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इकाई—1 भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा

ikai—1 bharatiy kavyashastr ki parampara

हिन्दवी डेस्क

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इकाई—1 भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा

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    संस्कृत के काव्यशास्त्रीय उपलब्ध ग्रंथों के आधार पर भरतमुनि को काव्यशास्त्र का प्रथम आचार्य माना जाता है। समय लगभग 400 ईसापूर्व से 100 ईसापूर्व के मध्य समय माना जाता है।

    इस परंपरा के अंतिम आचार्य पंडितराज जगन्नाथ है इनका समय 17 वीं शती है। इस प्रकार लगभग डेढ़-दो सहस्त्र वर्षों का यह काव्यशास्त्रीय साहित्य अपनी व्यापक विषय-सामग्री अपूर्व एवं तर्क सम्मत विवेचन पद्धति और गंभीर शैली के कारण नूतन मान्यताओं को प्रस्तुत करने के बल पर भारतीय वाङ्मय में अपना विशिष्ट स्थान रखता है।

     

    काव्यशास्त्रीय आचार्यों का संक्षिप्त परिचय

     

    (1) भरत मुनि

     

    भरतमुनि की प्रसिद्धि नाट्यशास्त्र ग्रंथ के रचयिता के रूप में है, उनके जीवन और व्यक्तित्व के विषय में इतिहास अभी तक मौन है। इस संबंध में विद्वानों का एक मत यह भी है कि भरत वस्तुतः एक काल्पनिक मुनि का नाम है। संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों के उल्लेख अनुसार रंगमंच के अभिनेता को भरत कहा जाता था। नाट्यविधान के जो तत्व समय-समय पर निर्मित होते चले गए उनका संग्रह भरत के नाम पर कर दिया गया। इस ग्रंथ का संग्रह काल दूसरी शती ई० पू० और तीसरी शती ई० के बीच माना जाता है।

     

    नाट्यशास्त्र नाट्यविधान का एक अमर विश्वकोश है। नाटक की उत्पत्ति, नाट्यशाला, विभिन्न प्रकार के अभिनय, नाटकीय संधियाँ, संगीत शास्त्रीय सिद्धांत आदि इसके प्रमुख विषय है। इनके अतिरिक्त 6 वें, 7 वें और 17 वें अध्याय में काव्यशास्त्रीय अंगों—रस, गुण, दोष, अलंकार तथा छंद का भी निरूपण हुआ है। नाटक नायिका भेद का भी इस ग्रंथ में निरूपण है।

     

    (2) भामह

     

    भामह कश्मीर-निवासी कहे जाते हैं। इनका जीवन काल छ्ठी शती ई. का मध्यकाल माना गया है। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ काव्यालंकार है। इस ग्रंथ में 6 परिच्छेद है और कुल 400 श्लोक। इसमें इस विषयों का निरूपण किया गया है—काव्य शरीर, अलंकार, दोष, न्याय-निर्णय और शब्दशुद्धि। भामह अलंकारवाद के समर्थक थे। इन्होंने 'वक्रोक्ति' को सब अलंकारों का मूल माना है। काव्य का लक्षण सर्वप्रथम इन्होंने प्रस्तुत किया है। दस के स्थान पर तीन काव्य गुणों की स्वीकृति भी इन्होंने सर्वप्रथम की है, इनके ग्रंथ की महत्व का प्रमाण इससे भी ज्ञात होता है कि उद्धट जैसे आचार्य ने भामह विवरण नाम से इनके ग्रंथ पर भाष्य लिखा था। आज यदि यह भाष्य उपलब्ध होता तो उससे भामह सम्मत सिद्धांतों के स्पष्टीकरण में पर्याप्त सहायता मिलती।

     

    (3) दंडी

     

    दंडी का समय सातवीं शती का उत्तरार्द्ध माना गया है। इनके तीन ग्रंथ उपलब्ध हैं—काव्यादर्श, दशकुमारचरित और अवंतिसुंदरीकथा। प्रथम ग्रंथ काव्यशास्त्र विषयक है, और शेष दो गद्य-काव्य हैं। काव्यादर्श में तीन परिच्छेद हैं और श्लोकों की कुल संख्या 660 है। प्रथम परिच्छेद में काव्य—लक्षण, काव्य—भेद, रीति और गण का निरूपण है और द्वितीय परिच्छेद में अलंकारों का। तृतीय परिच्छेद में यमक, चित्र-बंध और प्रहेलिका के अतिरिक्त दोषों का भी निरूपण किया गया है। दंडी अलंकारवाद के समर्थक थे। काव्य के विभिन्न अंगों को अलंकार में ही अंतर्निहित समझना इनका मान्य सिद्धांत था—यहाँ तक कि रस, भाव आदि को भी इन्होंने रसवत्, प्रेयस्वत् आदि अलंकार माना है। काव्यादर्श अत्यंत लोकप्रिय ग्रंथ रहा है। कहा जाता है कि सिंहली और कन्नड़ भाषाओं के काव्यशास्त्रीय ग्रंथों, क्रमशः 'सिय-बस-लकर' और 'कविराजमार्ग', पर काव्यादर्श का स्पष्ट प्रभाव है। संस्कृत में इस ग्रंथ पर अनेक रोकाएँ रची गईं।

     

    (4) उद्धट

     

    उद्भट कश्मीरी राजा जयापीड़ के सभा—पंडित थे। इनका समय नवीं शती का पूर्वाद्ध है। इनके तीन ग्रंथ प्रसिद्ध हैं—काव्यालंकारसारसंग्रह, भामहविवरण और कुमारसंभव। इनमें से केवल प्रथम ग्रंथ उपलब्ध है, जिसके 6 वर्गों में अलंकारों के लक्षण—उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं। अलंकारों के स्वरूप निर्देश में प्रायः भामह का आश्रय लिया गया है। कुछ अलंकारों के उदाहरण स्वरचित कुमारसंभव काव्य से भी लिए गए हैं। उद्भट अलंकारवादी आचार्य थे।

