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इकाई 1 : हिंदी भाषा का उद्धव और विकास

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मुकेश अग्रवाल

मुकेश अग्रवाल

इकाई 1 : हिंदी भाषा का उद्धव और विकास

मुकेश अग्रवाल

और अधिकमुकेश अग्रवाल

    हिंदी भाषा के विकास की पूर्वपीठिका

     

    ( क ) भारोपीय भाषा परिवार एवं आर्य भाषाएँ

     

    ( अ ) विश्व के भाषा परिवार

    विश्व में कितनी भाषाएँ बोली जाती हैं, इसका विचार समय-समय पर भाषा शास्त्री करते रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार विश्व की सभी भाषाओं और बोलियों की संख्या लगभग 2800 है। परंतु विश्व में प्रारंभ से ही इतनी भाषाएँ नहीं रही हैं। भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार जब मनुष्य ने वाणी के माध्यम से संप्रेषण प्रारंभ किया उस समय वह कुछ स्थानों पर रहता था। जनसंख्या के दबाव के कारण उसने अन्यत्र फैलना प्रारंभ किया और साथ में वह अपनी भाषा भी लेता गया। अलग-अलग स्थानों पर भाषाएँ भी अलग-अलग रूपों में विकसित हुई और आज उनकी संख्या अनुमानतः 2800 हो गई है। मूलतः एक स्थान से विकसित होने वाली भाषाएँ एक भाषा-परिवार की भाषाएँ कही जाती हैं। विश्व में कुल कितने भाषा परिवार हैं। इसका निर्धारण भाषा वैज्ञानिक आज तक नहीं कर पाए हैं। वस्तुतः इस प्रकार का निर्णय भाषाओं के तुलनात्मक और ऐतिहासिक अध्ययन के उपरांत ही दे पाना संभव है, परंतु भारोपीय, सेमेटिक और द्रविड़ भाषा-परिवारों के अतिरिक्त अन्य भाषा परिवारों का गहन अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है। बिल्हेल्म फॉन हम्बोल्ड्ट ने कुल तेरह भाषा-परिवार माने थे। पार्टिरिज के अनुसार यह संख्या दस है। राइस (Reiss) ने इनकी संख्या 10, ग्रे ने 26 और फ्रेडरिक मूलर ने लगभग सौ मानी है। भारतीय विद्वान यह संख्या 10 से 18 तक मानते रहे हैं। इस अध्याय में भाषा-परिवारों की संख्या अठारह मानकर ही उन पर विचार किया जा रहा है।

     

    विश्व में भाषा-खंडों की संख्या चार है। ये चार खंड हैं—(क) अफ़्रीका खंड, (ख) यूरेशिया खंड, (ग) प्रशांत महासागरीय खंड और (घ) अमेरिका खंड। इन खंडों में निम्नलिखित भाषा-परिवार स्वीकार किए जाते हैं।

     

    (क) अफ़्रीका खंड—

    1. सूडानी परिवार 

    2. बांटू परिवार

    3. होतेन्तीत-बुशमैन परिवार

    4. सामी-हामी परिवार

     

    (ख) यूरेशिया (यूरोप-एशिया) खंड—

    5. भारोपीय परिवार

    6. द्राविड़ परिवार

    7. बुरूशस्की परिवार

    8. काकेशी परिवार

    9. यूराल-अल्ताई परिवार

    10. चीनी परिवार

    11. जापानी-कोरियाई परिवार

    12. हाइपरबोरी परिवार

    13. बास्क परिवार

     

    (ग) प्रशांत महासागरीय खंड—

    14. मलय-पोलिनेशियाई परिवार

    15. पापुई परिवार

    16. आस्ट्रेलियन परिवार

    17. दक्षिण-पूर्व एशियाई परिवार

     

    (घ) अमेरिका खंड—

    18. अमेरिकी परिवार

     

    (आ) भारोपीय परिवार

    भारोपीय परिवार को इंडो-जर्मनिक परिवार, आर्य परिवार तथा भारत-हित्ती परिवार भी कहा जाता रहा है। मूल भारोपीय भाषा के प्रयोक्ताओं को 'आर्य' कहा जाता है। आर्यों का मूल स्थान विवादास्पद है। पहले वह स्थान भारत के बाहर माना जाता था, परंतु अब अनेक विद्वान भारत को ही आर्यों का मूल निवास स्वीकार करने के पक्ष में हैं। मूल भारोपीय भाषा श्लिष्ट योगात्मक थी। धातुओं में प्रत्यय जोड़कर शब्द-निर्माण किया जाता था। लिंग, वचन और पुरुष की संख्या तीन-तीन थी। स्वर संगीतात्मक था। उदात्त आदि स्वरों में अर्थभेद होता था। भारोपीय अर्थात् भारत-यूरोपीय परिवार की दस शाखाएँ मानी जाती हैं।

     

    भारोपीय भाषाओं का विभाजन—भारोपीय परिवार की भाषाओं को दो भागों में बाँटा जाता है—केंतुम् और सतम्। प्रो. अस्कोली ने 1870 ई. में अपना मत प्रस्तुत करते हुए कहा कि मूल भारोपीय भाषा की कंठ्य ध्वनियाँ कुछ भाषाओं में कंठ्य रह गई हैं और कुछ भाषाओं में वे संघर्षी (श, स, ज) हो गई हैं। उदाहरणार्थ, 100 को लैटिन में 'केन्टुम' (centum), अवेस्ता में सतम् और संस्कृत में शतम् कहा जाता था। इस आधार पर भारोपीय भाषाओं के दो वर्ग निश्चित हुए। केन्तुम् वर्ग की भाषाएँ हैं—ग्रीक, केल्टिक, जर्मनिक (ट्यूटानिक), इटालिक, हिटाइट और तोखारी। शतम् अर्थात सतम् वर्ग में भारत-ईरानी (आर्य) बाल्टो स्लाविक, आर्मीनी तथा अल्बानी भाषाएँ आती हैं।

     

    केंतुम वर्ग की भाषाएँ

    1. ग्रीक— ग्रीस, दक्षिणी अल्बानिया तथा यूगोस्लाविया, बल्गेरिया, टर्की, साइप्रस का कुछ भाग इनका क्षेत्र माना गया है। 1000 ई.पू. के इलियड और ओडिसी ग्रीक के दो प्रमुख महाकाव्य हैं। ग्रीक वर्णमाला से ही यूरोप की सभी लिपियों का विकास हुआ है।

     

    2. केल्टिक— लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व इसका प्रयोग यूरोप के एक बड़े भूभाग में होता था। परंतु आज यह फ़्रांस के पश्चिमोत्तर भाग, स्काटलैंड तथा वेल्स में ही बोली जाती है। यह अत्यंत अस्पष्ट एवं क्लिष्ट भाषा है। इसकी वाक्य रचना भी पर्याप्त जटिल है।

     

    3. जर्मनिक (ट्यूटानिक)— इसका प्रयोग क्षेत्र आइसलैंड, नार्वे, डेन्मार्क, स्वीडन, इंग्लैंड, दक्षिण तथा उत्तर जर्मनी, हालैंड और बेल्जियम है। इसकी एक शाखा अँग्रेज़ी आज विश्व की प्रमुख भाषा है। इसकी जर्मन और डच शाखाओं का साहित्य भी उच्चकोटि का है। ये भाषाएँ मूलतः संयोगात्मक थीं, पर बाद में वियोगात्मक हो गईं।

     

