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चेखव और वे 'कल्चर्ड' महिलाएँ

chekhav aur ve kalcharD mahilayen

ललित कार्तिकेय

ललित कार्तिकेय

चेखव और वे 'कल्चर्ड' महिलाएँ

ललित कार्तिकेय

और अधिकललित कार्तिकेय

    मेरे लिए बुरा दिन वह होता है; जब किसी कवियाए मनुष्य या घोर उत्साही साहित्यानुरागी से भेंट हो जाए, या किसी ऐसे ‘विचारक’ से जो विभिन्न वाद-विवादों में धैर्य से गहरे पैठा हो, पर फिर भी इस क्षेत्र में अंधाधुंध अपनी गदा घुमाए रहता हो। घोर कलाहीन और ‘विचार-विरोधी’ लोगों से अब तकलीफ़ नहीं होती। उनकी मौजूदगी में जैसे अपना समय और उसका नाटक घटित हो रहे होते हैं। आप आराम से इसे देखते-सुनते रह सकते हैं, या फिर दिमाग़ी तौर पर अपने संसार में जा सकते हैं, या ऊपरी तौर पर ख़ुद इस नाटक में शामिल होने का दिखावा करके, अपने असली आप को बचाए रहते हैं। वे आपको कई संसारों से तालमेल बनाने के झंझट में नहीं डालते। पर कोई आदमी वैसे तो बेहद हिसाबी-किताबी और दुनियादार हो, लेकिन जब भी आप उसके साथ फँस जाएँ, वह तुरंत अपनी ताज़ा ग़ज़लें आपको सुना डाले और बीच-बीच में कोई जलेबीनुमा वैचारिक व्याख्यान भी देता चले, तब? तब, जब आप जानते हों कि साहित्य से उसका ठीक वैसा ही रिश्ता है, जैसा फ़रीदाबाद के उन ढेर क्लर्कों का रिश्ता गर्मियों के मौसम में इंवर्टर से होता है, जिन्हें वे ‘पार्ट टाइम’ बनाते-बनवाते-बेचते हैं। या कोई अपने असली संसार की असली बातें, कहने-सुनने की बजाय आपके सामने ‘विचारवान’ होने की नौटंकी करने लगे। यूँ ग्राम्शी के मुताबिक ‘हर आदमी दार्शनिक है’, बशर्ते वह अपने जीवन-अनुभव पर बात करे। पर इस तरह की बातें जिनसे उसका कोई सच्चा रिश्ता है ही नहीं; उसे दार्शनिक नहीं, कार्टून बना देंगी। शायद इसी तरह के लोगों को मद्देनज़र रखते हुए मुक्तिबोध ने लेखकों को ‘साहित्यकारों’ से दूर रहने की सलाह दी होगी।

    चेखव के साथ घटी एक घटना या दुर्घटना याद आती है। संपन्न घरानों की कुछ महिलाएँ उनसे मिलने के लिए आईं। संपन्न लोगों को संपन्नता के बाद जो अगला शौक चर्राता है—वह है ‘कल्चर्ड’ दिखने का। जैसे नए रईस और उनकी बीवियाँ; अँग्रेज़ी जानने का दावा करने के फेर में ‘रेपीडेक्स’ से वाक्य याद कर उनका हास्यास्पद प्रदर्शन करते हैं, या एक अजीब-सी भाषा बोलते हैं; जिसका नामकरण ‘अँग्रेज़ी’ के रूप में किया गया है, तो उन्हें ‘कल्चर्ड’ दिखने का भी शौक होता है। अब कल्चर के साथ दिक्कत यह हैं कि वह होती है हमारी मांस-मज्जा में रची-बसी, वह रिश्वत के पैसे की तरह एकाएक नहीं जाती। उसे कार, सूट, कॉस्मेटिक्स की तरह ख़रीदकर नहीं लाया जा सकता। चेखव से मिलने आई महिलाएँ आज के अनेक नए रईस पुरुषों और महिलाओं की तरह ये बातें नहीं जानती थीं। उन्होंने तो कल्चर्ड दिखने की जी-तोड़ कोशिश शुरू कर दी, यानी कला, साहित्य, संस्कृति इत्यादि के बारे में बातचीत। चेखव को इससे भीतर उतना ही दर्द हुआ होगा, जितना माँ के गर्भ में ग़लत भाषा या व्याकरण सुन अष्टावक्र को हुआ था और इस दर्द ने आठ जगह उनके शरीर में मोड़ डाल दिए। चेखव के साथ इतना तो ख़ैर नहीं हुआ, पर वे दर्द में पहलू बदलते रहे होंगे। आख़िरकार उन्होंने एक तरक़ीब सोची। वे विभिन्न मुरब्बों और उन्हें बनाने की विधियों के बारे में सवाल पूछने लगे। संभ्रांत महिलाओं ने कला, संस्कृति का अपना मुखौटा उतार दिया और सहज होकर मुरब्बों के बारे में बतियाने लगीं। अब वे असल थीं, अब उनकी बातें बिना किसी कष्ट के चेखव सुन सकते थे।