     

    (5) वामन

     

    उद्धट के समान वामन भी कश्मीरी राजा जयापीड़ के सभा पंडित थे। इनका समय 800 ई. के आसपास है। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ काव्यालंकारसूत्रवृत्ति है। काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में यह पहला सूत्र बद्ध ग्रंथ है। सूत्रों की वृत्ति भी स्वयं वामन ने लिखी है। ग्रंथ में 5 अधिकरण हैं। प्रत्येक अधिकरण में कुछ अध्याय हैं, और हर अध्याय में कुछ सूत्र। ग्रंथ के पाँचों अधिकरणों में अध्यायों की संख्या 12 है, और सूत्रों की संख्या 319।

     

    (6) रुद्रट

     

    रुद्रट नाम से कश्मीरी आचार्य मालूम पड़ते हैं। इनका जीवन काल नवीं शती का आरंभ माना जाता है। इनके ग्रंथ का नाम काव्यालंकार है, जिसमें 16 अध्याय हैं और कुल 734 पद्य। 16 अध्यायों में से 8 अध्यायों में अलंकारों को स्थान मिला है, और शेष अध्यायों में काव्यस्वरूप, काव्यभेद, रीति, दोष, रस और नायक-नायिका—भेद का निरूपण है। यद्यपि रुद्रट अलंकारवादी युग के आचार्य हैं, किंतु भरत के बाद रस का व्यवस्थित और स्वतंत्र निरूपण इनके ग्रंथ में उपलब्ध है। नायक-नायिका-भेद, विशेषतः नायिका के प्रसिद्ध तीन भेद स्वकीया, परकीया और सामान्या का उल्लेख हमें यहाँ सर्वप्रथम मिला है।

     

    (7) आनंदवर्धन

     

    आनंदवर्धन कश्मीर के राजा अवंतिवर्मा के सभा पंडित थे। इनका जीवन-काल नवी शती का मध्य भाग है। इनका ख्याति ध्वन्यालोक नामक अमर ग्रंथ के कारण है। ग्रंथ के दो प्रमुख भाग है—कारिका और वृत्ति यद्यपि इस विषय में विद्वानों का मतभेद है कि इन दोनों भागों का कर्ता एक व्यक्ति है या दो हैं, पर अधिकतर विद्वान् आनंदवर्धन को ही दोनों भागों का कर्ता मानते हैं।

     

    (8) अभिनवगुप्त

     

    अभिनवगुप्त दसवीं शती के अंत और ग्यारहवीं शती के आरंभ में विद्यमान थे। इनका काव्यशास्त्र के साथ-साथ दर्शनशास्त्र पर भी समान अधिकार था। यही कारण था कि काव्यशास्त्रीय विवेचन को आप अत्यंत उच्च स्तर पर ले गए। ध्वन्यालोक पर 'ध्वन्यालोकलोचन' और नाट्यशास्त्र पर 'अभिनवभारती' नामक टीकाएँ इसका प्रमाण हैं।

     

    (9) राजशेखर

     

    राजशेखर विदर्भ (बरार) के निवासी थे और कन्नौज के प्रतिहारवंशी महेंद्रपाल और महीपाल के राजगुरु थे। इनका जीवन-काल दसवीं शती का प्रथमार्द्ध माना गया है। काव्यशास्त्र से संबद्ध काव्यमीमांसा नामक इनका एक ग्रंथ प्रसिद्ध है, जो 18 भागों (अधिकरणों) में विभक्त है, पर अभी तक इसका 'कविरहस्य' नामक एक ही भाग प्राप्त हो सका है, जिसे सर्वप्रथम गायकवाड़ ओरंटियल सीरीज, बड़ौदा ने, और फिर बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् ने हिंदी-अनुवाद-सहित प्रकाशित कराया।

     

    (10) कुंतक

     

    कुंतक का समय दसवी शती का अंत तथा ग्यारहवीं शती का आरंभ माना जाता है। इनके प्रसिद्ध ग्रंथ 'वक्रोक्तिजीवितम्' में चार उन्मेष हैं। प्रथम उन्मेष में काव्य का प्रयोजन तथा वक्रोक्ति का स्वरूप और उसके छह भेद निर्दिष्ट किए गए हैं। द्वितीय उन्मेष में वक्रोक्ति के प्रथम तीन भेदों-वर्ण-विन्यासवक्रता, पदपूर्वार्धवक्रता तथा पदपरार्ध-वक्रता का, और तृतीय उन्मेष में वाक्यवक्रता का विस्तृत निरूपण है। अंतिम उन्मेष में वक्रोक्ति के शेष दो भेदों—प्रकरणवक्रता और प्रबंधवक्रता का विवरण है। कुंतक प्रतिभासंपन्न आचार्य थे। इन्होंने वक्रोक्ति के उक्त छह भेदों में काव्य के सभी अंगों को अंतर्भूत करते हुए वक्रोक्ति को काव्य का 'जीवित' माना।

     

    (11) क्षेमेंद्र

     

    क्षेमेंद्र कश्मीर निवासी थे। वे 11वीं शती के उत्तराद्ध में विद्यमान थे। इन के तीन ग्रंथ प्रसिद्ध हैं—औचित्यविचारचर्चा, सुवृत्ततिलक और कविकंठाभरण। प्रथम ग्रंथ में औचित्य को लक्ष्य में रखकर इन्होंने वाणी के विभिन्न अंगों—वाक्य, गुण, रस, क्रिया, करण, लिंग, उपसर्ग, देश, स्वभाव आदि का स्वरूप निर्धारित किया है। द्वितीय ग्रंथ में छंद के औचित्य का निर्देश है। तीसरा ग्रंथ कवि-शिक्षा से संबद्ध है। इस ग्रंथ में 5 संधियाँ (परिच्छेद) हैं। इनमें क्रमशः कवित्व-प्राप्ति के उपाय, कवियों के भेद, काव्य के गुण तथा दोष का विवेचन है।

     

    (12) भोजराज

     