    4. इटालिक (रोमांस)— इसका क्षेत्र है—इटली, सिसिलया, कोर्सिका, फ़्रांस, स्पेन, रोमानिया और पुर्तगाल। इस वर्ग की भाषाओं का विकास 'लैटिन' से हुआ है। लैटिन श्लिष्ट योगात्मक भाषा थी, परंतु उससे विकसित इटालियन, फ़्रेंच, स्पेनिश आदि योगात्मक से अयोगात्मक हो गई हैं।

     

    5. हिटाइट (हिट्टाइट, हित्ती)— इसका पता बीसवीं सदी के प्रारंभ में टर्की के बोगाजकोई क्षेत्र की खुदाई से चला। भौगोलिक दृष्टि से सतम् क्षेत्र में होते हुए भी यह केंतुम् वर्ग की भाषा है। इस भाषा में स्त्रीलिंग नहीं था सिर्फ़ पुल्लिंग और नपुंसकलिंग ही थे।

     

    6. तोखारी— मध्य एशिया के तुर्फान प्रदेश में बीसवीं सदी के प्रारंभ में हुई खुदाई से इसका पता चला। 'तोखर' लोगों द्वारा बोले जाने के कारण इसे 'तोखारी' कहा गया। इसके सर्वनाम और संधि-नियम संस्कृत के काफ़ी मिलते-जुलते हैं।

     

    सतम् वर्ग की भाषाएँ

     

    सतम् वर्ग की भाषाओं को चार वर्गों में बाँट सकते हैं—

     

    1. बाल्टो-स्लाविक (लेट्टो-स्लाविक) भाषाएँ— इस परिवार की दो शाखाएँ हैं—

     

    (अ) बाल्टिक— इसमें तीन भाषाएँ आती हैं—(क) प्राचीन पर्शियन— इसका प्रयोग अब नहीं किया जाता। (ख) लिथुआनियन— यह लिथुआनिया प्रदेश की भाषा है। यह प्रदेश पहले सोवियत संघ में था। (ग) लेट्टिक— पूर्व सोवियत संघ के पश्चिमी भाग में लेटविया प्रदेश की भाषा है। यह लिथुआनियन से अधिक विकसित है।

     

    (आ) स्लाविक— स्लाविक वर्ग की प्रमुख भाषाएँ निम्नलिखित हैं। (क) रूसी— रूस की राष्ट्रभाषा और राजभाषा। (ख) श्वेत रूसी— पूर्व सोवियत संघ के पश्चिमी भाग की भाषा। (ग) लघुरूसी— युक्रेन की भाषा। हंगरी में भी इसका प्रयोग मिलता है। (घ) चेक— यह चेक गणराज्य की भाषा है। इसे बोहेमियन भी कहते हैं। (ङ) पोलिश— पोलैंड की भाषा। (च) स्लोवाकी— स्लोवाक (पूर्व चेकोस्लोवाकिया का भाग) की भाषा। यह चेक की ही विभाषा है। (छ) बल्गेरियन— बुल्गेरिया की भाषा। पुरानी बल्गोरियन संस्कृत और ग्रीक के बहुत निकट है। (ज) सर्बोक्राटी— यह यूगोस्लाविया की भाषाओं का समूह है।

     

    2. आर्मीनियन— यह आर्मीनिया की भाषा है। यह आर्य परिवार और बाल्टो स्लाविक परिवार के मध्य संजोयक कड़ी मानी जाती है। ईरानी भाषा का इस पर कुछ प्रभाव देखा भी जा सकता है। आज इसके दो रूप देखे जाते हैं—स्तंबूल (यूरोपीय क्षेत्र की भाषा) और अरारट (एशियाई क्षेत्र की भाषा)।

     

    3. अल्बानी (इलीरी)— अल्बानी भाषा प्राचीन इलीरी का ही अवशिष्ट रूप है। इलीरी पर ग्रीक, तुर्की और स्लाविक भाषाओं का प्रभाव देखा जा सकता है। यह एड्रियाटिक सागर के पूर्वी पहाड़ी प्रदेश की भाषा है।

     

    4. आर्य अथवा भारत-ईरानी शाखा—भारत-ईरानी शाखा को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जाता है—(क) ईरानी, (ख) दरद और (ग) भारतीय।

     

    (क) ईरानी— ईरानी वर्ग का प्राचीन साहित्य 323 ई.पू. सिकंदर ने और 651 ई. में अरब विजेताओं ने जला दिया था। अतः इस वर्ग की भाषा की जानकारी का प्राचीन स्रोत फ़ारसी धर्मग्रंथ 'अवेस्ता' है। इसी के आधार पर यह भाषा भी अवेस्ता कही जाती रही है। प्राचीन ईरान का पश्चिमी भाग 'फ़ारस' कहलाता था, अतः वहाँ की भाषा 'फ़ारसी' थी। इस प्रकार ईरानी वर्ग की पहले दो भाषाएँ थी—प्राचीन फ़ारसी और अवेस्ता। प्राचीन फ़ारसी का ही विकसित रूप मध्यकाल में 'पहलवी' कहलाया। अवेस्ता और प्राचीन फ़ारसी 'संस्कृत' से काफ़ी मिलती-जुलती हैं और पहलवी अथवा मध्यकालीन फ़ारसी' प्राकृत अपभ्रंश' से। आधुनिक फ़ारसी की बहुत सी प्रादेशिक बोलियाँ हैं। विद्वान इस संबंध में निश्चित नहीं हैं कि कौन सी प्रादेशिक बोलियाँ फ़ारसी से विकसित हैं और कौन-सी अवेस्ता से। ये बोलियाँ हैं—पश्तो (अफ़गानिस्तान की भाषा), बलूची (बिलोचिस्तान की भाषा), पामीरी (पामीर के पठार की घाटियों में बोली जानेवाली भाषा) और कुर्दिश (कुर्दिस्तान की भाषा)।

     

    (ख) दरद— संस्कृत शब्द दरद का अर्थ है 'पर्वत'। इस वर्ग की भाषाओं का क्षेत्र पामीर और पश्चिमोत्तर पंजाब के बीच में है। इसकी मुख्य भाषाएँ हैं—खोवार (दर्दिस्तान और ईरानी के बीच की भाषा), काफिर ('खोवार' के पश्चिमी क्षेत्र के पास की भाषा) और दरद। 'दरद' के अंतर्गत तीन भाषाएँ हैं— 1. शीना या शीणा (गिलगिट की घाटी की भाषा), 2. कोहिस्तानी (यह अब समाप्त प्राय है) और 3. कश्मीरी।

     

    (ग) भारतीय— भारत-ईरानी शाखा के भारतीय उपवर्ग की प्राचीनतम ज्ञात भाषा संस्कृत है। इसे भारतीय आर्य भाषा भी कहा जाता है। इसका ज्ञात इतिहास लगभग 2000 वर्ष ई.पू. का है। कुछ विद्वान इस काल सीमा को 2500 ई.पू. तो कुछ 1500 ई.पू. स्वीकार करते हैं। ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से भारतीय आर्य भाषा को तीन कालों में बाँट सकते हैं।

    1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषा (2000 ई.पू. से 500 ई.पू.)

    2. मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा (500 ई.पू. से 1000 ई.)

