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घाम-पानी : ‘ग्रीन बूट्स’ का मिथक : पालजोर और दोरजे मोरुप

यात्राओं के दौरान किसी स्थान-विशेष तक पहुँचने के लिए लैंडमार्क काफ़ी काम आते हैं। अपने पते पर पहुँचने से पहले आप उसके लैंडमार्क तक पहुँचते हैं। शहरों और बस्तियों में यह कोई पीढ़ियों पुराना पीपल, पाकड़ या बरगद हो सकता है, जैसे हमारे लखनऊ का पकरी पुल; या हादसे का शिकार हुए रेलवे गेटमैन के नाम पर रखा गया चौराहा : लँगड़ा फाटक। यह सब जीवन, संघर्ष और स्मृति के चिह्न हैं। लेकिन समुद्र तल से आठ हज़ार मीटर ऊपर जब इंसान सगरमाथा के ‘डेथ ज़ोन’ में प्रवेश करता है, तब लैंडमार्क की यह परिभाषा पलट जाती है। वहाँ दिशा बताने वाले पत्थर नहीं होते, वहाँ इंसान ही मील के पत्थर बन जाते हैं और सालों-सालों तक वहीं लैंडमार्क्स की तरह श्वेत बर्फ़ पर रखे रहते हैं।

सगरमाथा [Mount Everest] के रेनबो ज़ोन [Rainbow Zone] में स्थित ‘ग्रीन बूट्स’ बीते तीन दशकों से पर्वतारोहियों के बीच पहचाना जाने वाला एक पॉपुलर लैंडमार्क है। तिब्बत की ओर, नार्थ फ़ेस से सगरमाथा हिमाल शिखर पहुँचने और लौटने वाले एथलीट्स थके क़दमों से ‘ग्रीन बूट्स’ के ठीक बग़ल से होकर गुज़रते-गुज़रते हैं। हर दस में से आठ पर्वतारोही इस जगह पर या आस-पास सुस्ताने का समय लेते हैं। [Green Boots] ‘ग्रीन बूट्स’ माउंट एवरेस्ट का कोई मिथक नहीं, बल्कि पिछले तीस सालों से माउंट एवरेस्ट समिट के बेहद नज़दीक स्थित [8500 मीटर] एक मृत पर्वतारोही है। वह एवरेस्ट डेथ ज़ोन की एक सचाई है। उसके पास से गुज़रते हुए, कुल पलों के लिए ऐसा लग सकता है कि क्या कोई इस ऊँचाई पर झपकी ले रहा है! लेकिन शरीर पर ग़ौर करने पर दिखाई देता है कि हाड़ कँपा देने वाली ठंड से बचने के अंतिम प्रयास में उसने अपने चेहरे के चारों ओर लाल रंग की फ़ेदर जैकेट खींच रखी है, जिससे उसका चेहरा दुनिया की नज़रों से हमेशा के लिए ओझल हो चुका है। उसकी टाँगें बाहर रास्ते की ओर निकली हुई है, यही कारण है कि वहाँ से गुज़रने वाले पर्वतारोहियों को सबसे पहले उसके चमकीले नियॉन हरे रंग [Green Boots] के कोफ़्लाक [Koflach] जूते दिखाई देते हैं।

‘ग्रीन बूट्स’—वह लैंडमार्क जिसे पूरी दुनिया तीस सालों तक हेड कांस्टेबल त्सेवांग पालजोर मानती रही, 2026 में उसको लेकर एक बिल्कुल नई घोषणा हुई। तीन दशकों के बाद डीएनए जाँच के हवाले से अचानक कहा गया है कि वे ‘ग्रीन बूट्स केव’ पर त्सेवांग पालजोर नहीं, बल्कि उनके साथी लांस नायक दोरजे मोरुप हैं। ख़बर यह भी है कि उन्हें वहाँ से वापस लाया जाएगा। इस बीच मन में बार-बार ‘ग्रीन बूट्स’ और 1996 के एवरेस्ट हादसे की तमाम कहानियाँ के फ़्लैशबैक आने लगे हैं। बीते कई सालों से एवरेस्ट और उससे जुड़ी घटनाओं को पढ़ने-जानने-महसूस करने की कोशिश की है।

