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नीतिकाव्य

nitikavya

हजारीप्रसाद द्विवेदी

और अधिकहजारीप्रसाद द्विवेदी

     

    नीतिकाव्य : शृंगारी रचनाओं के समान ही इस काल में नीति-विषयक रचनाओं की अधिकता है। नीति-संबधी रचनाओं की परंपरा भी काफ़ी पुरानी है। भर्तृहरि ने एक ही साथ शृंगार, नीति और वैराग्य के तीन शतक लिखे थे। संस्कृत के सुभाषितों में अन्योक्तिच्छल से बहुत अधिक नीति-साहित्य का पता चलता है। नीति भारतीय कवियों का बहुत ही प्रिय विषय रही है। हिंदी में भी आरंभ से ही नीति-संबंधी कविताएँ प्राप्त होती हैं। हेमचंद्र के व्याकरण में संगृहीत अपभ्रंश के दोहों में से कितने ही नीति-विषयक हैं। तुलसीदास और रहीम के नीति-विषयक दोहों का परिचय हमें मिल चुका है। अकबर दरबार के राजा बीरबल और नरहरि महापात्र के नीति-विषयक पद प्रसिद्ध ही हैं। इस प्रकार नीति का साहित्य हिंदी में कभी अपरिचित नहीं रहा। सोलहवीं शताब्दी के अन्त्य भाग में जमाल नाम के एक मुसलमान कवि हुए हैं, जिनके नीति-विषयक दोहे राजपूताने में बहुत लोकप्रिय हैं। इनकी भाषा में भी राजस्थानी का प्रभाव है। इनकी रचनाओं मे नैतिक और व्यावहारिक उपदेश के साथ शृंगार की रसमय सूक्तियाँ भी मिल जाती हैं।

     

    वृंद और बैताल : अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में सुप्रसिद्ध नीतिकार कवि वृंद हुए जो कृष्णगढ़ के महाराज राजसिंह के गुरु थे। इनकी वृंद सतसई के दोहे उत्तर-मध्यकाल में बहुत सम्मान के साथ पढ़े-पढ़ाए जाते रहे हैं। वृंद सतसई संभवतः 1704 ई. में लिखी गई थी। खोज में इनकी दो और पुस्तकों का पता चला है—शृंगार-शिक्षा और भाव-पंचाशिका। किंतु इनकी प्रसिद्धि इनकी नीति-विषयक पुस्तक से ही है। इनके सम-सामयिक एक और नीति-कवि का उत्तर-मध्यकाल में बड़ा सम्मान रहा है। यह बैताल है। बैताल की रचनाओं में विक्रम को संबोधन किया गया है। कुछ लोगों का अनु‌मान है कि यह संबोधन पुराने विक्रामादित्य नामक राजा और उस बैताल की निजंधरी कथा को मन में रखकर किसी कवि ने लिखा है। बैताल उसका सचमुच का नाम नहीं था। दूसरे लोगों का कहना है कि ये बैताल नामक कवि ही हैं जो चरखारी के प्रसिद्ध रसिक विक्रमसाहि के दरबार में थे। जो हो, 'बैताल कहै विक्रम सुनो' वाली नीति-विषयक कविताएँ मध्ययुग में बहुत लोकप्रिय रही हैं, यह सत्य है।

     