    भोजराज धारा के नरेश थे। उनका जीवन काल 11वीं शती का प्रथमर्द्ध है। भोज कवियों के आश्रयदाता होने के अतिरिक्त स्वयं भी प्रगाढ़ आलोचक एवं काव्यशास्त्री थे। काव्यशास्त्र से संबद्ध इनके दो ग्रंथ उपलब्ध हैं—सरस्वतीकंठाभरण और शृंगारप्रकाश ये दोनों विशालकाय हैं। प्रथम ग्रंथ में पाँच परिच्छेद हैं। इनमें दोष, गुण, अलंकार और रस का विशद और संग्रहात्मक विवेचन है।

     

    (13) मम्मट

     

    मम्मट कश्मीर के निवासी माने जाते हैं। इनका जीवनकाल 11वीं शती का उत्तराद्ध है। इनकी प्रख्याति 'काव्यप्रकाश' के कारण है। आचार्य मम्मट कश्मीर के एक पंडित परिवार में पैदा हुए थे। वे जैयट के पुत्र थे जिन्होंने ब्राह्मण काशीका के साथ व्याकरण ग्रंथ का संयुक्त लेखन किया था। और कैयट के भाई थे। उवट वेदों पर भाष्य करने वाले पंडित थे, बाद में उनके इस काम को इनके द्वारा अधिग्रहित किया गया, सयाण और माधव ने इसे आगे बढ़ाया था। आचार्य मम्मट ने अध्ययन के उद्देश्य के लिए बनारस की यात्रा की। आचार्य मम्मट के समय कश्मीर में साहित्य का अत्यधिक प्रचार प्रसार होने लगा था। जिससे बौद्ध साहित्य प्रेरित हुआ और फिर भारत के बाहर हिमालय में बौद्ध साहित्य के वर्तमान घर तिब्बत में इसका उत्थान हुआ और वो शीर्ष पर पहुँचा। इनके बाद ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में साहित्य कश्मीर से मिथिला तक और फिर बंगाल तक फैला; वर्तमान में यह दक्षिण भारत में सिमट गया है। आचार्य मम्मट संस्कृत काव्यशास्त्र के सर्वश्रेष्ठ विद्वानों में से एक समझे जाते हैं। वे अपने शास्त्रग्रंथ काव्यप्रकाश के कारण प्रसिद्ध हुए। कश्मीरी पंडितों की परंपरागत प्रसिद्धि के अनुसार वे नैषधीयचरित के रचयिता श्रीहर्ष के मामा थे। उन दिनों कश्मीर विद्या और साहित्य के केंद्र था तथा सभी प्रमुख आचार्यों की शिक्षा एवं विकास इसी स्थान पर हुआ। वे कश्मीरी थे, ऐसा उनके नाम से भी पता चलता है लेकिन इसके अतिरिक्त उनके विषय में बहुत कम जानकारी मिलती है। वे भोजराज के उत्तरवर्ती माने जाते है, इस हिसाब से उनका काल दसवीं शती का लगभग उत्तरार्ध है। ऐसा विवरण भी मिलता है कि उनकी शिक्षा-दीक्षा वाराणसी में हुई।

     

    (14) विश्वनाथ

     

    विश्वनाथ कदाचित् उड़ीसा के निवासी थे। इनका समय 14वीं शती का पूर्वाद्ध है। इनकी ख्याति 'साहित्यदर्पण' नामक ग्रंथ के कारण हुई है। विश्वनाथ ने मम्मट, आनंदवर्धन, कुंतक, भोजराज आदि के काव्य-लक्षणों का खंडन प्रस्तुत करने के बाद रस को काव्य की आत्मा घोषित करते हुए काव्य का लक्षण निर्धारित किया है। इन्होंने मम्मट के काव्यलक्षण का घोर खंडन किया है, किंतु फिर भी अपने ग्रंथ की अधिकांश सामग्री के लिए ये मम्मट के ही ऋणी हैं। आश्चर्य तो यह है कि रस को काव्य की आत्मा मानते हुए भी इन्होंने आनंदवर्धन तथा मम्मट के समान रस को ध्वनि के एक भेद 'असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य' ध्वनि का अपर नाम माना है।

     

    (15) जगन्नाथ

     

    जगन्नाथ का यौवनकाल दिल्ली के प्रसिद्ध शासक शाहजहाँ के दरबार में बीता था। शाहजहाँ ने इन्हें 'पंडितराज' की उपाधि से विभूषित किया था। अतः इनका समय 17वीं शती का मध्यभाग है। इनकी प्रसिद्ध रचना 'रसगंगाधर' है, जो अपूर्ण है। जगन्नाथ का काव्यलक्षण अधिकांशतः परिपूर्ण तथा सुबोध है। इन्होंने काव्य के चार भेद माने है—उत्तमोत्तम, उत्तम, मध्यम तथा अधम। ये ध्वनिवादी आचार्य थे, फिर भी रस के प्रति इन्होंने अधिक समादर प्रकट किया है। भरत-सूत्र पर उपलब्ध ग्यारह व्याख्याएँ इसी ग्रंथ में संकलित हैं। ये अन्यत्र भी प्राप्त हो सकती हैं। यह प्रथम आचार्य हैं जिन्होंने गुण को रस के अतिरिक्त शब्द, अर्थ और रचना का भी धर्म समान रूप से स्वीकार किया है, न कि गौण रूप से। जगन्नाथ की समर्थ भाषा-शैली, सिद्धांत-प्रतिपादन की अद्भुत एवं परिपक्व विचार-शक्ति और खंडन करने की विलक्षण प्रतिभा के कारण इन्हें प्रौढ़ एवं सिद्धहस्त आचार्य माना जाता है।

     

    प्रमुख संप्रदायों का संक्षिप्त परिचय (रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य)

     

    भारतीय काव्यशास्त्र के कुछ संप्रदाय

     