यह एक नई पाठ-यात्रा पर जाने का समय है :

कहानी हादसे वाले महीने मई से शुरू नहीं होती, बल्कि 22 मार्च 1996 को तब शुरू होती है जब भारत-तिब्बत सीमा पुलिस [ITBP] का एक विशेष दल कमांडेंट मोहिंदर सिंह के नेतृत्व में दिल्ली से तिब्बत के लिए रवाना हुआ। अब तक एवरेस्ट के नार्थ फ़ेस की तरफ़ से कोई भारतीय दल चोटी तक नहीं पहुँचा था। उस समय उत्तरी रास्ते बेहद तकनीकी और कठिन ‘थ्री स्टेप्स’ की वजह से ख़तरनाक रास्ता माना जाता था।

सड़क मार्ग से काठमांडू होते हुए यह दल मैत्री पुल [Friendship Bridge] पहुँचा। भोटे कोसी नदी [सुन कोशी] पर बना यह पुल नेपाल के सिंधुपालचौक ज़िले के कोदारी शहर को तिब्बत के शहर झांगमू से जोड़ता है। तिब्बत की सीमा पर आगे की यात्रा के लिए चीनी अधिकारी ली रुई तैयार थे। वह 1975 के ऐतिहासिक चीनी एवरेस्ट अभियान का हिस्सा रह चुके थे—वही अभियान जिसने सेकंड स्टेप पर मशहूर एल्युमिनियम सीढ़ी [Chinese Ladder] लगाई थी, जो आज भी पर्वतारोहियों द्वारा प्रयोग में लाई जाती है।

अब आगे हवा विरल [Thin Air] होना शुरु हो चुकी थी। न्यालम [3,800 मीटर] में एक्लाइमेटाइज़ेशन के लिए एक दिन रुकना हुआ। आगे वहाँ से यह टीम न्यालम थुंगला पास की ओर का बढ़ी। पाँच हज़ार मीटर की ऊँचाई पर तीन किलोमीटर तक फैला यह बर्फ़ ही बर्फ़ का मैदान पार करते हुए सड़क पूरब से पश्चिम की ओर मुड़ रही थी। वहीं पहली बार क्षितिज पर चोमोलुंगमा [सगरमाथा का तिब्बती नाम] और चो ओयु दिखाई दिया। चो ओयु दुनिया का छठा सबसे ऊँचा पर्वत शिखर है। यह चोमोलुंगमा [Mount Everest] से लगभग 20 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। सगरमाथा की ही तरह, यह पर्वत भी नेपाल और तिब्बत की सीमा पर स्थित है।

आगे शिगार [4,200 मीटर] के शेल्खर होटल में तीन रातें कटीं। वहाँ ऐतिहासिक शेल्खर ज़ोंग के खंडहर थे और नीचे स्थानीय बौद्ध गोम्पा—और उसके आस-पास की शांति [गोम्पा : तिब्बती शैली में बना हुआ एक प्रकार का बौद्ध मठ या आध्यात्मिक केंद्र]। धीरे-धीरे होटल की लॉबी में विदेशी टीमों से मुलाक़ातें होने लगी। ट्रेनिंग के दिनों जैसा तनाव और उत्साह महसूस हो रहा था। सब एक ही हिमाल शिखर ‘सगरमाथा’ की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन लगभग हर किसी के भीतर अपनी-अपनी महत्वाकांक्षा का एक निजी एवरेस्ट भी खड़ा था। शिगार से छह घंटे यात्रा के बाद, एक नई दुनिया हमारे इंतज़ार में थी—5,500 मीटर पर स्थित एक दर्रे को पारकर हम रोंगबुक घाटी में दाख़िल हो चुके थे। हमारे दाहिने ओर शीशपांग्मा और चो ओयु के शिखर पीछे छूट रही थे और सामने था रोंगबुक ग्लेशियर का विशाल मुहाना। वहीं बायीं तरफ़ था ऐतिहासिक रोंगबुक गोम्पा। दिन ख़त्म होने को था—हम 5,200 मीटर की ऊँचाई पर स्थित बेस कैंप रोंगबुक ग्लेशियर के किनारे या अंतिम छोर [Terminal Moraine] थे।

