रीतिमुक्त काव्यधारा
ritimukt kavydhara
रीतिमुक्त साहित्य : यद्यपि सत्रहवीं शताब्दी के बाद के साहित्य में रीतिबद्ध काव्य लिखने की प्रवृत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती गई तथापि यह नहीं समझना चाहिए कि इस काल में रीतिमुक्त काव्य लिखे ही नहीं गए। रीतिमुक्त साहित्य की भी कई धाराएँ हैं। कुछ तो रीतिमुक्त शृंगारी कविताएँ हैं, कुछ पौराणिक और लौकिक प्रबंध-काव्य हैं, कुछ नीति और उपदेश-विषयक कविताएँ हैं और कुछ भक्ति और ज्ञान-विषयक उपदेश के काव्य हैं। इस प्रकार सत्रहवीं शताब्दी के बाद के साहित्य का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण भाग रीतिमुक्त साहित्य का है। प्रेमकथानकों, संत और भक्त कवियों की रचनाओं और अन्य प्रसंगों में हमने इस काल के कुछ रीतिमुक्त साहित्य का परिचय पाया है।
रीतिमुक्त शृंगारी कवि : शृंगारी कवियों की प्रधानता इस काल में बराबर बनी रही। सत्रहवीं शताब्दी से ही ऐसे कवियों का पता लगने लगता है जो ठीक रीति-काव्य के लेखक नहीं कहे जा सकते। मुक्त भावधारा के प्रेमी कवियों में से कुछ ने तो अंतिम वयस में भक्तिमार्ग का अवलंबन किया। उनके हृदय का लौकिक प्रेम अंत तक उदात्त भाव में परिणत होकर भगवद्-भक्ति के रूप में प्रकट हुआ। मध्यकाल के सभी बड़े भक्त कवियों के नाम के साथ इस प्रकार की कहानियाँ जुड़ी हुई हैं जो बताती हैं कि आरंभ में ये भक्तगण लौकिक प्रेमासक्ति के अत्यंत निकृष्ट आवेग के शिकार थे। परंतु कुछ थोड़े से कवि ऐसे भी हैं जिनके संबंध में ऐसी कोई कहानी नहीं है। वे स्वच्छंद प्रेम के मार्ग में विचरण करनेवाले कवि रहे और अंत तक वैसे ही बने रहे। रीतिकालीन काव्य पर श्रीकृष्ण-लीला का प्रभाव बराबर बना रहा। स्वच्छंद प्रेमी कवियों में भी गोपी और गुपाल के नाम आ ही जाते हैं। कभी-कभी यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि इस कवि को शृंगारी कवि कहा जाए या भक्त कवि। साधारणतः जो कवि अंतिम वयस में विरक्त हो गए हैं, या जिनके भजनों को भक्त संप्रदायों ने प्रेरणा का स्रोत समझा है उनकी गणना हमने भक्त कवियों में की है। रसखान और घनानंद प्रथम श्रेणी में पड़ते हैं, विद्यापति दूसरी श्रेणी में। बाक़ी कवियों को शृंगारी ही मानना उचित है।
बेनी : असनीवाले बंदीजन बेनी की कविताएँ ऐसी हैं जिन्हें देखकर विद्वानों ने अनुमान किया है कि इन्होंने कोई रीतिग्रंथ ज़रूर लिखा होगा। इनका जन्म गोसाईं जी की मृत्यु के कुछ उपरांत हुआ होगा, अर्थात् सत्रहवीं शती के अन्त्य भाग में इनका कविता-काल रहा होगा। अभी तक इनका लिखा कोई रीतिग्रंथ मिला नहीं हैं। जब तक कोई पुष्ट प्रमाण ऐसा न मिल जाए कि इनके नाम पर चलनेवाले पद्म किसी नायिकाभेद ग्रंथ के ही हैं तब तक मानना चाहिए कि इन्होंने रीतिबद्ध कविता नहीं लिखी। इनकी कविताओं में घनानंद और बोधा के समान स्वच्छंद प्रेमधारा का आभास मिलता है :
कवि बेनी नई उनई है घटा
मोरवा बन बोलत कूकन री।
छहरैं बिजुली छितिमंडल छ्वै