    ऐसे ‘कल्चर्ड’ लोगों को झेलना सचमुच एक यातना से गुज़रना है। इनकी बजाय उन लोगों से बात करना ज़्यादा शिक्षाप्रद लगता है, जिन्हें ‘अनकल्चर्ड’ वग़ैरह कहा जाता है। उनके पास मुखौटे नहीं होते और शब्द जीवन-घोल में से डूबकर आने की वजह से अर्थ लगते हैं, मात्र ध्वनियाँ नहीं। कल्चर्ड लोगों की कल्चर्ड बातचीत की बजाय, मैं बंदर की खों-खों सुनना पसंद करूँगा। कोयल का गाना, गधे का बोलना, गाय का रंभाना, सब-कुछ अच्छा लगता है—इन कल्चर्ड लोगों की बातचीत के मुक़ाबले। किसी शाम के साँवले झुटपुटे में एक निर्जन जगह में, गूँजती झींगुरों की आवाज़ तक आपको एक विशुद्ध काव्यात्मक अनुभव तक ले जाती है और इन कल्चर्ड लोगों की बातचीत एक ऐसी वितृष्णा तक, जो जाने कब खदककर क्रोध बन जाए। इस तरह के कल्चर्ड लोगों के बीच वह वितृष्णा और क्रोध ऐसी शक्ल भी ले लेता है कि आप कहने लग जाएँ—“देखिए साहब या साहिबा! अपने राम कला, संस्कृति जैसी चीज़ों को बिल्कुल वाहियात मानते हैं और चाहते हैं, अपनी अगली दस पीढ़ियाँ भी इससे दूर रहें। हमें तो भिंडी के बाज़ार-भाव पर बात करना ज़्यादा अच्छा लगता है। हमारी समझ के परे की चीज़ है—यह कल्चर वल्चर।” और सबसे बड़ा आनंद तब आता है, जब वे आपकी इन बातों को सच समझ बड़बड़ाते या बड़बड़ाती हैं—“व्हॉट एन अनकल्चर्ड ब्रूट!”

    इसी तरह का व्यवहार उन कवियों और लेखकों से करने का मन होता है, जो मिलते ही कविता पर चिंता करना शुरू कर दें, संस्कृति और कला को लेकर मच जाएँ। जबकि संस्कृति और कला के लिए एक संकट तो उन्हीं का होना भर है। मसलन ऐसे कवि का आप क्या करेंगे, जो करुणा-करुणा चिल्लाता घूमता हो? आपको लगने लगे कि भई, यह आदमी तो अपने भीतर से पैदा करुणा के जल में अगले ही पल गल जानेवाला है, लेकिन इराक और अमेरिका के बीच होनेवाले युद्ध की तुलना क्रिकेट मैच से करे। लानत है ऐसी अमानवीय काव्य-संवेदना पर! उससे तो यही कहा जा सकता है पिंड छुड़ाने के लिए—“मैं, भाई मेरे, ज़रा जल्दी में हूँ। कमाल लिख रहे हैं आप। किसी दिन जमकर बैठक करते हैं। फिलहाल चलता हूँ। आप और लिखिए भाई, और लिखिए।”

    ‘साहित्यकारों’ की एक ख़ास प्रजाति के बारे में कुछ टिप्पणियाँ और। यह प्रजाति लघुकथाओं और ग़ज़लों का उत्पादन करती है। यह प्रजाति ही या तो काफ़ी आबादी रखती है, या फिर यह अति-उत्पादन करती है कि हिंदी की तमाम गंभीर पत्रिकाओं ने एक घोषणा ही अपने पृष्ठों पर देनी शुरू कर दी—“कृपया हमें लघुकथाएँ और ग़ज़लें भेजें।” विधा-रूपों के ख़िलाफ़ ही किसी का पूर्वाग्रह हो जाए, ऐसा आमतौर पर किसी भी सोचने-समझने वाले आदमी के साथ होता नहीं है। लेकिन यह ज़रूर होता है कि किसी दौर में कुछ विधाएँ (अ)-रचनाकारों का भीड़-भरा मंच बन जाएँ। लघुकथा और ग़ज़ल हिंदी में दो ऐसे ही मंच हैं। यहाँ काफ़ी सारा हास्यास्पद उत्साह और अतिरेक और अतिरंजनाएँ हैं। जिनका यथार्थ बोध ‘लघु’ है, वे लघुकथाएँ बना रहे हैं; जिनके यथार्थ-बोध में हवाईपन है, वे ग़ज़लें। इनमें ज़्यादातर साहित्य के सनातन मानसिक किशोर हैं। इनकी सेना सबसे बड़ी है, इसलिए सांप्रदायिक शक्तियों ने इन्हें ही लामबंद करने की जुगत निकाली है। ये लोग सांप्रदायिक हैं, ऐसा हमारा मानना नहीं है। इनमें अनेक लोगों की ‘रचनाओं’ में एक मुखर सांप्रदायिकता-विरोध दिखता है। ये मंच पाने की ख़ातिर वहाँ हैं। इनके यथार्थबोध में मौजूद एक ‘रबरपन’ है, एक अवसरवादी लचीलापन। उसके चलते, वैसे ये हर कहीं आवाजाही रखते हैं। संस्कृति का जनवादीकरण करने का दायित्व जिन्होंने लिया है, वे कृपया इस सेना के बारे में भी सोचें, क्योंकि यह निम्न मध्यवर्ग की तीव्र-विस्फोटक ज़मीन से उगी पौध है—हिंदी-भाषी जगत में। इसमें एक भयानक क़िस्म का तुरत-फुरतपन है, जो ख़ुद इन्हीं के लिए आत्मघाती होता आया है। ये अपनी रचनात्मक संभावनाओं के क्षितिजों की असली झलक देख सकें, इसके लिए इनका गंभीर अध्ययन ज़रूरी है। ये कला से रिश्ता रखते हों या नहीं, लेकिन क़स्बों-नगरों के सामाजिक जीवन में ये काफ़ी मुखर, घुमंतु और अतार्किक रूप से साहसिक प्राणी हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सामने का समय (पृष्ठ 28)
    • रचनाकार : ललित कार्तिकेय
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2001

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