5 अप्रैल 1996 को जब आईटीबीपी का दल वहाँ पहुँचा, तो जापानी और रूसी पर्वतारोही पहले से ही तैयारी शुरू कर चुके थे। दुनिया के एक सुनसान छोर पर 14 देशों के तंबुओं का एक अस्थायी शहर आबाद हो चुका था।

बेस कैंप [5200 मीटर] से एडवांस बेस कैंप यानी एबीसी [6400 मीटर] तक की दूरी महज़ एक नक़्शे का पैमाना नहीं थी; वह ईस्ट रोंगबुक ग्लेशियर के पत्थरों और बर्फ़ के टीलों पर 15 किलोमीटर लंबा एक थकाऊ रास्ता था। थकान कम करने के लिए रास्ते में दो पड़ाव बनाए गए—5700 मीटर पर कैंप 1 और 5800 मीटर पर कैंप 2.

कैंप 2 का दृश्य बेहद अद्भुत था। हम सबमें कई ऐसे थे जिन्होंने इस तरह के अद्वितीय दृश्य और प्राकृतिक नज़ारे आज से पहले कभी नहीं देखे थे। ऊपर के देखने पर यह कैंप प्राकृतिक कटोरे जैसी जगह पर स्थित था, जहाँ से नीचे ईस्ट रोंगबुक ग्लेशियर के ‘पेनिटेंट्स’ साफ़ दिखाई देते थे। पेनिटेंट्स—धूप और हवा से तराशे गए बर्फ़ के तीखे, पतले और नुकीले खंभे [Ice towers] होते हैं, जो देखने में ऐसे लगते हैं जैसे कोई प्रार्थना या पश्चाताप [penitence] कर रहा हो।

भारतीय दल तैयार था। हमने कैंप 2 में अपने टेंट को उस रास्ते से गुज़रने वाले हर देश के पर्वतारोही के लिए खोल दिया। ‘इंडिया कैंप’ पर कोई भी आकर गर्म चाय-पानी माँग सकता था, सुस्ता सकता था। जैसे-जैसे दिन बीते वह बीहड़ रास्ता पगडंडी में बदल गया। कई जवान अब बेस कैंप से एबीसी की दूरी एक ही दिन में पूरी करने लगे थे।

18 अप्रैल को जब जर्मन, नॉर्वेजियन और भारतीय पर्वतारोहियों के संयुक्त प्रयास से नॉर्थ कोल तक की रोप बँध गईं, तो भारतीय दल के नेता कमांडेंट मोहिंदर सिंह की तबीयत अचानक बिगड़ गई। शायद ऊँचाई का असर उनके फेफड़ों पर बहुत तेज़ी से हुआ; सीने में जकड़न और उल्टियों के कारण उन्हें नीचे बेस कैंप लौटना पड़ा।

21 अप्रैल को जब दल नॉर्थ कोल [North Col.] की ओर बढ़ रहा था, मौसम ने पहली बार चेतावनी दी थी। कोई नहीं जानता था कि यह साल एवरेस्ट के इतिहास में हमेशा चर्चा में रहेगा। मौसम ने अपने तेवर दिखाना शुरु कर दिया था। नीचे एबीसी पर बर्फ़ीला तूफ़ान चल रहा था, हालाँकि ऊपर की ढलानें अभी साफ़ थीं। वांगचुक शेरपा, सांगे शेरपा और लद्दाखी जवानों ने मिलकर कैंप 5 [7800 मीटर] की नींव रख दी थी। आगे बढ़ने से पहले 30 अप्रैल को एक बैठक की गई। तय हुआ कि बिना ऑक्सीजन कैंप 5 तक जाएँगे, रात बिताएँगे और लौटेंगे ताकि फेफड़े इस जानलेवा ऊँचाई के आदी हो सकें।