लहरै मन मैन भभूकन री।
पहिरौ चुनरी चुनि कै दुलही
संग लाल के झूलिए झूकन री।
रितु पावस यों ही बितावती हौ
मरिहौ फिरि बावरी हुकन री।
फ़ारसी साहित्य के परिचय का फल : फिर भी बेनी कवि में वही स्वच्छंदता नहीं है जो अठारहवीं शताब्दी के प्रेमी कवियों में पाई जाती है। इनके काव्य में भारतीय परंपरा की झलक स्पष्ट ही झलकती है। अठारहवीं शताब्दी के कवियों में कुछ ऐसे हैं जिन्हें फ़ारसी साहित्य के अध्ययन करने का अवसर मिला था। उनकी रचनाओं में फ़ारसी साहित्य के ऐकांतिक और कभी-कभी, अनुभयनिष्ठा प्रीति के और भावावेगजन्य वैयक्तिक उल्लास के भाव मिलते हैं। कुछ कवि, जो जन्मतः मुसलमान थे, इस प्रकार के प्रेम का साहित्य आरंभसे ही पढ़ते रहे और संस्कार से ही ऐसे प्रेमोल्लास के कवि थे, और कुछ दूसरे ऐसे कवि थे जिन्होंने फ़ारसी साहित्य के अध्ययन से अपने संस्कारों का मार्जन किया था।
सेनापति, बनवारी : प्रथम श्रेणी के कवियों की परंपरा बहुत पुरानी है। ऐसे अनेक कवि हुए हैं जिनकी रचनाओं को देखकर अनुमान होता है कि उन्होंने किसी प्रकार का नायिकाभेद या नख-शिख या ऋतुवर्णन-संबंधी ग्रंथ अवश्य लिखा होगा, पर ऐसा कोई ग्रंथ प्राप्त नहीं होता। ये कवि विशुद्ध भारतीय परंपरा के कवि हैं। सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में ही ऐसे कवियों का परिचय मिलने लगता है। अनूपशहर के प्रसिद्ध कवि सेनापति की रचनाएँ सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ की ही हैं। इनकी कविताएँ कवित्त रत्नाकर में संगृहीत हैं। ऐसा जान पड़ता है कि कोई ऋतुवर्णन-संबंधी काव्य इन्होंने लिखा था। इनकी भाषा बहुत ही परिमार्जित और प्रौढ़ है। सेनापति हिंदी के चोटी के कवियों में गिने जाते हैं। फिर बनवारी (1633 ई.?) की नीति और शृंगार-संबंधी कविताएँ प्राप्त हुई हैं। मिर्जापुर के कृष्णदास (1800 ई.?) ने माधुरी लहरी नामक एक पुस्तक लिखी थी, जिसे भक्ति-काव्य भी कह सकते हैं।
द्विजदेव : इस श्रेणी के सबसे अंतिम और प्रसिद्ध कवि द्विजदेव (1823-72 ई.) हैं। ये अयोध्या के राजा थे। इनका वास्तविक नाम मानसिंह था। इनकी दो पुस्तकें प्राप्त हुई हैं—शृंगार बत्तीसी और शृंगार लतिका। इनकी रचनाएँ बहुत लोकप्रिय हुईं। भाषा का सहज प्रवाह और भावों का आकर्षक विन्यास इनकी कविता के प्रधान गुण हैं। इनकी रचनाओं में मतिराम के समान सहज भाषा और पद्माकर के समान परिचित वातावरण का सन्निवेश है। इनके ऋतुवर्णन में इस काल के कवियों के समान उद्दीपन-सामग्री की सूची कम प्रस्तुत की गई है और उद्दीप्त भाव की व्यंजना अधिक। उत्तरकालीन ब्रजभाषा कविता में किसी प्रकार रूपक बाँधकर ऋतु-विशेष को अप्रस्तुत वस्तु के प्रतिरूप बनाकर दिखाने की जो भद्दी प्रथा चल पड़ी थी, उसका कोई आभास इनकी रचना मे नहीं मिलता। जहाँ सामग्रियों की सूची है, वहाँ भी भावोद्दीपन की ओर लक्ष्य है :
चहकि चकोर उठे सोर करि मोर उठे
बोलि ठौर ठौर उठे कोकिल सुहावने।
खिलि उठी एकै बार कलिका अपार हिलि—
हिलि उठै मारुत सुगध सरसावने।