    3. आधुनिक भारतीय आर्य भाषा (1000 ई. से अद्यतन)

     

    प्राचीन भारतीय आर्य भाषा— प्रा. भा. आ. भा. का रूप भी भिन्न-भिन्न कालों में परिवर्तित होता रहा है। कुछ विद्वान इस परिवर्तन को तीन काल खंडों में देखते हैं—वैदिक भाषा काल (2000 ई.पू. से 1500 ई.पू.) ब्राह्मण काल (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.) और साहित्यिक संस्कृत काल (1000 ई.पू. से 500 ई.पू.); परंतु अधिकांश विद्वान इसे दो भागों—वैदिक संस्कृत (800 ई.पू. तक) और लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. से 500 ई.पू.) में बाँटते हैं।

     

    वैदिक संस्कृत

    वैदिक संस्कृत को वैदिकी, छंदस् अथवा छांदस भी कहा जाता है। ऋग्वेद आदि ग्रंथ होने कारण इसका प्राचीनतम रूप वहीं उपलब्ध है। छंदोबद्ध होने के कारण ऋग्वेद को 'छंदस्' भी कहा जाता है। यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में पद्म के साथ गद्य रूप भी उपलब्ध हैं। ब्राह्मण ग्रंथों की रचना भी गद्य में ही हुई है। अतः इनसे क्रमशः प्राचीन गद्य और प्रचलित भाषा के स्वरूप का परिचय मिलता है।

     

    समस्त प्राचीन साहित्य संस्कृत में ही मिलता है। स्पष्ट है कि उस समय वैदिक संस्कृत जनभाषा रही होगी परंतु उसके साथ ही कुछ लोकभाषाओं के प्रचलन की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

     

    वैदिक संस्कृत में ध्वनियों की संख्या 52 मानी जाती है। मूलस्वरों में ऋ, ऋृृ तथा लृ का प्रचलन भी था। व्यंजनों में ळ, तथा ळ्ह  ध्वनियाँ भी थीं। इनके अतिरिक्त अनुस्वार, विसर्ग तथा जिह्वामूलीय एवं उपध्मानीय ध्वनियों का भी प्रचलन था। वैदिक भाषा श्लिष्ट योगात्मक भाषा थी। पद रचना में अनेकरूपता थी। एक ही पद एकाधिक रूपों में मिल जाता था। यथा—सं. देवौ < वै. सं. देवौ, देवा आदि। वैदिक संस्कृत में लिंग और वचन में परिवर्तन भी हो जाता था, जैसे मित्राः का रूप मित्रः भी मिलता है। उपसर्गों का धातु से पृथक प्रयोग भी वैदिक संस्कृत में मिलता है। संधि नियम पर्याप्त शिथिल थे। मध्य स्वरागम के भी अनेक उदाहरण वैदिक संस्कृत में देखे जा सकते हैं।

     

    लौकिक संस्कृत

    लौकिक संस्कृत को ही प्रायः संस्कृत के नाम से जाना जाता है। संस्कृत ही भारत और भारतीय संस्कृति की पहचान रही है। भारतवर्ष का समस्त ज्ञान-विज्ञान, पुराण, काव्य, नाटक, कला संस्कृत में ही उपलब्ध है। संस्कृत ने अनेक भारतीय भाषाओं को ही नहीं वरन विश्व, विशेषतः भारोपीय भाषाओं को भी अत्यधिक प्रभावित किया। विश्व का आदि काव्य 'रामायण' संस्कृत में ही है जिसकी रचना लगभग 500 ई.पू. मानी जाती है। यहीं तक लौकिक संस्कृत का काल भी माना जाता है, परन्तु वास्तव में संस्कृत ईसापूर्व तक लोक-व्यवहार की भाषा रही है।

     

    लौकिक संस्कृत अथवा संस्कृत में वैदिक संस्कृत की ळ, ळ्ह ध्वनियाँ लुप्त हो गईं तथा जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के स्थान पर विसर्ग का प्रयोग प्रारंभ हो गया। इस काल की ऋ, ॠ तथा लृ ध्वनियों को भाषाशास्त्री स्वतंत्र स्वर के स्थान पर 'र्' तथा 'ल्' का आक्षरिक रूप मानने के पक्ष में हैं। वैदिक संस्कृत का अनुस्वार इस काल में अनुस्वार और अनुनासिक दो रूपों में प्रयुक्त होने लगा, जिनमें अनुनासिक (ँ) का उच्चारण पूर्ववर्ती स्वर के संयोग से होता है। लौकिक संस्कृत में संधि नियम सुदृढ़ हो गए। शब्द रूपों तथा धातुरूपों में विकल्प न्यूनतम रह गए। अनेक निपात एवं शब्द लुप्त हो गए, जैसे—दृशीक (सुंदर), अमूर (विज्ञान) आदि। अर्थ की दृष्टि से भी कुछ शब्दों में अंतर आ गया— क्षिति—गृह (वै सं.), पृथ्वी (लौ.सं.) आदि।

     

    वैदिक और लौकिक संस्कृत का संक्षिप्त अंतर कपिलदेव द्विवेदी के शब्दों में प्रस्तुत किया जा रहा है।

     

    (क) समानताएँ

    1. दोनों श्लिष्ट योगात्मक हैं।

    2. दोनों में प्रायः सभी शब्द धातुज हैं। रूढ़ शब्दों की संख्या कम है।

    3. पद-निर्माण की विधि प्रायः एक ही है। सुप्, तिङ्, कृत्, तद्धित आदि प्रत्यय समान हैं।

    4. धातुओं का गणों में विभाजन, णिच्, सन् आदि प्रत्यय समान हैं।

    5. समास-विधि दोनों में है।

    6. धातुओं और शब्दों के अर्थ प्रायः एक ही हैं।

    7. दोनों में 3 लिंग, 3 वचन, 3 पुरुष हैं।

    8. वाक्य-रचना शब्दों से नहीं, अपितु पदों से ही होती है।

    9. दोनों में वाक्य में पद-क्रम (शब्दों का स्थान) निश्चित नहीं है।

    10. दोनों में संधि-कार्य होते हैं। दोनों में कारक एवं विभक्तियाँ हैं।

     

    (ख) विषमताएँ

    वैदिक संस्कृत                                                         लौकिक संस्कृत

    1. ध्वनियों के ळ, ळ्ह, जिह्वामूलीय                             1. ये ध्वनियाँ नहीं रहीं। 
    उपध्मानीय हैं।

    2. लृ स्वर का प्रयोग था।                                         2. लृ स्वर लुप्तप्राय है।

    3. उदात्त आदि स्वरों का प्रयोग था।                             3. इनका प्रयोग नहीं रहा।

    4. स्वर-प्रयोग संगीतात्मक था।                                   4. स्वर-प्रयोग बलाघातात्मक है।

    5. ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत स्वर थे।                                       5. प्लुत प्रायः लुप्त हो गया।   

    6. शब्दरूपों में बहुत विविधता थी।                              6. विविधता बहुत कम हो गई।

    7. धातुरूपों में बहुत विविधता थी।                               7. विविधता प्रायः समाप्त हो गई।

     

    मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा

     

    (क) पालि

     

    पालि बौद्ध धर्म की भाषा है। विशेषतः इसका संबंध दक्षिणी बौद्धों से है। भाषा के अर्थ में पालि का प्रयोग अत्याधुनिक है। पहले इसका प्रयोग 'बुद्ध वचन' के रूप में होता था। इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग 'दीपबंस' में उपलब्ध हुआ है। जो चौथी शताब्दी की रचना है तथा लंका में लिखी गई है। काफ़ी बाद में आचार्य बुद्धघोष ने भी इसी अर्थ में पालि शब्द का प्रयोग किया है। 'पालि' के स्थान पर इस भाषा के लिए मागधी, मगध भाषा, मागधिक भाषा आदि का प्रयोग हुआ है।

     