2 मई को नॉर्थ कोल पर चढ़ना भावुक कर देने वाला पल था। यह वही North Col. था, जहाँ 1920 और 1930 के दशकों में जॉर्ज मैलोरी, एंड्रयू इरविन और फ़्रैंक स्माइथ के क़दम पड़े थे। हमारे सामने चांगत्से का विशालकाय हिमाल था, दाईं ओर वेस्ट रोंगबुक ग्लेशियर के हिम-कगार [cornices] और क्षितिज पर नुकीली पेंसिल की तरह उभरे हुए फ़र्स्ट स्टेप [8498 मीटर] और सेकंड स्टेप [8595 मीटर]।

3 मई की सुबह हवा शांत थी। नॉर्थ रिज जो अपनी बर्फ़ीली तेज़ हवाओं और जमा देने वाली ठंड के लिए पर्वतारोहियों में जानी जाती थी, आज मौसम बदला था। यह एक छलावा था। तभी 7700 मीटर की ऊँचाई पर एक रहस्यमय वाक़या हुआ। नेपाल की ओर से उड़ता हुआ एक छोटा निजी विमान खुम्बू ग्लेशियर और ल्हो ला के ऊपर से गुज़रा और वेस्ट रिज का चक्कर काटकर ओझल हो गया। क्या यह सच था! 1933 के ब्रिटिश पर्वतारोही फ़्रैंक स्माइथ ने भी इसी ऊँचाई पर आसमान में तैरते हुए दो विशालकाय रहस्यमयी गुब्बारे देखने का दावा किया था—जो असल में हाइपोक्सिया [ऑक्सीजन की भारी कमी] के कारण दिमाग़ में पैदा हुआ एक गहरा भ्रम था।

क्या वह सचमुच एक हवाई जहाज़ था या दिमाग़ तक पर्याप्त ऑक्सीजन पहुँचना बंद हो गया था! कुछ समझ पाना क़तई आसान नहीं था। नीचे लौटते हुए वांगचुक, दोर्जे और नोर्फेल जब मिले—उन्होंने भी बात दुहराई कि उन्होंने जहाज़ देखा था। थकान ने जान आधी कर दी थी। कैंप 5 हाथ भर की दूरी पर था, लेकिन सारा उत्साह, सारा दंभ ग़ायब हो गया था। इतनी ऊँचाई पर अहंकार टिक नहीं पाया।

उन दिनों हिमाल पर चोरी का डर भी भयानक था—इतनी सारी अंतरराष्ट्रीय टीमों के बीच रस्सियाँ, उपकरण और ऑक्सीजन सिलिंडर ग़ायब होना एक आम, मगर शर्मनाक बात हो चुकी थी। उसी शाम सांगे, नाधरे और कुसांग शेरपा ने 8320 मीटर पर कैंप 6 स्थापित करने की ख़बर दी। हम नज़दीक थे।

इस अभियान में एक युवा, हँसमुख और जाँबाज़ लड़का था हेड कांस्टेबल त्सेवांग पालजोर। वह पथरीले पहाड़ों, गहरी घाटियों और लद्दाख के शीत मरुस्थल के अनुभव के साथ यहाँ आया था। उनके साथ सूबेदार त्सेवांग समानला भी थे। वह एक अनुभवी पर्वतारोही थे, जिन्होंने 1984 में एवरेस्ट और 1991 में दुनिया की तीसरी सबसे ऊँची चोटी कंचनजंघा को जीता था। तीसरे साथी थे लांस नायक दोरजे मोरुप—शांत, दृढ़निश्चयी और कभी हार न मानने वाले लद्दाखी जवान।