पलक न लागी अनुरागी इन नैननि पै,
लपटि गए धौं कबै तरु मन भावने।
उमगि अनंद अँसुवान लौं चहूँधा लागे
फूलि फूलि सुमन मरद बरसावने॥
और जहाँ सहज-स्वच्छ भाषा में ऋतु-सौंदर्य की उद्दीपना का प्रसंग है, वहाँ तो उद्दीप्त भाव ही पाठक को आकृष्ट करते हैं :
न भयो कछु रोग को जोग दिखात
न भूत लगौ न बलाय लगी॥
न कहूँ कोऊ टोनो डिठौनो कियौ
नहि काहू की कीनी उपाय लगी।
द्विजदेव जू नाहक ही सबके
हिये औषधि मूल की चाय लगी।
सखि बीस बिसे निसि याही कहूँ
बन बौरे बसंत की बाय लगी।
फ़ारसी प्रभावापन्न कवि-मुबारक : दूसरी श्रेणी के कवियों की परंपरा भी बहुत पुरानी है। सैयद मुबारिक अली बिलग्रामी 'मुबारक' (जन्म 1583 ई.) फ़ारसी और संस्कृत के बहुत अच्छे जानकार थे। इनकी रचनाएँ सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ की हैं। इनकी अलकशतक और तिलशतक नाम की दो रचनाएँ हैं, जिनमें सुंदरी स्त्री के अलक और तिल का वर्णन मिलता है। इनकी कई रचनाएँ स्वच्छंद प्रेमधारा की ओर इंगित करती हैं। यद्यपि ये रचनाएँ संस्कृत के अलकशतक, रोमावली-शतक आदि की भाँति हैं और हमने अन्यत्र इनकी गणना इसी श्रेणी में की, परंतु इनकी फुटकल कविताओ में ऐसे भाव हैं जो थोड़े नवीन-से लगते हैं। उदाहरणार्थ,
हमको तुम एक अनेक तुम्हैं उनही के विवेक बनाए बहो।
इत आस तिहारी बिहारी उतैं सरसाय कै नेह सदा निबहो।
करनी है 'मुबारक' सोई करो अनुराग लता जिन वोए दहो।
घनस्याम सुखी रहो आनंद सों तुम नीके रहो उनही के रहो।
आलम : इसी प्रकार शेख आलम की कविता में स्वच्छंद प्रेमधारा के भाव प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। आलम नाम के दो कवि हुए हैं। एक तो सोलहवीं शताब्दी के अंतिम भाग में उत्पन्न हुए थे और 'माधवानद कामकंदला' नामक पुस्तक लिखी थी और दूसरे औरंगज़ेब के दूसरे पुत्र मुअज़्ज़म शाह के आश्रित थे। अतएव अठारहवीं शताब्दी के अंत में वर्तमान थे। यहाँ दूसरे आलम की चर्चा की जा रही है। इनके बारे मे प्रसिद्ध है कि ये जाति के ब्राह्मण थे और किसी शेख नामक रंगरेजिन के प्रेम में पड़कर मुसलमान हो गए। प्रेम की कहानी भी विचित्र है। आलम ने अपनी पगड़ी रंगने को दी थी जिसमें दोहे की एक पंक्ति काग़ज़ पर लिखी बँधी रह गई थी—'कनक छरी-सी कामनी काहे को कटि छीन'। रंगरेजिन शेख ने काग़ज़ खोलकर पढ़ा और दूसरी पंक्ति लिख दी—'कटि को कचन काटि विधि कुचन मध्य भरि दीन'। यह पंक्ति ही प्रेम का और अन में धर्मांतर-ग्रहण का कारण बनी। कहा जाता है कि जौनपुर ज़िले में आलम का जो पुराना गाँव है, उसमें अब भी वह ब्राह्मण-कुल और वह मुसलमान-कुल वर्तमान है। दोनों को अपने पूर्वपुरुष पर गर्व है। पता नहीं यह किंवदंती कहाँ तक सच है। कहा जाता है कि शेख भणिति के साथ जो कविताएँ मिलती हैं, वे पत्नी की हैं और आलम नाम से जो कविताएँ मिलती हैं वे पति की। जितनी भी पुरानी पुस्तकें मिलती हैं उनमें शेखआलम के कवित्त लिखा मिलता है। इसलिए कुछ विद्वान् शेख और आलम दो व्यक्तियों के नाम नही मानते और पूरी