    पालि को प्रथम प्राकृत भी कहा जाता है। पालि शब्द का संबंध विद्वानों ने पंक्ति, परियाय, पल्लि, पाटलिपुत्र आदि से बताया है, परंतु इसे 'रक्षा करने' के अर्थ में 'पा' धातु से मानना युक्तियुक्त है। इसमें बुद्ध वचनों की 'रक्षा' की गई है। तिपिटक (त्रिपिटक) की रचना पालि में ही हुई है। इस भाषा के व्याकरण का मूल ढाँचा मध्यदेश का है यद्यपि इसमें मगध प्रदेश की भाषा के भी अनेक शब्द मिलते हैं। कुछ विद्वान पालि का उद्भव संस्कृत से मानते हैं। कुछ के अनुसार यह प्राचीन जनभाषा है। वे संस्कृत को प्राकृत का परिष्कृत रूप मानते हैं। तीसरे मत के अनुसार, संस्कृत और प्राकृत अलग-अलग भाषाएँ हैं। इनमें से प्रथम मत अर्थात 'संस्कृत से प्राकृत का विकास' को ही अधिक मान्यता प्राप्त है।

     

    पालि किस प्रदेश की भाषा थी इस प्रश्न पर विचार करते हुए डॉ. भोलानाथ तिवारी ने विभिन्न विद्वानों को उद्धृत किया है। वे लिखते हैं—यह प्रश्न कम विवादास्पद नहीं है कि पालि मूलतः किस प्रदेश की भाषा थी। इस प्रश्न पर प्रायः दो दर्जन विद्वानों ने विचार किया है। श्रीलंका के बौद्धों तथा चाइल्डर्स आदि की यह धारणा है कि यह मगध की बोली थी। किंतु भाषा की विवेचना करने पर यह बात अशुद्ध ठहरती है। ध्वनि और व्याकरण की दृष्टि से इसका मागधी से साम्य नहीं है। वेस्टरगार्ड तथा स्टेनकोनो आदि पालि को उज्जयिनी या विंध्यप्रदेश की बोली पर आधारित मानते हैं। ग्रियर्सन ने इसे मागधी माना था, यद्यपि इस पर पैशाची का भी प्रभाव स्वीकार किया था। ओल्डेनबर्ग ने पालि को कलिंग की भाषा कहा था। रीज़ डैविड्ज़ ने इसे कोसल की बोली कहा है। ल्यूडर्ज पालि को पुरानी अर्धमागधी से संबद्ध मानते थे। इन मतों से एक बात स्पष्ट है कि पालि में विभिन्न प्रदेशों की बोलियों के तत्त्व हैं, इसी कारण विभिन्न लोगों ने इसे विभिन्न स्थानों से संबद्ध किया है। वस्तुतः अपने मूल में पालि मध्यप्रदेश की भाषा है। यों उस समय वह पूरे भारत में एक अंतः प्रांतीय भाषा जैसी थी, इसी कारण उसमें अनेक प्रादेशिक बोलियों, विशेषतः बुद्ध की अपनी भाषा होने से मागधी के भी कुछ तत्त्व मिल गए। इस प्रकार अपने मूल रूप में पालि को शौरसेनी प्राकृत का पूर्वरूप मान सकते हैं।

     

    पालि में मुख्य रूप से बौद्ध साहित्य लिखा गया है। इसके अतिरिक्त इसमें कोष, छंदशास्त्र तथा व्याकरण—रचनाएँ भी उपलब्ध हुई हैं। पालि साहित्य में जातक ग्रंथों, धम्म पद, मिलिंद पञ्हों, अट्टकथा तथा महावंश विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। पाकृत का प्रयोग कुछ शिलालेखों में भी मिलता है।

     

    पालि के प्रसिद्ध वैयाकरण कच्चायन ने पालि में ध्वनियों की संख्या 41; तो वैयाकरण मोग्गलान ने इनकी संख्या 43 मानी है। वैदिक संस्कृत की ऋ, ॠ, लृ, ऐ, औ (स्वर), श, ष, विसर्ग, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय ध्वनियाँ लुप्त हो गईं। संस्कृत के ऐ, औ का विकास क्रमशः ए तथा ओ रूप में हुआ तथा दो नए स्वर—ऍ (ह्रस्व ए) तथा ओॅ (ह्रस्व ओ) विकसित हो गए। ड, ढ के स्थान पर वैदिक संस्कृत के व्ळ, और व्व्ह पुनः आ गए। पालि में तीन लिंग हैं परंतु 'वचन' में द्विवचन लुप्त हो गया। पालि में 500 से अधिक धातुएँ हैं। ध्वनि परिवर्तन की दृष्टि से इसमें अघोषीकरण, अघोषीकरण, महाप्राणीकरण, समीकरण आदि की प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। पालि में तत्सम और देशज की तुलना में तद्भव शब्दों का प्राधान्य है।

     

    भाषा की दृष्टि से संस्कृत और पालि में काफ़ी समानताएँ हैं। रूप और वाक्य संगठन में दोनों समान हैं। कारकों में भी अंतर नहीं है। दोनों संश्लेषणात्मक भाषाएँ हैं और वाक्य में पदों का स्थान निर्धारित नहीं रहता, क्रिया और कर्ता कहीं भी रखा जा सकता है। शब्दावली में काफ़ी साम्य है, अंतर केवल ध्वन्यात्मक है। काल की दृष्टि से दोनों में बहुत अंतर नहीं है और दोनों के साहित्य का एक-दूसरे पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा है।

     

    उक्त समानताओं के उपरांत भी वैदिक संस्कृत से पालि में पर्याप्त अंतर है। कुछ मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं—

     

    1. वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत में तीन वचन हैं—एकवचन, द्विवचन और बहुवचन, परंतु पालि में द्विवचन का प्रयोग नहीं मिलता।

     

    2. वैदिक भाषा और संस्कृत में व्यंजनांत शब्दों की संख्या बहुत अधिक थी जबकि पालि में ये बहुत कम रह गए हैं।

     

    3. वैदिक भाषा और संस्कृत में आत्मनेपद रूपों की संख्या बहुत अधिक है लेकिन पालि से आत्मनेपद लुप्त हैं। वहाँ परस्मैपदों की ही अधिकता है।

     

    4. वैदिक भाषा और संस्कृत में ए, ओ, ऋ, ॠ, लृ, श, ष और विसर्ग ध्वनियाँ मिलती हैं परंतु पालि में इनका प्रयोग नहीं मिलता।

     

    5. वैदिक भाषा और संस्कृत तत्सम प्रधान भाषाएँ हैं, वहाँ तद्भव शब्द नहीं हैं। तद्भव शब्द पालि की ही विशेषता है। इसमें देशज शब्द भी मिलते हैं।

     

    6. वैदिक भाषा में उपसर्ग अलग लिखे जाते थे, परंतु पालि में उन्हें संस्कृत के समान क्रियापदों में जोड़ने की प्रवृत्ति थी।

     

    7. वैदिक भाषा की ळ् और व्ळ्ह ध्वनियाँ संस्कृत में लुप्त हो गई थीं। पालि में ये ध्वनियाँ पुनः देखी जा सकती है।

     

    8. वैदिक भाषा की अनेकरूपता संस्कृत में नहीं मिलती, परंतु पालि की यह प्रमुख विशेषता है। वैदिक भाषा में अकारांत शब्दों के तृतीया बहुवचन में देवेभि, कर्णेभिः जैसे रूप मिलते हैं, जो संस्कृत में अनुपलब्ध हैं परंतु पालि में वे देवेभि, देवेहि, कण्णेभि, कण्णेहि रूपों में सुरक्षित हैं।