जब 7 मई को एबीसी में पहली समिट टीम के नामों की घोषणा हुई, तो इन तीनों के चेहरों पर एक शांत चमक थी। वह सबसे पहले पहुँच सकते थे। टीम में उनके साथ जोध सिंह, वांगचुक और हरभजन सिंह भी थे। 8 मई को वे कैंप 5 पहुँचे और 9 मई को ‘बॉयलर-प्लेट स्लैब्स’ यानी चपटी, फिसलन भरी चट्टानों को पार करते हुए 8320 मीटर पर स्थित कैंप 6 के छोटे-से तंबू में जा पहुँचे। वे डेथ ज़ोन ऊँचाई की शुरुआत पर पहुँच चुके थे। अब बस एक रात की बात थी। वे इतिहास रचने वाले थे।

अगले दिन—10 मई की सुबह आसमान में हल्के बादल थे। उस पूरे सीज़न में कैंप 6 से ऊपर क़दम रखने वाली आईटीबीपी पहली टीम थी। इसका सीधा मतलब था कि आगे का रास्ता आसान नहीं होने वाला था। पुरानी रस्सियों को सुलझाते हुए उन्हें ख़ुद अपनी सुरक्षा की नई रस्सियाँ ठोकनी थीं। सवेरे आठ बजे वे निकले—सगरमाथा में समय के हिसाब से यह शुरुआत बहुत देर से हुई थी। 8498 मीटर पर स्थित फ़र्स्ट स्टेप के पास पहुँचते-पहुँचते उनकी नई रस्सियाँ ख़त्म हो गईं। आगे 30 मीटर ऊँचे सेकंड स्टेप को बिना रोप करना बहुत टेढ़ा काम था। पालजोर अकेले कैंप 6 तक गए, भारी रस्सियों का एक नया बंडल पीठ पर बाँधा और दोबारा चढ़कर वापस साथियों तक पहुँचे। इतनी ऊँचाई पर ऐसा करना शरीर को नई मुश्किल देने जैसा होता है, ऑक्सीजन के कम दबाव में दिमाग़ ठीक तरह से काम करना कम कर देता है।

डेथ ज़ोन ने क़ीमत वसूलना शुरू कर दिया था। हरभजन सिंह के पैरों की उँगलियों में गंभीर फ्रॉस्टबाइट हो चुका था, उनका चलना दूभर हो गया था। आगे एक क़दम चलना सौ की उल्टी गिनती करने जैसा था। हरभजन सिंह, जोध सिंह और वांगचुक ने फ़र्स्ट स्टेप से वापस लौटने का फ़ैसला किया। आगे तीन लोग रह गए थे—समानला, दोरजे मोरुप और त्सेवांग पालजोर। तीनों आगे जाने का तय कर चुके थे। दुपहर 3:40 बजे उन्होंने सेकंड स्टेप पर 1975 की चीनी एल्युमिनियम सीढ़ी को सफलतापूर्वक पार कर लिया।

शाम के 3:50 बजे एबीसी में रखा वॉकी-टॉकी घरघराहट के साथ गूँज उठा। समानला की आवाज़ आई : वे शिखर की अंतिम ढलान पर हैं और चोटी की तरफ़ बढ़ रहे हैं। भारतीय कैंप में बैठे साथियों के लिए यह गर्व का क्षण था। लेकिन नीचे बेस कैंप में अनुभवी पर्वतारोहियों को अनहोनी का आभास हो चुका था। शाम के चार बजने वाले थे और एवरेस्ट पर यह वक़्त शिखर छूने का नहीं, बल्कि हर हाल में नीचे कैंप में लौटने का होता था। समानला, दोरजे मोरुप और त्सेवांग पालजोर के लिए समय उल्टा चल रहा थी। उनसे एवरेस्ट पर देर होने की भूल हुई थी।

शाम 6:30 बजे समानला की आवाज़ दुबारा वायरलेस पर गूँजी। आवाज़ में थकान और अपार ख़ुशी थी : “हम तीनों शिखर पर पहुँच गए हैं!”