    यह तो आप अब तक जान ही चुके हैं कि संस्कृत में 'काव्य' का क्या तात्पर्य होता है और 'साहित्य' के व्यापक अर्थ में इसका प्रयोग हुआ है। यह भी आप जानते हैं कि भारतीय काव्यशास्त्र के छह प्रमुख संप्रदाय हैं। भारतीय काव्यशास्त्र में काव्य के दस अंगों रस, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, औचित्य, कवि समय, नायक-नायिका भेद, काव्य रूढ़ि और छंदोविवेचन का लक्षण उदाहरण सहित चर्चित होता आया है। इसी को 'काव्यांग विवेचन' कहते हैं। भारतीय काव्यशास्त्रियों ने तो यहाँ तक कह दिया था कि एक काव्य-पुरुष होता है। इस काव्य पुरुष के बारे में पहले तो कश्मीर निवासी राजशेखर ने बताया और फिर आचार्य विश्वनाथ ने लिखा, काव्य रूपी पुरुष के शरीर रूप में शब्दार्थ है, रसादि आत्मा है, शौर्य आदि गुण हैं, काणत्वादि दोष हैं, रीति आदि अवयव हैं, और कटक कुंडल के समान सौंदर्य प्रसारक आभूषण अलंकार हैं। अर्थात काव्य का एक पुरुष के शरीर आत्मा, वस्त्र, अंग, आभूषण से युक्त पुरुष के समान बताया गया है। इनमें से कुछ प्रमुख अंगों की सैद्धांतिक चर्चा करके भारतीय आचार्यों ने कुछ संप्रदायों की स्थापना की। चूँकि सबसे पहले सिद्धांत शास्त्री भरत मुनि हैं तो क्यों न आप उनके द्वारा प्रतिपादित रस संप्रदाय से शुरू करें?

     

    (1) रस संप्रदाय

     

    रस का शाब्दिक अर्थ है आनंद। विभिन्न संदर्भों में रस का अर्थ अलग-अलग होता है। काव्य में जो आनंद आता है, वह ही काव्य का रस है। काव्य से मिलने वाला आनंद अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रस काव्य की आत्मा है। संस्कृत में कहा गया है कि वाक्यम् रसात्मकम् काव्यम् अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है। साहित्य में काव्यास्वादन से प्राप्त होने वाले आनंद को रस कहते हैं।

     

    रस सिद्धांत के आदि प्रवर्तक आचार्य भरत मुनि माने जाते हैं। उनसे लेकर डॉ. नगेंद्र तक अनेक आचार्यों ने इसका पल्लवन किया है।

    नाट्यशास्त्र में भरत मुनि ने रस की व्याख्या करते हुए कहा है—

    विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्ररस निष्पत्तिः।

     

    अर्थात विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'साहित्य दर्पण' में कहा गया है कि हृदय का स्थायी भाव, जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव का संयोग प्राप्त कर लेता है तो रस रूप में निष्पन्न हो जाता है।

     

    रस के चार अंग हैं : स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव।

     

    (क) स्थायी भाव : भाव का अर्थ है  होना। सहृदय के अंतःकरण में जो मनोविकार, वासना या संस्कार रूप में सदा विद्यमान रहते हैं तथा जिन्हें कोई भी विरोधी या अविरोधी दवा नहीं सकता हूँ, उन्हें स्थायी भाव कहते हैं। इनकी संख्या 11 है : रति, हास, शोक, उत्साह, क्रोध, भय, जुगुप्सा, विस्मय, निर्वेद, वात्सलता और ईश्वर विषयक प्रेम

     

    (ख) विभाव : विभाव का अर्थ है कारण। स्थायी भाव के उत्पन्न होने के कारणों को विभाव कहते हैं। ये स्थायी भावों का विभावन/उद्बोधन करते हैं, उन्हें आस्वाद योग्य बनाते हैं। ये रस की उत्पत्ति में आधारभूत माने जाते हैं। विभाव के दो भेद हैं : आलंबन विभाव और उद्दीपन विभाव। 

     

    (ग) अनुभाव : रति, हास, शोक आदि स्थायी भावों को प्रकाशित या व्यक्त करने वाली आश्रय की चेष्टाएँ अनुभाव कहलाती हैं। ये चेष्टाएँ भाव-जागृति के उपरांत आश्रय में उत्पन्न होती हैं इसलिए इन्हें अनुभाव कहते हैं, अर्थात जो भावों का अनुगमन करे वह अनुभाव कहलाता है। अनुभाव के दो भेद हैं : इच्छित और अनिच्छित।

     

    (घ) संचारी या व्यभिचारी भाव : जो भाव केवल थोड़ी देर के लिए स्थायी भाव को पुष्ट करने के निमित्त सहायक रूप में आते हैं और तुरंत लुप्त हो जाते हैं, वे संचारी भाव हैं।

     

    संचारी शब्द का अर्थ है, साथ-साथ चलना अर्थात संचरणशील होना, संचारी भाव स्थायी भाव के साथ संचरित होते हैं, इनमें इतना सार्मथ्य होता है कि ये प्रत्येक स्थायी भाव के साथ उसके अनुकूल बनकर चल सकते हैं। इसलिए इन्हें व्यभिचारी भाव भी कहा जाता है। संचारी या व्यभिचारी भावों की संख्या 33 मानी गयी है : निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, मद, श्रम, आलस्य, दीनता, चिंता, मोह, स्मृति, धृति, ब्रीड़ा, चापल्य, हर्ष, आवेग, जड़ता, गर्व, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार (मिर्गी), स्वप्न, प्रबोध, अमर्ष (असहनशीलता), अवहित्था (भाव का छिपाना), उग्रता, मति, व्याधि, उन्माद, मरण, त्रास और वितर्क।

     

    आचार्य भरत मुनि ने सूत्र रूप से यह कहा था कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस-निष्पत्ति होती है। इस आधार को लेकर बहुत से विद्वानों ने बाद में लंबी चौड़ी व्याख्याएँ कीं। अभिनव गुप्त की व्याख्या के आधार पर 'काव्यप्रकाश' पुस्तक के लेखक मम्मट ने कहा है कि काव्य पढ़ने, सुनने या अभिनय देखने पर विभाव आदि के संयोग से निष्पन्न होने वाली आनंदात्मक चित्त वृत्ति ही रस है।