     

    (ख) प्राकृत

     

    प्राकृत को मध्यकालीन प्राकृत अथवा साहित्यिक प्राकृत कहते हैं। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में प्राकृत के सात प्रमुख एवं सात गौण रूप स्वीकार किए हैं। उनके अनुसार सात मुख्य प्राकृत हैं—मागधी, अवन्तिजा, प्राच्या, सूरसेनी, अर्धमागधी, बाह्लीक, तथा दाक्षिणात्य (महाराष्ट्री)। प्राकृत के वैयाकरण वररुचि ने प्राकृत के चार रूप माने हैं— शौरसेनी, महाराष्ट्री, मागधी तथा पैशाची। मागधी के दो रूप-मागधी तथा अर्धमागधी माने जाते हैं। इस प्रकार प्राकृत के कुल पाँच रूप है। इन प्राकृतों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है।

     

    1. शौरसेनी प्राकृतः यह प्राकृत मथुरा या शूरसेन प्रदेश की बोली थी। मध्य देश संस्कृत का क्षेत्र था, अतः इस क्षेत्र की बोली अर्थात् शौरसेनी प्राकृत संस्कृत से अत्यधिक प्रभावित है। ब्रजभाषा तथा आज की मानक भाषा हिंदी का विकास शौरसेनी से ही हुआ है। साहित्य में निम्न एवं मध्य कोटि के पात्रों तथा स्त्रियों का वार्तालाप प्रायः शौरसेनी प्राकृत में ही होता था। कर्पूर मंजरी (राजशेखर) का गद्य भाग शौरसेनी में ही है। भास, कालिदास आदि के नाटकों का गद्य भाग की इसी प्राकृत में है। इसका प्राचीनतम रूप अश्वघोष के नाटकों में मिलता है। दिगंबर संप्रदाय के जैनों ने अपने संप्रदाय के ग्रंथों में इसी प्राकृत का उपयोग किया है।

    शौरसेनी प्राकृत में तत्सम शब्दावली अधिक है। इसमें द्विवचन के प्रयोग में कमी आ गई। न को ण हो जाता है—अभिनव > अभिणव। असंयुक्त तथा दो स्वरों के मध्य आने वाला सं. त् और थ् क्रमशः द् और ध् में परिवर्तित हो जाता है: अतिथि > अदिथि, कथय कधीहि। इसमें प को व, क्ष को क्ख तथा ध्य को झ हो जाता है: दीप > दीव, कुक्षि कुक्खि, मध्य > मज्झ। ऋ का विकास 'इ' में हो जाता हैः गृद्ध > गिद्ध। रूप की दृष्टि से इसका झुकाव संस्कृत की ओर है।

     

    महाराष्ट्री प्राकृतः माहाराष्ट्री अथवा महाराष्ट्री में हार्नले के अनुसार महाराष्ट्र का अर्थ महान राष्ट्र है। मध्यकाल में यह व्यापक क्षेत्र की भाषा थी। वैयाकरणों ने संभवतः इसीलिए महाराष्ट्री को प्रधान प्राकृत मानकर अन्य प्राकृतों की कतिपय निजी विशेषताएँ देकर शेष को महाराष्ट्री के सदृश कह दिया है। महाराष्ट्री को 'स्टैंडर्ड प्राकृत' भी कहते हैं। संभवतः महाराष्ट्री सदृश प्राकृत को लक्ष्य करके ही संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत को सुकुमार भाषा की संज्ञा दी गई। विद्वानों द्वारा यह महाराष्ट्री उत्कृष्ट प्राकृत मानी गयी है। महाराष्ट्रीसमां भाषां प्रकृतम् विदुः। महाराष्ट्री का पद्य साहित्य काफ़ी संपन्न है। सुरों का बाहुल्य होने के कारण काव्य रचना के लिए यह बहुत उपयुक्त भाषा सिद्ध हुई।

     

    मध्यगत व्यंजनों के लोप के कारण माहाराष्ट्री में स्वर का बाहुल्य दृष्टिगत होता है। इसमें दो स्वरों के मध्य आने वाले अल्पप्राण स्पर्श व्यंजनों क, ग, च, ज, त, द, प, का लोप हो जाता है—प्राकृत > पाउअ। उसी स्थिति में आने वाला महाप्राण स्पर्श—ख, थ, फ, ध, घ मात्र 'ह' रह जाता है—मुख > मुह श प स भी प्रायः 'ह' ही रह जाते हैं—पाषाण > पाहाण। मध्य में आने वाला 'य' सदैव लुप्त होता है—प्रिय > पिअ।

     

    साहित्य की दृष्टि से माहाराष्ट्री बहुत धनी है। इसके प्रसिद्ध ग्रंथ हैं— हाल कृत गाहा सत्तसई (गाथा सप्तशती), प्रवरसेन कृत 'रावण वहो', वाक्पति कृत 'गउड वहो' (गौड़ वधः) हेमचंद्र कृत 'कुमार पाल चरित'।' कर्पूर मंजरी' का पहा भी 'महाराष्ट्री' में ही है। 'दंडी' ने महाराष्ट्री को सर्वश्रेष्ठ प्राकृत माना है।

     

    पैशाची प्राकृत : वैयाकरणों ने पैशाची को शौरसेनी-प्रभावित भाषा माना है। यह प्राचीन प्राकृत मानी गई है, पिशाच क्षेत्र में प्रचलित होने के कारण इसका यह नाम पड़ा। पिशाच संभवतः अनार्य जाति थी और द्रविड़ों से इसका घनिष्ठ संबंध था। इसका क्षेत्र भारत का पश्चिमोत्तर भाग था। आधुनिक पश्चिमोत्तरी बोलियाँ तथा भाषाएँ कश्मीरी, सीना, दरदी, काफरी, चित्नाली, इसकी उत्तराधिकारिणी कही गई हैं। इसकी प्राचीन रचना गुणाढ्य रचित 'बृहत्कथा' का उल्लेख परवर्ती आचार्यों और लेखकों की कृतियों में हुआ है, किंतु यह अब उपलब्ध नहीं होती।

     

    क्षेमेंद्र रचित 'बृहत् कथा मंजरी' सोमदेव कृत 'कथा सरित सागर' आदि में इसके संस्कृत रूपांतरित अंश मिलते हैं। इसका एक उपभेद 'चूलिका' पैशाची भी है।

     

    दो स्वरों के बीच आने वाले स्पर्श वर्गों की घोष ध्वनियाँ उसी वर्ग की अघोष ध्वनियों में परिवर्तित हो जाती है, जैसे : ग > क, घ > ख आदि—गगन > गकन, दामोदर > तामोतर। पैशाची में पंचम वर्ण केवल 'न' है। ज्ञ, न्य तथा ण्य ‘ञ्ञ’ में परिवर्तित हो जाते हैं—प्रज्ञा > प्रञ्ञ। ष का विकास इस प्राकृत में 'श' अथवा 'स' के रूप में मिलता है। र और ल में परस्पर वर्ण-विपर्यय भी इसकी विशेषता है—कुमार > कुमाल आदि।

     

    मागधी प्राकृत— पूर्व में बिहार प्रदेश के 'मगध' राज्य के नाम पर इसका नामकरण हुआ। अर्वाचीन बिहारी बोलियों में मगही का इससे नामसाम्य है। पूर्वी क्षेत्रों में मागधी व्यापक प्राकृत थी। यह गौतम बुद्ध के उपदेशों की भाषा कही जाती है। इसका कोई स्वतंत्र साहित्य उपलब्ध नहीं होता। केवल पूर्वी क्षेत्र के शिलालेखों तथा संस्कृत नाटकों में निम्न श्रेणी के पात्रों की भाषा के रूप में यह सुरक्षित है।