    गिरिधर कविराय : वृंद और बैताल से भी अधिक लोकप्रिय नीतिकार गिरिधर कविराय हैं, जिनकी कुंडलिया छंद में लिखी कविता बहुत लोकप्रिय रही हैं। कुछ कुंडलिए 'साँई' शब्द से आरंभ होते हैं। कहते हैं ये गिरिधर कविराय की पत्नी के लिखे हैं गिरिधर कविराय उत्तर-मध्यकाल के सद्गृहस्थों के सलाहकार रहे हैं और आज भी जनता हैं। जो हो, उसी चाव से उनके उपदेशों को मानती है, जैसा अठारहवीं शताब्दी में मानती रही। वस्तुतः साधारण हिंदीभाषी जनता के सलाहकार प्रधानतः तीन ही रहे हैं—तुलसीदास, गिरिधर कविराय और घाघ-तुलसीदास धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में, गिरिधर कविराय व्यवहार के और नीति के क्षेत्र में, घाघ खेतीबारी के मामले में। दुर्भाग्यवश घाघ के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है। गिरिधर कविराय के बारे में भी नाममात्र की ही जानकारी है। साधारणतः अनुमान किया जाता है कि गिरिधर कविराय भी अठारहवीं शताब्दी के आरंभ के ही कवि रहे होंगे।

    नीति-विषयक साहित्य हिंदी में प्रचुर लिखा गया है। सबके रचयिताओं का ठीक-ठीक पता नहीं चलता। यह परंपरा उन्नीसवीं शताब्दी तक निर्बाध चलती रही है। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ के ही सम्मन, दीनदयाल गिरि आदि नीतिकवि प्रसिद्ध हैं। दीनदयाल गिरि तो बहुत मेधावी कवि थे। उनकी प्रसिद्धि अन्योक्ति-कल्पद्रुम के कारण है, लेकिन उनकी अन्य रचनाएँ भी कम नहीं हैं। अनुरागबाग, वैराग्यदिनेश, विश्वनाथनवरत्न और दृष्टांत तरंगिणी उनकी पुस्तकों के नाम हैं।

     

    प्रबंध : काव्य पुहकर : प्रबंध-काव्यों की परंपरा भी इस काल में यथापूर्व चलती रही। पौराणिक कथाएँ तो बराबर ही लिखी जाती रहीं, कल्पित प्रेमकथानकों का सिलसिला भी जारी रहा। सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में ही परतापपुर (मैनपुरी) के पुहकर कवि ने रसरतन (1616 ई.) नामक प्रेम-कथानक काव्य लिखा था, जिसमें रंभावती और सुरसेन की प्रेमकथा दी हुई है। फिर मेवाड़ के लालचंद्र या लक्षोदय नामक कवि ने पचिनीचरित्र लिखा था। यह हम पहले ही लक्ष्य कर चुके हैं कि काशीराम की कनकमंजरी भी इसी काल की प्रेमकथा है। इस प्रकार सत्रहवीं शताब्दी में प्रेम-कथानकों की परंपरा चलती रही। बाद में भी प्रबंध-काव्य की धारा जारी रही।

     

    लाल कवि : समसामयिक राजा की कीर्त्तिकथा को आश्रय करके लिखे जानेवाले काव्यों में लाल कवि (गोरेलाल) के नाम का छत्र प्रकाश विशेष रूप से उल्लेख योग्य है। पुराने ऐतिहासिक काव्यों की भाँति यह तथ्य और कल्पना का बेमेल गड्डमड्ड नहीं है। लाल कवि ने महाराज छत्रछाल का पूरा जीवन दिया है। इसमें ऐतिहासिक घटनाओं की ब्यौरा ठीक है और प्रबंध-काव्य के सुकुमार स्थलों को पहचानने की क्षमता भी है। इनका एक और ग्रंथ 'विष्णुविलास' बताया जाता है बरवै छंद में नायिकाभेद पर है। 

     

    जोधराज : इसी प्रकार अलवर के नींवगढ़ के जोधराज ने भी महाराणा हम्मीर के चरित को आश्रय करके एक वीर-काव्य लिखा था। इसका रचनाकाल 1818 ई. है। इस काव्य में भी ऐतिहासिकता का निर्वाह किया गया है। भाषा चारणों की वीररस की शैली की है, जिसमें प्राचीनता ले आने का बराबर प्रयास किया जाता है।

     