     

    भरत मुनि की इस परिभाषा को आगे के प्रमुख आचार्यों ने अपनी तरह से पेश किया। इससे आचार्य भट्ट लोलट्ट का 'उत्पत्तिवाद', आचार्य शंकुक का 'अनुमतिवाद', भट्ट नायक का 'भुक्तिवाद' और अभिनव गुप्त का 'अभिव्यक्तिवाद' आदि 'वाद' चर्चा में आए। आनंदवर्धन, महिम भट्ट, राजशेखर, पंडित राज जगन्नाथ, कुंतक, भोजराज, रूय्यक, जयदेव आदि सभी ने रस के महत्व को स्वीकार किया है।

     

    (2) अलंकार संप्रदाय 

     

    जैसे आभूषण या जेवरात शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही अलंकार का कार्य काव्य की शोभा बढ़ाना है। भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा में रस के बाद दूसरा महत्त्वपूर्ण संप्रदाय 'अलंकार-संप्रदाय' है। अलंकार का सामान्य अर्थ है 'आभूषण; किंतु काव्य के क्षेत्र में इसका विशेष रूढ़ि अर्थ है। 'अलंकरोतीति अलंकार' (जो काव्य को अलंकृत करे, वही अलंकार है।) डॉ. हरदेव बाहरी के शब्दों में रचनागत विशिष्ट शब्द योजना या अर्थ चमत्कार को अलंकार कहा जाता है। प्रारंभिक काव्यशास्त्रीय चिंतन में अलंकार रमणीयता और काव्यात्मक चमत्कार के रूप में देखे गए। अपने संकीर्ण अर्थ में अलंकार उपमादि अलंकारों का वाचक है। अलंकार काव्य के भाव पक्ष और अभिव्यक्ति पक्ष को सुंदर बनाने के साधन हैं।

     

    आप यह तो समझ ही चुके हैं कि संस्कृत के आचार्यों ने कविता के प्राण तत्व का विचार जब किया तब उन्होंने यह पाया कि शब्द, अर्थ या शब्दार्थ ही काव्य का प्राण तत्व है। आचार्य भामह ने कहा कि शब्द और अर्थ का सहित भाव ही काव्य है (शब्दार्थो सहित काव्यम)। अलंकार संप्रदाय के प्रवर्तक यही भामह हैं। आचार्य भामह ने यह माना कि काव्य यदि सौंदर्य युक्त है तो स्वाभाविक रूप से रस युक्त होगा। अलंकारवादी आचार्यों ने अलंकार को रस का पोषक माना। वे यह भी मानते हैं कि काव्य की सुंदरता को जो भी बढ़ाता है वह चाहे रस हो या रीति, गुण या ध्वनि सब अलंकार हैं। ये आचार्य अलंकार को काव्य का आधारभूत धर्म मानते हैं। यूँ तो भरत मुनि ने चार अलंकारों (उपमा, रुपक, दीपक, और यमक) की चर्चा की थी, पर छठी शताब्दी में पैदा हुए भामह ने वक्रोक्ति को समस्त अलंकारों में अव्वल और अलंकारों की संख्या 38 बताई। यह संख्या आगे के आचार्यों ने बदस्तूर बढ़ाई और बढ़ते-बढ़ते यह संख्या 123 हो गई। बाद में इस दृष्टिकोण में बदलाव हुए और अलंकार संप्रदाय की विकास यात्रा के कम से कम तीन चरण तो हैं ही।

     

    1. अलंकार ही सौंदर्य है (भामह, दंडी, वामन के अनुसार);

     

    2. अलंकार और अलंकार्य में भेद है (रुद्रक का विचार);

     

    3. अलंकार काव्य की बाह्य साज-सज्जा का उपकरण (ध्वनिवादी और रस वादी आचार्यों के मतानुसार) हैं।

     

    इसे यदि आप आसान करके समझें तो यह कहेंगे कि अलंकार काव्य की शोभा, सहज धर्म और प्राणतत्व है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रुद्रट तथा आनंदवर्धन के ही मत का आधार लेते हुए अनेक चमत्कारपूर्ण शैलियों का नाम अलंकार माना है। उनकी दृष्टि में अलंकार प्रस्तुत या वर्ण्य वस्तु नहीं, बल्कि वर्णन की भिन्न प्रणालियों हैं, कहने के ख़ास-ख़ास ढंग हैं। उन्होंने भावों का उत्कर्ष और वस्तुओं के रूप, गुण और क्रिया का अधिक तीव्र अनुभव कराने में कभी-कभी सहायक होने वाली उक्ति को अलंकार माना है।

     

    (3) रीति संप्रदाय

     

    संस्कृत काव्यशास्त्र में 'रीति' एक व्यापक अर्थ धारण करने वाला शब्द है, लक्षणग्रंथों में प्रयुक्त 'रीति' शब्द का अर्थ ढंग, शैली, प्रकार, मार्ग तथा प्रणाली है। कवि की अनुभूति को विशिष्ट पद-रचना द्वारा अभिव्यक्त करने के क्रम को मार्ग या रीति कहते हैं। यह उर्दू के 'तरीक़ा' शब्द जैसा ही है। इस तरीक़े या ढंग अर्थात 'रीति' को भारतीय काव्यशास्त्री अपनी तरह से समझाते हैं। वे कहते हैं कि काव्यभाषा की विशेष गुणों वाली पद रचना 'रीति' है। विशिष्ट पद-रचना ही रीति है। यहाँ विशिष्ट का अर्थ है गुणसंपन्न—विशेष गुणात्मा।

     