     

    भरत के नाट्य शास्त्र के अनुसार यह अंतःपुर के नौकरों, अश्वपालकों आदि की भाषा थी। मार्कंडेय के अनुसार भिक्षु, क्षपणक, राक्षस, चेट आदि यही प्राकृत बोलते थे। इसके उपभेदों में शाकारी, चांडाली, शाबरी, ढक्की आदि प्रमुख हैं। बंगला, उड़िया, असमिया, भोजपुरी, मैथिली का विकास मागधी से ही हुआ है।

     

    मागधी में स, ष के स्थान पर 'श' का प्रयोग होता है—सप्त > शत्त; इसमें र को ल हो जाता है—राजा > लाजा। कुछ अन्य विशेषताएँ : ज > य; हा, र्ज, र्य > य्य; ण्य न्य, ज्ञ, ञ्ज > ञ्ञ (पुण्य > पुञ्ञ) आदि। प्रथमा एकवचन में विसर्ग को ए हो जाता है—देवः देवे, सः > शे।

     

    अर्धमागधी प्राकृत— यह शौरसेनी प्रभावित मागधी प्राकृत है, पूर्ण मागधी न होने के कारण इसे यह संज्ञा दी गई है। इसका क्षेत्र मागधी और शौरसेनी के बीच का क्षेत्र माना जाता है। अपनी साहित्यिक तथा धार्मिक महत्ता के कारण यह 'आर्ष' प्राकृत—के नाम से अभिहित की गई है। इसके पुराने और नए, दो रूपों का अनुमान किया गया है। जैन धर्म की यह प्रधान भाषा थी। विशुद्ध जैन साहित्य का प्राकृत वाङ्मय में अत्यधिक महत्त्व है। जैन धर्म तथा बौद्ध धर्मों को व्यापक बनाने में इस भाषा का विशेष हाथ रहा है।

     

    डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार— इसकी कुछ मुख्य विशेषताएँ है :

     

    (1) ष्, श् के स्थान पर प्रायः स् (श्रावक > साचग, वर्ष > वास) का प्रयोग।

     

    (2) अनेक स्थलों पर दंत्य ध्वनियों का मूर्धन्य हो जाना (स्थित--ठिय, कृत्वा--कट्ट)। यह प्रवृत्ति अन्य प्राकृतों की तुलना में इसमें अधिक है।

     

    (3) च वर्ग के स्थान पर कहीं-कहीं त वर्ग मिलता है (चिकित्सा--तेइच्छा)।

     

    (4) जहाँ कुछ अन्य प्राकृतों में स्वरों के बीच स्पर्श का लोप मिलता है, वहाँ इसमें 'य' श्रुति मिलती हैं (सागर > सायर, स्थित > ठिय)।

     

    (5) गद्य और पद्य की भाषा के रूपों में अंतर है। सं. 'अः' (प्रथमा एकवचन) के स्थान पर प्रायः गद्य में मागधी की तरह 'ए' का प्रयोग हुआ है, और पद्य में शौरसेनी के समान 'ओ' का।

     

    पालि और प्राकृत की तुलना

     

    पालि तथा प्राकृत की तुलना निम्न रूप में की जा सकती है :

     

    समानताएँ

     

    1. दोनों ही भाषाओं में ए, ओ, ळ और ळ्ह ध्वनियाँ मिलती हैं, किंतु ऐ और ऋ, ॠ और लृ का प्रयोग नहीं मिलता।

     

    2. पालि के समान प्राकृत में भी द्विवचन नहीं मिलता। निय प्राकृत1 में अपवादस्वरूप कुछ द्विवचनात्मक प्रयोग अवश्य मिलते हैं।

     

    3. पालि के समान प्राकृतों में भी आत्मनेपदी धातुओं तथा व्यंजनांत शब्दों क मात्रा घट रही थी।

     

    4. पालि के समान प्राकृत में भी तत्सम शब्दों की संख्या घट रही थी। परवर्ती प्राकृत में तो तत्सम शब्दों की संख्या अत्यल्प रह गई है।

     

    5. विसर्ग का प्रयोग पालि और प्राकृत दोनों में ही नहीं मिलता।

     

    उक्त समानताओं से स्पष्ट है कि पालि काल में आर्यभाषा में परिवर्तन की जो प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी वह परवर्ती काल में और तेज़ होती गई। दोनों भाषाओं की समानताओं के पश्चात उनकी असमानताओं पर विचार कर लेना चाहिए। ये निम्नांकित हैं—

     

    1. पालि में ऊष्म वर्णों में केवल स का प्रयोग मिलता है जबकि शौरसेनी प्राकृत में श, ष, स, महाराष्ट्री में श और स, मागधी में केवल श तथा शेष में सका प्रयोग मिलता है।

     

    2. प्राकृतों में न का ण के रूप में विकास हुआ है, अपभ्रंश में यह प्रवृत्ति और भी अधिक विकसित हुई है जबकि पालि में ऐसा नहीं मिलता।

     

    3. पालि पूर्णतः संयोगात्मक भाषा है जबकि प्राकृतों में वियोगात्मकता के लक्षण दिखने लगते हैं जैसे पालि का 'रामस्स घरं' प्राकृत में 'रामस्स केरक घरं' रूप में मिलता है।

     

    4. पालि में जो ध्वनि परिवर्तन प्रारंभ हुए थे उनकी गति प्राकृतों में बहुत अधिक हो गई है। आत्मनेपद तथा व्यंजनांत शब्दों की संख्या प्रायः नहीं के बराबर रह गई है।

     

    5. पालि में धातुओं का अर्थ बहुत सुरक्षित था जबकि प्राकृतों में ऐसा नहीं मिलता।

     

    उपर्युक्त के अतिरिक्त कुछ लोग एक पश्चिमी प्राकृत भी मानते हैं, जिससे ब्राचड अपभ्रंश का विकास हुआ। पंजाबी क्षेत्र में भी केकय नामक प्राकृत की कल्पना की गई है। टक्क और मद्र (माद्री) इसी की शाखाएँ थीं।

     

    (ग) अपभ्रंश— अपभ्रंश शब्द का प्राचीनतम प्रयोग आचार्य व्याडि (पतंजलि 150 ई. से पूर्ववर्ती) ने किया है। पतंजलि, भर्तृहरि, भामह, दंडी आदि ने भी इसका उल्लेख किया है। दंडी (सातवीं सदी) के समय से इसका प्रयोग प्रारंभ हो गया था। पउमचरिउ, महापुराण, जसहर-चरिउ, कीर्तिलता, संदेशरासक आदि अपभ्रंश के प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। अपभ्रंश को देशी भाषा, अपभ्रष्ट, अवहट्ठ आदि नाम भी दिए गए। ऊपर उद्धृत प्राकृतों से उन्हीं के नाम की अपभ्रंशों का विकास हुआ, जैसे—शौरसेनी, महाराष्ट्री, मागधी, अर्धमागधी आदि। साहित्यिक अपभ्रंश की विशेषताएँ डॉ. हरदेव बाहरी के शब्दों में नीचे प्रस्तुत की जा रही है।

     

    ध्वनि विकास—

     

    1. अपभ्रंश ने प्राकृत की ध्वनिमाला में कोई परिवर्तन नहीं किया, स्वर और व्यंजन वही रहे।

     

