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भारतीय सड़कें जादूगर का मंच हैं!

आजकल मैं ड्राइविंग सीख रहा हूँ। मेरे घरवाले बड़े समय से मुझसे कहते घूम रहे थे कि उन्हें घर में एक ड्राइवर की कमी खलती है।

“पैसा देकर ड्राइवर रखना हम अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते। फिर ये स्साले ड्राइवर चोर भी होते हैं [सभी नहीं]। तुम क्यों नहीं ड्राइविंग सीख लेते? सब्ज़ी-भाजी लानी है, किसी पार्टी-फ़ंक्शन में इतराते हुए ‘अपनी गाड़ी’ से सज-धज कर पहुँचना है, किसी वयोवृद्ध को बिठाकर अस्पतालों के चक्कर काटने हैं—इन सबके लिए एक गाड़ी के साथ एक अदद ड्राइवर भी तो लगता ही है। फिर तुमको हमने क्या यूँही बैठने के लिए जन्म दिया था? श्रवण कुमार तो अपने माँ-बाप को कंधे पर उठाकर घुमाता था और तुम हमें एक गाड़ी में नहीं घुमा सकते?”

पिछले दो-एक साल से माता-पिता के प्रति फ़र्ज़ की पुकार, माँ के दूध का उधार और कुमार साहब के लड़के श्रवण का माता-पिता के प्रति प्यार आदि प्रकार की कई लानतों को सुन-सुन कर मैं आम की तरह पक चुका था। इसलिए इस बार मैंने सोचा कि यह काम भी निपटा ही देते हैं और मैंने कार सीखना शुरू किया।

लगभग महीने के भर के कोर्स में से 15 दिन पूरे हो चुके हैं और अब तक मुझे ठीक-ठाक गाड़ी चलाना आ गया है। गाड़ी सीखते हुए भारतीय सड़कों के विषय में मुझे तीन अहम बातें भी समझ आई हैं। पहली तो यह कि हमारी सड़कें किसी जादूगर का मंच हैं। हर क्षण यहाँ एक जादूगरी के प्रोग्राम को अंजाम दिया जा रहा है। कहीं से, कभी भी, कुछ भी प्रकट हो सकता है। दायीं ओर चल रही गाड़ी कब जादूगर के ख़रगोश की तरह बायीं ओर से प्रकट होगी आप जीवन भर ड्राइविंग करने के बाद भी नहीं जान सकते।

दूसरी अहम बात यह कि दुपहियों पर चलने वाले लोग अपनी पिछली सीट पर यमदूत को बैठाकर ही घर से चलते हैं। आड़े-तिरछे कहीं से भी घुसते हुए निकलते हैं और यमदूत के हाथ में निवाला देकर छीन लेने की अदा से दुपहिया दौड़ाते हैं।

और तीसरी बात यह कि सड़क हमारे ‘ऑलमोस्ट’ राष्ट्रीय पशु यानी गाय-भैंसों का डेरा भी है। उनका मायका टाइप है सड़क। यहाँ वे कभी भी, कैसे भी लेटकर आराम कर सकती हैं। कभी अगर जुगाली करते-करते हुए उनका शरीर ज़रा बोझिल होने लगे, लंच में खाई गई ‘टेस्टी’ घास-फूस के मद में चूर होकर आँखे झुकने लगें और मन हो जाए कि यार आज मौसम ज़रा अलसाने जैसा हो रहा है तो क्यों ना बीच सड़क पे एक नींद मार ली जाए? लगता है ट्रैफ़िक जाम तो स्साला लग जाये––हमें क्या? और जो एक बार वे सड़क पर पसर गईं तो आप खड़े रहिए और करते रहिए लाख पों-पों-पीं-पीं; उन्हें तो अब ईश्वर भी नहीं उठा सकता।

इस तरह की ‘इवेंटफ़ुल’ सड़क पर गाड़ी चलाना, मौत के कुएँ में गाड़ी चलाने से कम नहीं है। इसलिए हर बार सड़क पर निकलते ही एक्सीडेंट की संभावना बनी रहती है। हादसा कभी भी हो सकता है। फिर इस तरह के हादसों में जो एक बार फँस गए तो फिर आपका समय भी बड़ा ख़राब होता है। बड़े क़ानून हैं इस तरह के हादसों के विषय में। उदाहरण के लिए एक ‘हिट एंड रन’ के केस को ही देखते हैं। ऐसे मामले में जिसे ‘हिट’ किया गया है, उसकी तो हालत ख़राब होती ही है, ‘रन’ करने वाले की भी बड़ी दौड़ हो जाती है। बचने के लिए पहले तो बड़ा वकील करो, पुलिस ख़रीदो, निर्णय करने वाले को ख़रीदो और कोई लंबा जुगाड़ हो तो सीधे मंत्रालय से सोर्स ही लगवा डालो। बड़ा ख़र्चा हो जाता है, भाईसाब इन सब कामों में!