मोहिंदर सिंह ने उनसे कहा कि वे चोटी पर चीनी दल द्वारा लगाए गए Tripod और जीपीएस प्रिज्म देखें और तस्वीरें लें। उधर, North Col. पर मौजूद नॉर्वेजियन और भारतीय सपोर्ट टीम ने दूरबीन से देखा कि तीनों पर्वतारोही शिखर से महज़ 150 मीटर नीचे, लगभग 8,700 मीटर की ऊँचाई पर थे। बाद में लेखक जॉन क्रेकॉवर ने अपनी किताब ‘Into Thin Air’ में लिखा कि शायद घने बादलों, धुँध और ऑक्सीजन की कमी के कारण वे उसी ऊँचे उभार को मुख्य शिखर समझ बैठे थे।

शाम के सात बज चुके थे। बर्फ़ीला तूफ़ान अपने भयंकर रूप में था। हिमाल के दूसरी ओर दक्षिणी रास्ते [South Col] पर स्कॉट फिशर और रॉब हॉल समेत पाँच पर्वतारोही भी उसी रात तूफ़ान की चपेट में आ चुके थे। तापमान शून्य से 40 डिग्री नीचे पहुँच गया था। आने वाले 24 घंटे एवरेस्ट इतिहास में अबतक के सबसे कठोर 24 घंटे थे। शाम 7:30 बजे के आस-पास, एबीसी में टेलीस्कोप से लगातार नज़र लगाकर रखे साथियों को घने अँधेरे और तूफ़ान के बीच दो हेडटॉर्च की टिमटिमाती हुई रोशनियाँ दिखाई दीं। वे रोशनियाँ सेकंड स्टेप की तरफ़ बहुत तेज़ी से उतर रही थीं। फिर अचानक, एक रोशनी डगमगाई और गोल-गोल घूमती हुई सेकंड स्टेप के आस-पास ग़ायब हो गई। दूसरी रोशनी भी दिखना बंद हो गई। वायरलेस पर किसी तरह की हलचल नहीं थी।

अगली सुबह, 11 मई को सुबह छह बजे नॉर्थ Col. से प्रेम सिंह ने वायरलेस पर बताया कि कैंप 6 ख़ाली पड़े हैं; तीनों जवान रात भर में नीचे नहीं लौटे। दूरबीन से देखने पर सेकंड स्टेप के ठीक ऊपर एक आकृति दिखाई दी, जो बेहद धीमी गति से इधर-उधर होते हुए नीचे उतरने का रास्ता तलाश रही थी। इसी रोज़ जापान के फुकुओका पर्वतारोहण दल के दो सदस्य—तीन शेरपाओं के साथ कैंप 6 से शिखर के लिए निकले। भारतीय दल ने बेस कैंप के ज़रिए जापानी दल से संपर्क साधा और मदद की गुहार लगाई। रास्ते में फ़र्स्ट और सेकंड स्टेप के बीच, जापानी पर्वतारोहियों को लांस नायक दोर्जे मोरुप दिखे। उनके दोनों हाथ काले पड़ चुके थे, भयानक फ़्रॉस्टबाइट की वजह से उँगलियाँ पूरी तरह से जम चुकी थीं। उँगलियाँ इतनी ज़्यादा सूज चुकी थी कि उन्होंने दस्ताने पहनने से मना कर दिया। दर्द और सूजन के चलते वह अपनी सुरक्षा क्लिप [Carabiner] को फ़िक्स रोप से अलग नहीं कर पा रहे थे। जापानी टीम ने उनकी क्लिप खोली और अगली रस्सी में फँसा दी। जापानी दल समिट के लिए आगे बढ़ गया।

आगे सेकंड स्टेप के पास उन्हें समानला का मृत शरीर मिला। उसी के आस-पास पालजोर भी भ्रम और दर्द की हालत में बर्फ़ पर तड़पते दिखे, लेकिन जापानी टीम रुकी नहीं।