    2. संस्कृत शब्दों के आदि स्वर को यथावत् सुरक्षित रखा गया।

     

    3. प्राकृत में संस्कृत के अन्त्यस्वरों के लोप अथवा ह्रस्वीकरण की जो प्रवृति आरंभ हुई थी। उसका व्यापक और पूर्ण रूप से निर्वाह हुआ।

     

    4. उपान्त्यस्वर कहीं तो सुरक्षित रहा और कहीं ह्रस्व हो गया।

     

    5. प्राकृत के दीर्घ (द्वित्त्व) व्यंजन को अपभ्रंश में ह्रस्व (एक) व्यंजन करके आद्यक्षर में के स्वर को दीर्घ कर देने की प्रवृत्ति आरंभ हो गई, जो हिंदी बोलियों में जारी रही।

     

    6. प्राकृत के बीच में समीपवर्ती स्वरों (hiatus) को मिलाकर एक स्वर किया गया।

     

    7. आदि व्यंजन यथापूर्व सुरक्षित रहे।

     

    8. प्राकृत की तरह अपभ्रंश ने संस्कृत शब्दों के अंत्य व्यंजनों को लुप्त करने की प्रवृत्ति को और आगे बढ़ाया।

     

    9. ट वर्ग को छोड़कर मध्य अल्पप्राण व्यंजनों का लोप होता रहा और महाप्राण व्यंजनों की जगह 'ह' रह गया। प्राकृत में अपवाद अधिक थे, अपभ्रंश ने अपवाद कम कर दिए।

     

    10. मध्य ट्, ठ्, के स्थान ड्, ढ् और तदुपरांत ड़, ढ़ का विकास अधिक होने लगा।

     

    11. संयुक्त और द्वित्त्वव्यंजन की जगह अपभ्रंश में एक व्यंजन रह गया।

     

    12. र का आगम अनेक स्थानों पर दिखाई देता है—व्याकरण > व्रागरण।

     

    13. श और ष का लगभग लोप हो गया।

     

    14. शब्दों के अंत में 'उ' लगाने की प्रवृत्ति बढ़ गई—जगु, पुत्तु।

     

    15. 'ऋ' के अतिरिक्त सभी स्वरों के अनुनासिक रूप भी मिलते हैं।

     

    16. समीकरण, लोप और आगम की प्रवृत्ति बढ़ गई।

     

    17. नपुंसक लिंग शब्द समाप्त हो गए।

     

    18. वाक्यों में पद-क्रम निश्चित हो गया।

     

    19. भाषा वियोगात्मकता की ओर बढ़ने लगी।

     

    20. द्रविड़ एवं विदेशी भाषाओं के बहुत से शब्द आ गए।

     

    शब्द-भंडार—अपभ्रंश में देशी और तद्भव शब्दों की भरमार देखकर इसकी स्वतंत्र और विद्रोही प्रकृति का ठीक-ठाक अनुमान होता है। साहित्यिक शब्दों की अपेक्षा बोलचाल के शब्दों का अधिक व्यवहार उत्तरकालीन साहित्य में भी जारी रहा।

     

    अपभ्रंश तथा आधुनिक आर्य भाषाएँ

     

    आधुनिक आर्य भाषाओं का विकास विभिन्न अपभ्रंशों से हुआ। इसे निम्नरूप में प्रस्तुत किया जा सकता है—

    अपभ्रंश                                   आधुनिक आर्यभाषा/उपभाषा

    शौरसेनी                                  गुजराती, राजस्थानी, पश्चिमी हिंदी, पहाड़ी 

    केकय                                     लहंदा

    टक्क                                      पंजाबी

    ब्राचड                                     सिंधी

    महाराष्ट्री                                   मराठी

    मागधी                                     बिहारी, बंगाली, उड़िया, असमिया

    अर्धमागधी                                 पूर्वी हिंदी

     

    कुछ विद्वान लहंदा का विकास पैशाची; सिंधी और पंजाबी का विकास ब्राचड तथा पहाड़ी का विकास खस अपभ्रंश से स्वीकार करते हैं।

     

    (ग) भारत की आर्य भाषाएँ

     

    आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का संक्षिप्त परिचय नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है।

     

    1. मराठी—यह महाराष्ट्री अपभ्रंश से विकसित है। यह महाराष्ट्र में बोली जाती है। इसकी लिपि नागरी है। मराठी की चार बोलियाँ हैं— (क) दक्षिणी—इसे देशी भी कहा जाता है। यह महाराष्ट्र के दक्षिण में बोली जाती है। (ख) कोंकणी—यह समुद्र किनारे की बोली है। अनेक विद्वान इसे अलग भाषा मानने के पक्षधर हैं। इसमें कन्नड़ शब्द भी मिलते हैं। (ग) नागपुरी—यह नागपुर क्षेत्र के आस-पास बोली जाती है। (घ) बरारी—यह बरार क्षेत्र की बोली है। इसमें भीली तथा तेलुगु के काफ़ी शब्द मिलते हैं। मुकुंदराय मराठी के आदि कवि माने जाते हैं। अन्य साहित्यकारों में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, मुक्तेश्वर, तुकाराम, रामदास, दादोबा पांडुरंग तर्खडकर, विष्णु सखाराम खांडेकर, विजय तेंदुलकर आदि को विशेष ख्याति मिली है।

     

    2. गुजराती—यह गुजरात प्रांत की भाषा है। शौरसेनी अपभ्रंश के नागर रूप से विकसित गुजराती को 'लाटी' भी कहा जाता है। अरब, पारसी और तुर्कों के यहाँ बसने के कारण इसमें विदेशी तत्त्व काफ़ी हैं। गुजराती की स्वतंत्र लिपि है जो देवनागरी से विकसित हुई है। इस भाषा में उच्च कोटि का साहित्य उपलब्ध होता है।

     

    3. बंगाली—बंगाल प्रांत की इस भाषा को बंगला अथवा बांग्ला भी कहते हैं। बंगला देश में भी इसका प्रयोग होता है। इसकी उत्पत्ति मागधी अपभ्रंश के पूर्वी रूप से हुई है। इसकी साहित्यिक भाषा में संस्कृत शब्दों का बाहुल्य है। हिंदी 'अ' का उच्चारण बंगला में 'ओ' जैसा होता है—रोबि (रवि), जोय (जय), पौरमानंद (परमानंद) आदि। चंडीदास, कृत्तिवास, विजय गुप्त, रवींद्रनाथ ठाकुर, बंकिम चंद्र, शरतचंद्र आदि इसके प्रमुख साहित्यकार हैं। इसकी अपनी अलग लिपि है। 

     

    4. असमिया—यह मागधी के पूर्वोतरी रूप से विकसित है और असम प्रांत की भाषा है। इसकी लिपि बांग्ला से कुछ ही भिन्न है। तिब्बती-बर्मी, नागा आदि भाषाओं का भी इस पर प्रभाव पड़ा है। माधव कंदली, शंकर देव, माधवराम, लक्ष्मीनाथ बरुआ, रघुनाथ चौधरी, देवकांत बरुआ आदि असमिया के प्रमुख साहित्यकार हैं।

     

    5. उड़िया—यह उड़ीसा प्रदेश की भाषा है। इसे 'ओड्री' भी कहा जाता है। कुछ लोग इसे 'उत्कली' कहते हैं। राजनीतिक कारणों से इस पर मराठी और तेलुगु का काफ़ी प्रभाव पड़ा है। संस्कृत के शब्द भी इसमें प्रचुर मात्रा में हैं। इसकी लिपि पुरानी नागरी से विकसित है, पर द्रविड़ प्रभाव के कारण कठिन हो गई है। सारला दास, कपिलेंद्र देव, सालबाग, उपेंद्रभंज, दीनकृष्ण, गोपालकृष्ण, मधुसूदन राय, नीलकंठ दास आदि उड़िया के प्रमुख साहित्यकार हैं।