कहानी को किंवदंती और कल्पित मानते हैं। उनके मत से शेख विशेषण है, आलम विशेष्य। यह एक ही मुसलमान कवि का नाम है जो कभी शेख नाम से कविता लिखने थे और कभी आलम से। यद्यपि ये फ़ारसी ज्ञाता थे, तथापि इनकी रचनाएँ रीतिकालीन कवियों की परंपरा मे पड़ती हैं। फिर भी इनमें प्रेमोल्लास का कुछ नवीन स्वर मिलता है। किंतु आलम की रचनाओं में भारतीय परंपरा का अच्छा पालन देखकर दूसरे विद्वान् कहानी की सचाई को विश्वसनीय समझते हैं। प्रेमोल्लास की व्यंजना इसमें निस्संदेह बहुत उच्चकोटी की है।
रसनिधि : दतिया के राजा पृथ्वीसिंह (मृथ्यु 1660 ई.) रसनिधि नाम से कविता लिखा करते थे। ये फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। इनकी रचनाओं में फ़ारसी प्रेम-व्यंजना का परिचय मिलता है। इनका हराजा नामक दोहाग्रंथ बिहारी सतसई के अनुकरण पर बना है। बिहारी के भावों को तो कहीं-कहीं ज्यों-का-त्यों उठा दिया गया है; जैसे,
कुहू निसा तिथिपत्र मे बाचन को रहि जाय।
तुव मुख ससि की चाँदनी उदय करत है आइ।
यह बिहारी के इस दोहे की विशुद्ध छाया है :
पत्रा ही तिथि पाइयत, वा घर के चहुँ पास।
निसि दिन पूनो ही रहत, आनन ओप उजास।
बोधा : इसी प्रकार पन्ना दरबार के कवि बोधा (बुद्धसेन) भी (जो तुलसीदासजी के स्थान राजापुर के निवासी बताए जाते हैं) फ़ारसी के बहुत अच्छे जानकार थे। घनानंद की भाँति इनके संबध में भी कहानी है कि ये दरबार की किसी वेश्या 'सुभान' पर आसक्त थे। किसी समय राजा के सामने ही अभिनयपूर्ण आचरण दिखाने के अपराध में इन्हें छः महीने के देश निकाले की सज़ा भुगतनी पड़ी। उसी समय इन्होंने विरहवारीश लिखा और छः महीने बाद लौटकर आए और कविता सुनाकर महाराज को प्रसन्न किया तो महाराज ने पूछा कि 'क्या माँगते हो'। उत्तर मिला, 'सुभान अल्लाह'। प्रसन्न होकर राजा ने सुभान को दे दिया। इनकी एक और रचना इश्क़नामा है। इनकी रचनाओं में रीति-कवियों से भिन्न एक प्रकार के स्वच्छद प्रेमभाव का उल्लास मिलता है :
कहिबे को बिथा सुनिबे को हँसी,
को दया सुनि कै उर आनतु है।
अरु पीर घटै तजि धीर सखी,
दुख को नहिं का पै बखानतु है।
कवि बोधा कहे मे सवाद कहा,
को हमारी कही पुनि मानतु है।
हमें पूरी लगी कै अधूरी लगी,
यह जीव हमारोइ जानतु है।
इनकी राधिकाजी के चरणो की प्रीति भी देखिए :
अनतैं नित काहू के होन न पाव
समान के लोग अजोगिया रे।
दुख तेरो कहा सुनिहै दुखिया
ह्वै रहे सब आप ही सोगिया रे।
करौ बारनैं तो पै बुधा बरही
पुरहूत के पूरन भोगिया रे।
बसु रे बसु राधे के पाँयन में
मन जोगिया प्रेम वियोगिया रे।
ठाकुर : ओरछा (बुंदेलखंड) के ठाकुर कवि (जन्म 1766 ई.) स्वछंद प्रेम-भावना के श्रेष्ठ कवि थे। जोधपुर और बिजावर के राज्यों में इनका बड़ा मान था। पद्माकर के आश्रयदाता गोसाईं हिम्मतबहादुर के यहाँ भी इनका बड़ा मान था। किंवदंतियो में पद्मावत के साथ इनके वाग्वैदग्ध्य की कहानियाँ प्रचलित हैं। इनकी रचनाओं का संग्रह लाला भगवानदीन ने ठाकुर ठसक नाम से प्रकाशित कराया था। इन रचनाओं में ऐकांतिक प्रेम का प्रवाह है। भाषा की स्वच्छता और भावों का अनोखापन इनकी रचना के मुख्य आकर्षक गुण है। फ़ारसी काव्यधारा से परिचय होने के कारण इनकी रचना में कभी-कभी अनुभयनिष्ठ ऐकांतिक प्रेम की व्यंजना भी मिलती है—