इसके अलावा सरकारी मुलाज़िमों की भी बहुत भाग-दौड़ होती है। अब किसी के मामले को रफ़ा-दफ़ा ऐसे ही थोड़े कर देंगे! पहले इससे पैसा लो, फिर उसको फँसवाओ, चश्मदीद के दीदों में पेंसिल घुसाने की धमकी देकर उनका मुँह बंद करवाओ, केस की फ़ाइल दबवाओ, तारीख़ें बढ़वाने के बहाने खोजो—ये सब करने में बड़ा समय ज़ाया होता है भैया!

इतने दिनों से अपराधी तो छोड़िए, बेचारा सिस्टम ही इतनी मेहनत कर-कर के त्रस्त हो चुका था। तब एक दिन सिस्टम ने सोचा कि स्साला अब तो कुछ करना माँगता है! और यह बात तो मशहूर-ए-ज़माना है ही कि जब सिस्टम कुछ करने की सोचता है तो फिर सिस्टम का बंटाधार कर के ही दम लेता है। इस सोच का नतीजा यह निकला कि सिस्टम ने सब प्रक्रियाओं में बड़े बदलाव किए। सरकारी महकमों ने जनता को अधिक परेशानी से बचाने के लिए [और थोड़ी-सी ‘पॉकेटमनी’ कमाने हेतु] एक नवीनतम और सरलतम तरीक़ा खोज निकाला।

अब आप को कुछ नहीं करना है। आप किसी को अपनी गाड़ी से उड़ाइए और अपने गॉगल पहने रईस माँ-बाप को लेकर सिस्टम के आगे गिड़गिड़ा डालिए, “अंकल, अंकल, हमसे न वो… ग़लती से मिस्टेक हो गई। आगे से नहीं करेंगे। पिंकी प्रॉमिस!” सिस्टम यह सुनकर आपको थोड़ा पुचकारेगा और कहेगा, “ठीक है बेटा। हम समझते हैं। जवान लौंडों से तो हो ही जाती हैं एक-आध मौतें। अब आदमी सड़क पे चलेगा तो मरने का ‘डेंजर’ तो रहने का ही है! तुम एक काम करो बेटा, फ़ॉर्मालिटी के लिए ही, हमको एक निबंध लिख के दे दो कि अंकल, हम आगे से ऐसा नहीं करेंगे। उसके बाद अपनी मर्सिडीज लो और घर जाके शरबत पीओ! ठीक है?”

मैं इन नियमों के पूरे समर्थन में हूँ। आपको दिक़्क़त है तो हो। मैं नहीं हूँ इतना पत्थर दिल! मेरा हृदय इस देश के भविष्य के लिए मरा जा रहा है। क्यों ही फँसे यार किसी का लल्ला क़ानून के पचड़ों में? फिर एक लेखक होने के नाते मुझे अपने लिए यहाँ एक ‘ऑपर्च्युनिटी’ भी नज़र आती है। जिस हिसाब से इस देश के सीधे-सादे जवान लौंडे आए दिन किसी को यमदूत का ‘अपॉइंटमेंट’ दिलाने को अपना पार्ट टाइम समझने लगे हैं, मैं उनका जीवन सरल करने हेतु पूरे हृदय से प्रस्तुत हूँ। मेरा ऐसा मत है कि देश के भविष्य को यूँ निबंध-विबंध लिखने में समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए। उन्हें तो अभी और हत्याएँ करनी हैं, वे बेचारे कहाँ इधर समय बर्बाद करते फिरेंगे यार!