    जैसे अलंकार का उल्लेख भरत मुनि ने किया था, वैसे ही उन्होंने रीति का संकेत भी कर दिया था। रीति संप्रदाय आचार्य वामन (9 वीं शती) द्वारा प्रवर्तित एक काव्य-संप्रदाय है जो रीति को काव्य की आत्मा मानता है। वामन काव्य का आधार रीति को तथा रीति का आधार गुण को मानते हैं अतः गुण ही काव्य का सर्वोत्तम तत्व सिद्ध होता है। वामन ने रीति संप्रदाय में गुणों को इतना महत्व दिया है कि रीति संप्रदाय का दूसरा नाम 'गुण संप्रदाय' ही पड़ गया।

     

    काव्य भाषा की पद-रचना या पद विन्यास की विशिष्टता उसमें निहित गुण में होती है। कुछ विशेष गुणों या गुण विशेष वाली पद-रचना ही रीति है और ऐसी ही रीति को आचार्य वामन काव्य की आत्मा मानते हैं। वामन ने गुणों के दो वर्ग किए—शब्द गुण और अर्थ गुण। शब्द गुण वर्ण योजना, पद-बंध या शब्द समूह के चमत्कार हैं किंतु अर्थ गुण का चमत्कार अर्थ सौंदर्य है।

     

    आचार्य वामन के अलावा रुद्रट, राजशेखर, कुंतक, भोज, आदि प्रमुख रीति विषयक आचार्यों ने रीति विषयक विचार प्रस्तुत किए। उदाहरण के लिए कुछ आचार्य 10 गुणों को मानते हैं और कुछ केवल तीन गुणों माधुर्य, ओज और प्रसाद ये तीन गुण ही मानते हैं। वामन ने रीति के तीन भेद किए हैं—वैदभी, गौड़ी, पांचाली, किंतु रुद्रट ने एक चौथी' लाटी' भी जोड़ दी।

     

    रीति संप्रदाय जिसे एक ज़माने में आचार्य वामन ने 'विशिष्ट पद-रचना रीति' कहा था वह आज के ज़माने में 'स्टाइल इज द मैन' है। जब कोई किसी पंक्ति को पढ़कर कहता है कि यह 'अज्ञेय जी की पंक्ति है' तो इन पंक्तियों में एक विशिष्ट रीति पाते हैं।

     

    (4) ध्वनि संप्रदाय—

     

    आवाज़ तो उर्दू का शब्द है किंतु ध्वनि संस्कृत का है और इसका अर्थ है 'नाद'। भारतीय भाषा चिंतन परंपरा में 'शब्द' भाषा की मूल इकाई है और इसको वैयाकरणों ने 'स्फोट' कहा है। अर्थ जिसमें स्फुटित हो वह 'स्फोट' है। स्फोटवादियों ने सुनाई पड़ने वाले शब्द को 'ध्वनि' कहा और शब्द को 'स्फोट'। इनसे आचार्य आनंदवर्धन ने 'ध्वनि' के सिद्धांत को लिया और उसे साहित्य शास्त्र के अनुकूल बनाया और कहा, जहाँ अर्थ स्वयं को अथवा शब्द अपने अर्थ को गुणिभूत करके उस (प्रतीयमान अर्थ) को अभिव्यक्त करते हैं उस काव्य विशेष को विद्वान ध्वनि कहते हैं। यह परिभाषा कोई आसान परिभाषा नहीं है। इसे समझना होगा। दो बातें निकलकर आती हैं—

     

    1. जहाँ शब्द और अर्थ अपने को अप्रधान बनाकर उस (प्रतीयमान व्यंग्य) अर्थ को व्यक्त करे, वह प्रतीयमान अर्थ विशेष ध्वनि है।

     

    2. जहाँ वाच्यार्थ से व्यंग्यार्थ अतिशयित या उत्कर्ष प्रधान हो, वह ध्वनि है।

     

    आनंदवर्धन प्रतीयमान अर्थ को ध्वनि मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि जैसे सुंदर स्त्रियों का सौंदर्य समस्त अंगों में अलग-अलग दिखाई देता है वैसे ही ध्वनि भी कविता के सब रूपों में अलग अलग दिखाई देती है।

     

    जिस शक्ति के आधार पर अर्थ निश्चित होता है, उसे शब्द शक्ति कहते हैं। इसके तीन प्रकार हैं : अभिधा, लक्षणा, व्यंजना। शब्द से वाच्यार्थ का बोध कराने वाली अभिधा शब्द शक्ति है, लक्ष्यार्थ का बोध कराने वाली लक्षणा शब्द शक्ति है तथा व्यंग्यार्थ का बोध कराने वाली व्यंजना शब्द शक्ति है।

     

    आज के ज़माने में ध्वनि को आप उर्दू के एक दूसरे शब्द 'लहज़ा' से समझ सकते हैं। किसी रचना से क्या ध्वनि निकलती है? कैसे एक उपन्यास लुगदी साहित्य हो जाता है और दूसरी रचना 'क्लासिक'? गुलशन नंदा के उपन्यास साहित्य नहीं माने जाते, गुरुदत्त के उपन्यास न लुगदी माने जाते हैं और न साहित्य, पर प्रेमचंद के उपन्यास साहित्य हैं क्योंकि उनकी 'दृष्टि' या उनका 'कथ्य' इस तरह 'ध्वनित' होता है। आज किसी रचना का मर्म तलाशना ही इस ध्वनि का ध्येय है।

     

    (5) वक्रोक्ति संप्रदाय

     