वा निरमोहिनी रूप की रासि
जऊ उर हेत न ठानति हवै है।
बारहि बार विलोकि घरी घरी
सूरति तो पहिचानति हवै है।
ठाकुर या मन को परतीति है
जो पै सनेह न माति ह्वै है।
आवत हैं नित मेरे लिये
इतनो तो विसेषि कै जानति ह्वै है।
इनकी रचना मे भाषा का स्वच्छ-सहज प्रभाव देखते ही बनता है। ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ आकर ब्रजभाषा अपने पूरे चढ़ाव पर आ गई है। पद्माकर तो कभी-कभी ताल-तुक के टोटके के चक्कर मे पड़ जाते हैं, पर ठाकुर ने जो मज़मून शुरू किया तो बस अंत तक स्वच्छ सहज प्रवाह की प्रसन्न धारा बह जाती है—
अब का समुझावती को समुझै
बदनामी को बीज तो वो चुकी री।
तब तो इतनो न विचार कर्यो
यहि जाल परे कहो को चुकी री।
कवि ठाकुर जो रस रीति रँगी
सब भाँति पतिव्रत खो चुकी री।
अरी नेकी बदी जो लिखी हति भाल में
होनी हती सो तो हो चुकी री।
*** *** ***
बरुनीन मे नेक झकैं उझकैं मनों
खजन मीन के जाले परे।
दिन औधि के कैसे गनौं सजनी
अँगुरीन के पोरन छाले परे।
कवि ठाकुर काहू सों का कहिये
निज प्रीति किये के कसाले परे।
जिन लालन चाह करी इतनी
तिन्हैं देखिबे के अब लाले परे।
*** *** ***
अपने अपने सुठि गेहन में
चढ़ दोऊ सनेह की नाव पै री।
अँगनान मे मींजत प्रेम भरे
समयौ लखि मैं बलि जाँव पै री।
कहै ठाकुर दोउन की रुचि सों
रँग हवै उमड़े दोउ ठाँव पै री।
सखी कारी घटा बरमै बरसाने पै
गोरी घटा नदगाँव पै री।
इस प्रकार भाषा की निर्बाध धारा बहती रहती है। परंतु ठाकुर नाम के दो और कवि हो गए हैं। दोनों असनी के ब्रह्मभट्ट बताए जाते हैं। संयोग से इन दोनों की कविता की भाषा में भी बड़ा सहज और सुंदर प्रवाह है। तीनों की रचनाएँ एक-दूसरे से ऐसी मिली हैं कि यह कह सकना कठिन ही है कि कौन-सी रचना किस कवि की है। ठाकुर ठसक नामक संग्रह में भी यह मिश्रण हुआ है, ऐसा माना जा सकता है। परंतु प्रसिद्धि बुंदेलखंडी ठाकुर की ही अधिक है।
इस प्रकार शृंगारी कवियों में रीतिमुक्त भावधारा के अनेक कवि हुए हैं। संग्रहों में और भी अनेक सुकवियो की रचनाएँ प्राप्त होती हैं। अठारहवीं शताब्दी में ब्रजभाषा की शृंगारी रचनाएँ अपने चरमबिंदु पर आ गई। आगे चलकर यह सरसता ह्यस की ओर जाने लगी। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में साहित्य की मूल प्रेरक शक्ति ही बदल गई। यद्यपि उन्नीसवीं शताब्दी तक काव्य में इस भाषा का ही एकच्छत्र राज्य था, पर उस समय उसकी शक्ति क्रमशः क्षीण ही होती गई।
- पुस्तक : हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास (पृष्ठ 182)
- रचनाकार : हजारीप्रसाद द्विवेदी
- प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
- संस्करण : 2021
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