आधे दिन के बाद जब जापानी पर्वतारोही समिट से लौट रहे थे, उन्होंने दोरजे मोरुप को फ़र्स्ट स्टेप के नीचे फिर से देखा। वह लगभग रेंगते हुए कैंप 6 की तरफ़ बढ़ने की कोशिश कर रहे थे। जापानी दल उन्हें वहीं छोड़कर आगे निकल गया। कैंप 6 से कुछ ही दूरी पर, आज तीस साल बाद एक लैंडमार्क की तरह देखे जाने वाले ‘ग्रीन बूट्स केव’ की ओट में दोरजे मोरुप सगरमाथा के हो गए।

जॉन क्रेकॉवर ने जापानी टीम के रवैये पर खेद जताते हुए, गंभीर सवाल उठाए। हालाँकि आईटीबीपी और जापानी दल के बीच राजनयिक स्तर हुई बातचीत के बाद कहा गया कि भाषा की समस्या थी और जापानी समझे कि वे ताइवानी पर्वतारोही हैं।

उधर तीन साथियों की मृत्यु के बाद बेस कैंप में उदासी थी। कई अंतरराष्ट्रीय दलों ने सलाह दी कि इस दुखद हादसे के बाद अभियान को रद्द कर दिया जाना चाहिए। लेकिन दिल्ली से आदेश के बाद एक और प्रयास किया गया। 17 मई को संगे शेरपा, हीरा राम, ताशी राम और कुसांग शेरपा ने एक बार फिर कैंप 6 से चढ़ाई शुरू की। सुबह 9:55 बजे वे शिखर पर पहुँचे। लौटते वक़्त उन्होंने देखा कि सेकंड स्टेप से 20 मीटर दूर समानला का शरीर पड़ा था—उनकी लाल जैकेट और रैकसैक ग़ायब थे, लग रहा था मानो किसी बर्फ़ीले बवंडर ने या शायद बाद में गुज़रे किसी पर्वतारोही ने उन्हें हिलाया हो। नीचे उतरते हुए कैंप 6 के पास उन्हें दोरजे मोरुप का शरीर मिला, जो एक चट्टान की ओट में अपनी जैकेट और रैकसैक के साथ शांत सो हुए लग रहे थे।

तीसरे साथी त्सेवांग पालजोर रास्ते भर में कहीं नहीं दिखे। माना गया कि वह शायद सेकंड स्टेप की पूर्वी ढलान यानी कांगशुंग फ़ेस की तीन हज़ार मीटर गहरी खाई में गिर गए थे।

जून 2026 वर्षों तक दुनिया यही मानती रही कि यह मृत देह [1996 में] 28 वर्षीय त्सेवांग पालजोर की है। पॉपुलर पर्वतारोहियों की चर्चित किताबों, बीबीसी के फ़ीचर लेखों और इंटरनेट में कई ब्लॉग्स ने इस धारणा को आम कर दिया कि त्सेवांग पालजोर ही ‘ग्रीन बूट्स’ हैं। जबकि पी. एम. दास [Parash Mani Das] के 1997 के यात्रा-वृतांत और उस समय के आईटीबीपी [ITBP] दल के आधिकारिक रिकॉर्ड ने पत्थर की ओट [कैंप 6] के पास मिलने वाले शरीर को लांस नायक दोर्जे मोरुप [Dorje Morup] का ही शरीर माना था।

इससे पहले साल 2014 के आस-पास यह ख़बरें आई थीं कि चीनी अधिकारियों या शेरपाओं ने सम्मानस्वरूप ‘ग्रीन बूट्स’ को पत्थरों से ढँक दिया है, जिससे वह आने-जाने वाली पर्वतारोहियों की नज़र में न आए। लेकिन 2006 में नॉर्थ साइड से अपनी पहली सफल चढ़ाई करने वाले अंतरराष्ट्रीय गाइड छिरिंग जांगबू शेरपा ने अपने संस्मरण में बताया है कि जब वह बर्फ़ीली हवाओं से बचने के लिए उस चट्टानी ओट में घुसे, तो उन्हें वहाँ बर्फ़ की एक पतली चादर के नीचे कुछ दबा हुआ महसूस हुआ। बर्फ़ के नीचे से वही नियॉन हरे जूते झाँक रहे थे। ग्रीन बूट्स कहीं नहीं गए थे—पहाड़ अपने लैंडमार्क को इतनी आसानी से मिटने नहीं देता।

