर्क भी प्रस्तुत करते हैं। यहाँ एक सवाल खड़ा होता है कि वह जिसे ‘बाइनरी’ कह रहे हैं, उसे प्रायः ‘डायलेक्टिकल’ समझकर आलोचना का विकास होता रहा है। मार्क्सवादी आलोचना ‘डायलेक्टिकल’ के सहारे आगे बढ़ती रही है और ‘बाइनरी’ का निषेध करती रही है। द्वंद्वात्मकता उसकी विशेषता है और इसका अतिवाद उसका दोष। गोपेश्वर सिंह ने उस द्वंद्वात्मकता के अतिवाद से पैदा हुई एकपक्षीयता के दोषों को उभारा है। उनकी आलोचना को मार्क्सवादी आलोचना के विरोध में नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि भक्तिकाल की समाज-आधारित आलोचना का एक नया रूप समझा जाना चाहिए। उनके विश्लेषण में दर्शन और विचारधारा के बजाय इतिहास और कविता का सहारा अधिक लिया गया है। इस पक्ष की प्रशंसा होनी चाहिए।
गोपेश्वर सिंह की आलोचना-पद्धति के कुछ बिंदुओं को यहाँ रखा गया है। इस विषय पर विस्तार की संभावना व्यक्त की जा सकती है। उनके संपादन-कौशल और संचयन की ‘भूमिका’ में भी आलोचना-पद्धति से संबंधित कुछ बातें कही जा सकती हैं। एक और बात यह कि गोपेश्वर सिंह ने आलोचक के रूप में किसी एक क्षेत्र में अपनी पहचान नहीं बनाई है। उन्होंने सबसे ज़्यादा भक्तिकाल पर लिखा है। फिर बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य पर! अपने से कम उम्र के लेखकों पर गोपेश्वर सिंह ने प्रायः नहीं लिखा है। एक लेख श्यौराज सिंह बेचैन की आत्मकथा पर ज़रूर है! बेचैन उनसे उम्र में थोड़े छोटे हैं। अन्यथा उन्होंने अपने समय के नए लेखकों पर नहीं लिखा है। किसी आलोचक को समझने की एक महत्त्वपूर्ण कसौटी यह भी होती है कि वह अपने समय के रचना-कर्म को किस तरह से मूल्यांकित कर रहा है। वहीं यह ख़तरा भी रहता है कि रचनाकार नाराज़ न हो जाए! यह भी डर रहता है कि समकालीन को समझने में भूल न हो जाए! मतलब यह कि इसमें ‘जोखिम’ है। गोपेश्वर सिंह प्रायः ‘जोखिम’ उठाकर आलोचना नहीं लिखते हैं। वह अपनी हर ज़रूरी बात लिखते ज़रूर हैं, लेकिन विरोधियों को ललकारे बग़ैर!
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