    सूदन : मथुरा के माथुर चौबे सूदन कवि ने भी भरतपुर के प्रसिद्ध वीर सुजानसिंह (सूरजमल) के चरित को आश्रय करके 'सुजानचरित' नामक काव्य लिखा। सुजानसिंह सचमुच ही वीर थे और उनके चरित को आश्रय करके काव्य लिखनेवाले सूदन में भी वीरचरित का सम्मान करने की शक्ति थी। अनुमानतः इनका कविता-काल अठारहवीं शताब्दी का अन्त्य भाग है। चंद्र के, पृथ्वीराजरासो में जिस प्रकार घोड़ों और अस्त्रों आदि की उबा देनेवाली सूची मिलती है, उसी प्रकार सूदन के सुजानचरित में भी है। काव्य-रूढ़ियों का इसमें जम के सहारा लिया गया है, यद्यपि कथानक रूढ़ियों की वैसी भरमार नहीं है, जैसी रासो में है। शब्दों को तोड़-मरोड़कर युद्ध के अनुकूल ध्वनिप्रसू वातावरण उत्पन्न करने में सूदन बहुत दक्ष हैं, पर उससे भाषा के प्रति न्याय नहीं हो सका है।

     

    गोकुलनाथ, गोपीनाथ और मणिदेव : अठारहवीं शताब्दी के अन्त्य भाग में काशी के महाराजा उदितनारायणसिंह की आज्ञा से तीन कवियों (गोकुलनाथ, गोपीनाथ और मणिदेव) ने समग्र महाभारत (हरिवंश सहित) का भाषांतर बड़ी ललित भाषा में किया। ग्रंथ की समाप्ति में प्रायः पचास वर्ष लग गए। यह काव्य साहित्य-दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके पूर्व ही सबलसिंह चौहान (1740 ई.) ने एक महाभारत-कथा लिखी थी जो लोकप्रिय रचना हुई, परंतु उसमें न तो महाभारत की कथा का पूरा आकलन है, न वह क्रमबद्ध ही है, और साहित्यिकता तो उसमें नाममात्र को ही है। भाषा की सरलता और उपस्थापन की सहज भंगिमा के कारण वह पुस्तक अधिक लोकप्रिय बन गई, पर काशी के तीन कवियों का महाभारत लोकप्रिय न होने पर भी उत्तम रचना है।

     

    महाराज विश्वनाथसिंह : इस काल में कई प्रतिभासंपन्न कवियों ने साहित्य के विभिन्न अंगों पर ग्रंथ लिखे। रीवाँ के महाराज विश्वनाथसिंहजू (राज्यकाल 1813-54 ई.) की चर्चा कबीरपंथी साहित्य के प्रसंग में हो चुकी है। परंतु यद्यपि बीजक की टीका मे इनके प्रगाढ़ पांडित्य और विद्याव्यसन का बड़ा उत्तम परिचय मिलता है तथापि वह ग्रंथ इनकी प्रतिभा के केवल एक ही अंश का परिचायक है। इनकी लिखी पुस्तकें अनेक हैं। कुछ के नाम इस प्रकार हैं—अष्टयाम आह्निक, आनंदरघुनंदन, (नाटक) उत्तम काव्य प्रकाश, गीता रघुनंदन शतिका, बीजक की टीका, विनयपत्रिका की टीका, वेदांत पंचक शतिका, उत्तम नीति चंद्रिका, परमतत्त्व, संगीत रघुनंदन, भजन शातिशतक आदि। ये सगुण राम के उपासक थे, परंतु कुल-परंपरा से 'कबीर के शिष्य धर्मदास की गद्दी का भी सम्मान करते थे। बीजक की टीका में इन्होंने सिद्ध किया है कि कबीरदास के प्रतिपाद्य राम वस्तुतः साकेतवासी द्विभुज राम हैं, जो निर्गुण-सगुण से अतीत हैं। कबीरपंथी लोग इस टीका को कबीर-सम्मत नहीं मानते, परंतु इसमें इनका पांडित्य तो प्रकट हुआ ही है। इनका आनंदरघुनंदन बहुत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इसे हिंदी का प्रथम नाटक माना है। इनके पुत्र रघुराजसिंह भी बहुत उच्चकोटि के कवि और साहित्यप्रेमी थे। इन दोनों पिता-पुत्रों ने अनेक कवियों को आश्रय और मान दिया था।