आज एवरेस्ट की ढलानों मृत पर्वतारोहियों की संख्या दो सौ से भी अधिक है। उनके शरीर नीचे लाना महँगा काम है। लेकिन यहाँ सवाल केवल पैसे का नहीं है—यह विकल्प मृत शरीर को नीचे लाने वालों के लिए बहुत अधिक ख़तरनाक है। छिरिंग जांगबू शेरपा बताते हैं कि 8,500 मीटर की ऊँचाई पर, जहाँ हवा में केवल एक-तिहाई ऑक्सीजन होती है, वहाँ एक क़दम चलना पहाड़ तोड़ने के बराबर ही है। तीस सालों से माइनस तीस-चालीस डिग्री में जमी हुई एक देह का वज़न भारी गियर और बर्फ़ के साथ 150 से 200 किलो तक हो जाता है। वह देह पत्थर की तरह सख्त हो चुकी होती है। ऐसे शरीर जो बेतरतीब ढंग मुड़े हों, उन्हें संकरी ढलानों और तीखी चट्टानों से नीचे लाना भी जानलेवा हो जाता है। कई बार ऐसे अभियानों में शव को नीचे लाने के लिए जमे हुए अंगों को काटना तक पड़ता है—यह सब भीतर से कमज़ोर करता है।

यहाँ नेपाल और तिब्बत में मृत शरीर को लेकर एक गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक द्वंद्व भी है। हिमालय के शेरपा ज़्यादातर तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुयायी होते हैं। वे ‘सगरमाथा’ या ‘चोमोलुंगमा’ को संसार की देवी माँ मानते हैं। वे मृत शरीरों को अपवित्र करने या उन्हें बेवजह छूने के सख्त ख़िलाफ़ होते हैं। साथ ही साथ अनेक अनुभवी पर्वतारोहियों भी यह मानते हैं कि यदि वह हिमाल पर आख़िरी साँस लें, तो उन्हें हमेशा के लिए वहीं छोड़ दिया जाए।

अक्टूबर का यह तीसरा हफ़्ता है। अगर आप इस वक़्त सोलुखुम्बु में नाम्चे से ऊपर तेंगबोचे या फ़ेरिचे की पगडंडियों पर चल रहे हों, तो आपको चारों तरफ़ एक सुहानी चहल-पहल मिलेगी। यह ट्रेकर्स का मौसम है। मानसून विदा ले चुका है। घाटियों में याक के गलों की घंटियों की आवाज़ दूर-दूर तक जा रही है, लॉज भरे हुए हैं और दुनिया भर से आए ट्रैकर्स एवरेस्ट बेस कैंप की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन यह रौनक सिर्फ़ नीचे है। ऊपर, 8000 मीटर के पार सगरमाथा का शिखर वीरान और ख़ाली है। हवाएँ लौट चुकी हैं, तापमान शून्य से चालीस डिग्री नीचे लुढ़क चुका है। आईटीबीपी के टेंडर की मियाद भी पूरी होने वाली है।

काग़ज़ों में पढ़कर तो आसान ही लग रहा है कि छह शेरपा जाएँगे, 8,500 मीटर पर जमी हुई देह को रस्सियों से बाँधेंगे और नीचे ले आएँगे। मैं सोचता हूँ, अगर यह मिशन पूरा हो भी जाएगा... अगर वह 150-200 किलो की पत्थर बन चुकी देह किसी दिन रस्सियों के सहारे नीचे उतार भी ली जाती है, फिर क्या होगा!

“बेस कैंप... कॉपी... हम ग्रीन बूट्स तक पहुँच गए हैं। हम ठीक हैं!”

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