    वक्रोक्ति दो शब्दों 'वक्र' और 'उक्ति' की संधि से निर्मित शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है—ऐसी उक्ति जो सामान्य से अलग हो। टेढ़ा कथन अर्थात जिसमें लक्षणा शब्द शक्ति हो। आप भी जानते हैं कि सामान्य बोलचाल के शब्दों का प्रयोग जिन अर्थों में होता है उन्हीं अर्थों से सुंदर काव्य की रचना नहीं हो सकती। काव्य रचना के लिए शब्दों का चमत्कार चाहिए। कुंतक नामक एक आचार्य ने अपनी पुस्तक 'वक्रोक्ति जीवितम्' में वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा कहा है। आचार्य कुंतक ने विचित्र अभिधा को ही वक्रोक्ति कहा है। भामह ने वक्रोक्ति को एक अलंकार माना था और उन्होंने 'वक्रोक्ति' को 'लोकातिक्रांतिगोचर' कहकर समस्त अलंकारों का आधार माना है। परंतु कुंतक ने वक्रोक्ति को अत्यंत व्यापक रूप दिया। पहले तो इसको परिभाषित किया और फिर इसके भेद और उपभेद बताए। आचार्य कुंतक ने 'वक्रोक्ति' को काव्य का 'जीवन' माना है—वक्रोक्तिः काव्य जीवितम् वक्रोक्ति को स्पष्ट करते हुए आचार्य कुंतक ने कहा है—वक्रोक्तिः वैदध्यं-भंगी-भणिति रुच्येत अर्थात वक्रोक्ति कवि-कर्म-कौशल पर आधारित वाक्क्रैचित्र्य (चमत्कारपूर्ण) अभिव्यक्ति है। कुंतक की परिभाषा में आए तीन शब्द अति महत्वापूर्ण है—वैदग्ध्य कुशल प्रतिभा संपन्न कवि का निर्माण कौशल; भणिति कथन की शैली; भंगी चमत्कार अथवा चारुता।

     

    कुंतक के अनुसार वक्रोक्ति के छह प्रमुख भेद हैं : 1. वर्णविन्यासवक्रता, 2. पदपूर्वार्धवक्रता, 3. पदपरार्धवक्रता, 4. वाक्यवक्रता, 5. प्रकरणवक्रता, 6. प्रबंधवक्रता।

     

    आचार्य कुंतक ने वक्रोक्ति को उसके भेद और उपभेदों आदि के वर्गीकरण विश्लेषण से इतना व्यापक रूप दिया कि काव्य के सभी अवयव और क्षेत्रों से यह संबंधित हो सके। वर्ण योजना से लेकर प्रबंध तक के सभी काव्य व्यापार वक्रोक्ति के इस व्यापक रूप में आ जाते हैं किंतु दुर्भाग्य से परवर्ती विद्वानों ने इसे स्वीकार नहीं किया और आगे चलकर वक्रोक्ति एक शब्दालंकार मात्र बनकर रह गई जिसके दो भेद माने गए हैं : काकू वक्रोक्ति और श्लेष वक्रोक्ति

     

    फिर भी वक्रोक्ति सिद्धांत को यूँ ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता। इस सिद्धांत ने वक्रोक्ति को काव्य का प्राण कहा। इसके प्रणेता आचार्य ने पूर्व प्रचलित काव्य सिद्धांतों अलंकार, रस, ध्वनि, और रीति को बड़ी कुशलता पूर्वक वक्रोक्ति सिद्धांत में समाहित किया। इस सिद्धांत के महत्व को रेखांकित करते हुए 'हिंदी वक्रोक्ति जीवितं' की भूमिका (पृष्ठ 282) के लेखक डॉ. नगेंद्र के शब्दों में, भारतीय काव्य शास्त्र के इतिहास में ध्वनि के अतिरिक्त इतना व्यवस्थित विधान किसी अन्य काव्य का नहीं है, और काव्य कला का इतना व्यापक एवं गहन विवेचन तो ध्वनि सिद्धांत के अंतर्गत भी नहीं हुआ। वास्तव में काव्य के वस्तुगत सौंदर्य का ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण किंवा हमारे काव्यशास्त्र में ही नहीं, पाश्चात्य काव्यशास्त्र में भी दुर्लभ है।

     

    यहाँ आपके ध्यान में हिंदी का पूरा व्यंग्य साहित्य आ रहा होगा। शरद जोशी और हरि शंकर परसाई जैसे लेखक वक्रोक्ति के प्रयोग से ही नामचीन हुए। इसके बिना न नेता का काम चलता है और न अभिनेता का। मीडिया का तो इसके बिना काम ही नहीं चलेगा।

     

    (6) औचित्य संप्रदाय 

     

    औचित्य का शाब्दिक अर्थ उचित का भाव है। अनुचित अलंकार प्रयोग, अनुचित गुण प्रयोग, अनुचित रस प्रयोग, अनुचित रीति प्रयोग काव्य के सौष्ठव को नष्ट कर देता है। अर्थात अलंकार और गुण दो अलग-अलग तत्व है पर रस सिद्ध काव्य की स्थिरता औचित्य तत्व पर ही निर्भर करती है। अतः औचित्य काव्य का प्राण है। क्षेमेंद्र ने 'औचित्यविचार चर्चा' में 'औचित्य' को काव्य की 'आत्मा' मानकर काव्यशास्त्र के विभिन्न सिद्धांतों के बीच एक समन्वयकारी औचित्य सिद्धांत की स्थापना की। इन्हें 'समन्वयकारी आचार्य' भी कहा जाता है। क्षेमेंद्र से पहले भी भरत, भामह, दंडी, आनंदवर्धन, कुंतक, और महिम भट्ट ने भी इसका विवेचन किया है और आचार्य क्षेमेंद्र ने इस सिद्धांत का प्रवर्तन नहीं बल्कि व्यवस्थापन किया है।

     

    आचार्य क्षेमेंद्र के अनुसार औचित्य का अर्थ है काव्य में सभी अंगों का उचित प्रयोग करना अर्थात रस, ध्वनि, अलंकार और रीति की उचित प्रस्तुति। औचित्य के अभाव में ये सभी तत्व व्यर्थ है। इसे उन्होंने समझाते हुए कहा है कि यदि कोई स्त्री अपने गले में मेखला (तगड़ी) पहन ले और हाथों में बिछुए बाँध ले, पैरों में केयूर (नेकलेस) बाँध ले तो इस औचित्य पर कौन न हँसेगा? सही बात है। अधिक आभूषणों का उपयोग ग्रामीण स्त्री के लिए उचित किंतु नगर की स्त्री के लिए अनुचित लगेगा। औचित्य ही तो सौंदर्य का मूल है। जूता बहुत मँहगा होता है और टोपी सस्ती, पर सस्ती टोपी सिर पर रखते हैं और महँगा जूता पाँव में। यही उचित है।