इसलिए मैं एक निबंध उनके हेतु तैयार करके दे रहा हूँ। जो भी बालक इस तरह के केस में फँसे, वे मुझसे संपर्क कर सकता है और मैं उचित दाम पर [लेखक का भी घर-परिवार है भैया!] यह निबंध उन्हें उपलब्ध करा दूँगा। निबंध नीचे प्रस्तुत है—

‘आज इस स्वर्णिम मौक़े पर मैं यहाँ आपको सॉरी कहने प्रस्तुत हुआ हूँ। क्या कहूँ अब? हो गई ग़लती। आप तो जानते ही हैं, जवान लौंडों से तो ग़लती हो ही जाया करती है। लौंडा जवान ही इसलिए होता है ताकि वो निश्चिंत होकर ग़लती कर सके। हमसे भी हो गई तो इसमें ऐसा नया कुछ नहीं हुआ। फिर न होगी। वादा करते हैं हम। मम्मी क़सम!

लेकिन अब आप ही बताइए इसमें क्या सिर्फ़ हमारी ही ग़लती है? सड़क थी ख़ाली। हाथ में थी स्टीयरिंग। पैर के नीचे था एक्सीलेटर—सो दबा दिया हमने! हमें क्या पता था सड़क पे आदमी भी चलता है और उसको मारना अपराध है!? हमें तो यही पता था कि सड़क पे जानवर चलते हैं। आदमी तो गाड़ियों में चलते हैं। जहाज़ों में उड़ते हैं। ट्रेनों के भीतर लम्बलेट होकर आराम से सफ़र करते हैं। फिर कौन हैं ये पुरातन मानसिकता के लोग जो अभी भी पैरों पर चल रहे हैं? जब इतनी सुविधा है तो सड़क पर कोई चलता ही क्यों है? और इतनी जनसंख्या के चलते एक-आध आदमी मर भी गया तो यह दुनिया का भला करने वाली बात क्योंकर न हुई? इसके लिए तो हमें अवार्ड मिलना चाहिए। लेकिन नहीं! आप तो हमें उठाकर ले आए। हमने न्यूज़ भी देखी। वहाँ भी लोग न जाने क्या-क्या बक रहे हैं—हम बिगड़े हुए हैं, ऐसे हैं, वैसे हैं, अपराधिक मानसिकता के हैं! यह भी कोई बात हुई? उन्हें भी बताइए कि हम क़ानून की कितनी मदद कर रहे हैं। यहाँ बैठ कर निबंध लिख रहे हैं। नहीं तो इस वक़्त तो हमने क्लब में अपने दोस्तों के डांस करने का प्रोग्राम बना रखा था। दारू और नशे का भी बढ़िया इंतज़ाम था। लड़कियों का भी था। लेकिन फिर भी हम यहाँ बैठे हैं क़ानून के पास और आपको सॉरी बोल रहे हैं। क़ानून की मदद करने का हमें ये सिला मिल रहा है? भलाई का तो ज़माना बचा ही नहीं है अब भाईसाब!

यह तो न्याय नहीं है। यह तो अच्छा है कि हमारी जेब में पैसा है और हम न्याय को मार्केट से ख़रीद सकते हैं। ‘फ्लिपकार्ट’ पर न्याय ऑनलाइन भी मिलना चाहिए ताकि हमें उसे ख़रीदने के लिए अदालतों और पुलिस थानों तक न आना पड़े। एक तो हमने इतना पैसा देकर न्याय ख़रीदा, फिर भी हमें यहाँ आकर बैठना पड़ रहा है। यह कैसी कस्टमर सर्विस है भाई आपकी?

फ़िलहाल चलिए आप कह रहे हैं तो हम किए देते हैं। आप भी क्या याद रखिएगा। लीजिए—आई एम सॉरी। आगे से नहीं होगी ग़लती। हमसे नहीं होगा एक्सीडेंट। आगे से दारू पीकर गाड़ी नहीं चलाएँगे। जो पीकर चलाएँगे तो किसी को ठोकेंगे नहीं। जो ठोक दिया तो भागेंगे नहीं। जो भाग गए तो कोशिश करेंगे पकड़े न जाएँ। और जो पकड़े गए तो? फिर क्या—एक निबंध और लिख मारेंगे आपके लिए!

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गगन तलरेजा को और पढ़िए : आख़िर कितना चक दे इंडिया!प्यार के बाज़ार में | स्कूली निबंधों में महात्मा गांधी | हम चुटकुलों से ख़फ़ा हैं

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