     

    अन्य कवि : भक्तवर नागरीदास की चर्चा हम अन्यत्र कर चुके हैं। ये बड़े ही विद्याव्यसनी राजा थे। एक और गुणग्राही रईस असोधर (फतेहपुर) के राजा भगवंतराय खींची (अठारहवीं शती का मध्यभाग) थे जो स्वयं कवि तो थे ही, अनेक कवियों के आश्रयदाता भी थे। इनकी एक पुस्तक हनुमत पचीसी प्राप्त हुई है।

    चरखारी के राजा विक्रमसाहि भी अच्छे विद्यानुरागी और आश्रयदाता थे। बैताल के आश्रयदाता यही बताए जाते हैं। इनके यहाँ मान कवि नामक बंदीजन थे जो बहुत अच्छे कवि थे। इनकी लिखी कई पुस्तकें प्राप्त हुई हैं जिनमें कोश, ज्योतिष आदि अनेक विषयों की रचनाएँ हैं। मान कवि की लिखी पुस्तकों के नाम हैं अमरप्रकाश, अष्टयाम, लक्ष्मणशतक, हनुमान नखशिख, हनुमान पंचक, हनुमान अष्टक, हनुमान पचीसी, नीति विधान, समरसार, नृसिंह पचीसी।

    झाँसी के नवलसिंह भी अच्छे कवि थे। ये उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यभाग में वर्त्तमान थे, समथर के राजा हिंदूपति के आश्रित थे। खोज में इनकी छोटी-मोटी अनेक रचनाएँ प्राप्त हुई हैं।

     

    क्षीयमाण दीप्ति की कविता : खोज में अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी के अनेक कवियों की कविता-पुस्तकें उपलब्ध हुई हैं। सबका उल्लेख आवश्यक नहीं है। इस काल तक आते-आते हिंदी कविता का वह तेज़ क्षीण हो आया था, जो पंद्रहवीं शताब्दी के भक्त कवियों में दिखाई पड़ा था। जीवन के सामने कोई और नया आदर्श नहीं रह गया था। कविता प्रायः पिटे-पिटाए रास्ते से चल रही थी। सब ओर से अपने को समेटकर बँधे मार्ग पर चलते रहने की प्रवृत्ति ने ब्रज-भाषा कविता को माधुर्य और सौकुमार्य तो दिया, परंतु तेज़ और तारुण्यदीप्ति उसमे नहीं रह गई। अठारहवीं शताब्दी के बाद की कविता में माधुर्य और सौकुमार्य भी क्रमशः क्षीण होने लगा।

    [इस काल के अध्ययन में महायक पुस्तकें (1) पं. रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य का इतिहास, (2) मिश्रबधु हिंदी नवरत्न, मिश्रबधु विनोद, (3) डॉ. भागीरथ मिश्र हिंदी काव्यशास्त्र का इतिहास, (4) डॉ. नगेद्र रीतिकालीन हिंदी साहित्य और देव: (5) पं. पद्मसिंह शर्मा बिहारी मतमई का मजीवन भाष्यः (6) पं. रामनरेश त्रिपाठी कविता कौमुठी (प्रथम भाग), बिहारी नतसई, मनिराम प्रथावली, काव्य रसायन आदि की प्रस्तावनाएँ।]

    स्रोत :
    • पुस्तक : हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास (पृष्ठ 180)
    • रचनाकार : हजारीप्रसाद द्विवेदी
    • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
    • संस्करण : 2021

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