     

    क्षेमेंद्र के अनुसार रस काव्य का प्राण ज़रूर है फिर भी जब तक वह भी औचित्य का पालन नहीं करता तो सहृदयों को आकर्षित न कर सकेगा। क्षेमेंद्र ने औचित्य के 27 भेद किए हैं किंतु आज के संदर्भ में बहुत से भेद बेकार हो गए हैं। यह समझना होगा कि क्षेमेंद्र काव्य के सभी अंगों को स्वीकार करते हुए केवल उनके औचित्य पूर्ण प्रयोग पर बल देते हैं। अतः औचित्य को काव्य की आत्मा अथवा कोई स्वतंत्र सिद्धांत नहीं माना जा सकता। हाँ, इसमें सहृदय की अवधारणा बहुत ख़ास है। पाठक को सहृदय होना चाहिए। उसका हृदय कोमल हो। यदि ऐसा न होगा तो उस पर रचना का कोई प्रभाव न पड़ेगा।

     

    'औचित्य संप्रदाय' सबसे अंत में जनमा, सबसे कम चर्चा में आया और सबसे कम ही मक़बूल हुआ। परंतु आज के समीक्षा विमर्श में यह सबसे अधिक माकूल लगता है। क्यों? क्योंकि एक तो आचार्य क्षेमेंद्र ने दूसरे आचार्यों की तरह खुद ही इसे 'काव्य की आत्मा' सिद्ध करने की कोई ख़ास कोशिश नहीं की, दूसरे इसे खुला छोड़ दिया। जो उचित लगे या प्रतीत हो वही रचना में दें। रचना के हर स्तर पर अनौचित्य से बचना ही इस संप्रदाय के पैरोकारों की सिफ़ारिश है। प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने अपने एक व्याख्यान में ठीक ही कहा है, यह सिद्धांत समीक्षा व समीक्षक के लिए ही बना साबित होता है, जबकि रस-ध्वनि-रीति-वक्रोक्ति आदि सब सर्जक और सामाजिक के लिए। कैसी पद रचना हो, उक्ति वैचित्र्य का कैसा प्रयोग है, कितने अलंकार समाविष्ट हों कि कवि की अभीप्सित ध्वनि निकले तथा पाठक भी रस ग्रहण करे आदि-आदि की पूरी निर्णयात्मकता औचित्य के दायरे से संबद्ध है। इस रूप में वह सबके बीच संतुलन स्थापित करता है, उसका परीक्षण करता है और यही समीक्षा कर्म है। इसके अंतर्गत लेखक को जो कहना है, और उसके लिए वह जो साधन इस्तेमाल करता है, उसकी सटीकता की परख निहित है।

     

    हिंदी में काव्यशास्त्र की परंपरा संस्कृत में अनेक आचार्यों ने जिस तरह से लिखा उसी तरह से हिंदी में मुख्यतः रीतिकाल के कुछ कवियों और आचार्यों ने हिंदी में काव्यशास्त्र लिखे। भारतीय काव्यशास्त्र में रीतिकालीन कवि आचार्यों के लक्षण ग्रंथों का भी एक पूरा आलोचना शास्त्र है। उनसे भी पहले भक्तिकाल में कृपाराम की 'हिततरंगिणी' से नीति निरूपण की परंपरा का आरंभ माना जाता है। हिंदी में भी काव्यशास्त्र ग्रंथों की परंपराएँ रही हैं। एक ऐसे ग्रंथों की परंपरा जिनमें केवल अलंकारों की व्याख्या और विवेचन है, जैसे जसवंत सिंह का 'भाषा भूषण'। दूसरे ऐसे ग्रंथों की परंपरा जिनमें रस अथवा नायिका भेद का विवेचन है, जैसे केशवदास की 'रसिकप्रिया'। इसके अलावा एक ऐसे ग्रंथों की परंपरा है जिसमें 'काव्य प्रकाश' के अनुसरण पर 'काव्य शास्त्र' के विभिन्न अंगों का निरूपण किया गया है जैसे भिखारीदास का 'काव्य निर्णय'

     

    परंतु इन आचार्यों ने दोनों या तीनों प्रकार के ग्रंथों की रचना की है, इसलिए उनके एक ही ग्रंथ में कई दृष्टियाँ मिलती हैं। यह भी कहा जाता है कि रीतिकालीन कवियों ने काव्य शास्त्रीय विवेचन संस्कृत के आचार्यों की देखा देखी किया। इस वजह से इनमें मौलिकता का अभाव है। पर ये शिक्षा देने में सफल रहे। इस कारण कोई सिद्धांत साफ़-साफ़ दिखाई नहीं देता। रीतिकाल के दूसरे नाम अलंकृत काल, शृंगार काल इसी वजह से है। इन काव्य शास्त्रीय ग्रंथों को चार भागों में बाँट कर रखा जा सकता है, जैसे—

     

    (क) अलंकार ग्रंथ जैसे करनेस कवि लिखित 'कर्णाभरण', जसवंत सिंह रचित 'ललित ललाम', भूषण विरचित 'शिवराज भूषण', पद्माकर प्रणीत 'पद्माभरण' आदि।

     

    (ख) रस ग्रंथ केशवदास विरचित 'रसिकप्रिया', कुलपति मिश्र कृत 'रस-रहस्य', भिखारीदास का 'रस सारांश' आदि।

     

    (ग) शृंगार और नायिका भेद के ग्रंथ कृपाराम का 'हिततरंगिणी', सूरदास का 'साहित्य लहरी', चिंतामणि का 'शृंगार मंजरी', मतिराम का 'रसराज' आदि

     

    (घ) काव्यशास्त्र के ग्रंथ जैसे केशवदास का 'कविप्रिया', चिंतामणि का 'कविकुल कल्पतरु', देव का 'शब्द रसायन', सुरति मिश्र का 'काव्य सिद्धांत', भिखारीदास का 'काव्य निर्णय' आदि।

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