     

    6. लहंदा—यह केकय अथवा पैशाची अपभ्रंश से विकसित है। यह मुख्यतः पंजाब के पश्चिमी भाग तथा पश्चिमोत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग की भाषा है। इस पर दरद शाखा का पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। इसकी अपनी लिपि 'लण्डा' है किंतु यह प्रायः फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है। लहंदा, मुलतानी, पोठवारी और धन्नी इसकी प्रमुख बोलियाँ हैं। फरीद, नानक आदि कवियों का साहित्य इसी भाषा में है।

     

    7. सिंधी—यह प्राचीन सिंध प्रांत की भाषा थी। परंतु 1947 के भारत-विभाजन के बाद इसके प्रयोक्ता पंजाब, दिल्ली, मुंबई, अजमेर तथा पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बँट गए हैं। बिचौली, सिरैकी, लाड़ी, थरेली तथा कच्छी इसकी बोलियाँ हैं। इसकी लिपि भी 'लण्डा' है परंतु यह अरबी और गुरुमुखी में भी लिखी जाती है। 'शाहजी रिसालो' सिंधी का उल्लेखनीय ग्रंथ है।

     

    8. पंजाबी—यह पंजाब प्रांत की भाषा है। यह ब्राचड अथवा टक्क अपभ्रंश से विकसित है। इस पर दरद का पर्याप्त प्रभाव है। पंजाबी की प्रमुख बोलियाँ हैं—डोगरी, मालवई, पोवाधी और माझी। पंजाबी की लिपि गुरुमुखी है, परंतु इसकी जम्मू राज्य में बोली जानेवाली प्रमुख बोली डोगरी 'टाकरी' लिपि में लिखी जाती है। इस भाषा में संस्कृत और प्राकृत के अनेक शब्द मिलते हैं। इस भाषा में सिक्खों का साहित्य विशेष रूप से लिखा जा रहा है।

     

    9. हिंदी और उसके विविध रूप—हिंदी का विविध रूपों का विकास शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी अपभ्रंशों से पाँच उपभाषाओं पश्चिमी हिंदी, पहाड़ी, राजस्थानी, बिहारी और पूर्वी हिंदी के रूप में हुआ। इन उपभाषाओं से विकसित हुई। प्रायः हिंदी बोलियों की संख्या सत्रह मानी जाती है, परंतु कुछ विद्वान इनकी संख्या अठारह अथवा उन्नीस तक भी पहुँचा देते हैं। हिंदी की उपभाषाओं से विकसित बोलियाँ इस प्रकार हैं—

     

    अपभ्रंश                   उपभाषा                           बोलियाँ


    शौरसेनी                  पश्चिमी हिंदी                    1. खड़ी बोली
                                                                2. ब्रजभाषा

                                                                3. हरियाणी

                                                                4. बुंदेली

                                                                5. कन्नौजी

                                                                6. निमाड़ी


                               राजस्थानी                      1. मारवाड़ी
                                                                2. जयपुरी
                                                                3. मेवाती
                                                                4. मालवी

                                पहाड़ी                        1. पश्चिमी पहाड़ी
                                                               2. मध्यवर्ती पहाड़ी
                                                                (कुमाऊँनी-गढ़वाली)

        मागधी                  बिहारी                      1. भोजपुरी
                                                              2. मगही
                                                              3. मैथिली


       अर्धमागधी               पूर्वी हिंदी                   1. अवधी
                                                              2. बघेली
                                                              3. छत्तीसगढ़ी

     

    अपने विस्तृत अर्थ में हिंदी उपर्युक्त सभी बोलियों के सम्मिलित रूप का नाम है। विस्तृततम अर्थ में इसमें 'उर्दू' को भी शामिल किया जाता है। जार्ज ग्रियर्सन पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी को ही हिंदी मानने के पक्षधर थे। इससे पहले उन्होंने सिर्फ़ पश्चिमी हिंदी की पाँच बोलियों को ही हिंदी माना था परंतु बाद में उन्होंने अपने मत में संशोधन कर लिया। डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने The language of India में हिंदी की दो उपशाखाएँ मानीं थीं—1. आज की परिनिष्ठित हिंदी अर्थात कौरवी (खड़ी बोली) और हरियाणी बोली तथा 2. ब्रजभाषा, कन्नौजी और बुंदेली। हिंदी का एक संकुचिततम अर्थ भी है और वह है खड़ी बोली हिंदी पर आधारित परिनिष्ठित हिंदी। यह हिंदी का वह रूप है जो समस्त हिंदी भाषी क्षेत्र में शिक्षा का माध्यम है और जिसे भारतीय संविधान में राजभाषा हिंदी का स्थान भी दिया गया है। यही हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा भी कहलाती है। गोपाल राय के शब्दों में, “आज व्यावहारिक रूप में ‘हिंदी’ का अर्थ खड़ी बोली पर आधारित आधुनिक परिनिष्ठित हिंदी हो गया है।”

     

    स्पष्ट है कि व्यावहारिक दृष्टि से खड़ी बोली पर आधारित परिनिष्ठित हिंदी ही ‘हिंदी’ कही जा सकती है। शुद्ध भाषावैज्ञानिक दृष्टि से सत्रह या अठारह बोलियाँ हिंदी की बोलियाँ कहलाने की अधिकारिणी हैं।

     

    (ख) हिंदी का आरंभिक रूप

     

    'हिंदी का आरंभिक रूप' में हिंदी तथा आरंभिक दोनों पदों की व्याख्या अपेक्षित है। यहाँ हिंदी का तात्पर्य मानना चाहिए 'हिंदी परिवार' अर्थात खड़ी बोली, राजस्थानी मैथिली, अवधी आदि बोलने वाले पूरे हिंदी भाषी क्षेत्र की भाषाएँ। 'आरंभिक' से किसी समय सीमा का बोध नहीं होना होता तथापि सामान्यतः 'तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी तक की भाषा को हिंदी का आरंभिक रूप माना जा सकता है। पर सत्य तो यह है कि इस काल तक हिंदी की जो भी रचनाएँ मिलती हैं, उनमें मौलाना दाउद के चंदायन को छोड़कर शेष सभी रचनाएँ या तो नोटिस मात्र हैं अथवा अप्रामाणिक। ये रचनाएँ मौखिक परंपरा में आगे बढ़ीं। स्वभावतः कालक्रमानुसार इनमें परिवर्तन भी आता गया होगा अतः इनके वास्तविक रूप का निर्धारण कठिन कार्य है। फिर यह भी सत्य है कि साहित्यिक और जनसामान्य द्वारा प्रयुक्त मौखिक भाषा में अंतर होता है। इतना होने पर भी इन रचनाओं से कुछ ऐसे संकेत अवश्य मिलते हैं जो उस हिंदी भाषा का संबंध 'अपभ्रंश' से जोड़ते हैं।

     

    अपभ्रंश शब्द का सबसे पहला प्रयोग छठी शताब्दी में प्राकृत वैयाकरण चंड की रचना 'प्राकृत लक्षणम्' में मिलता है। इसी शताब्दी में भामह ने भी 'काव्यालंकार' में अपभ्रंश का उल्लेख किया है। सातवीं शताब्दी के अंत में दंडी ने 'काव्यादर्श' में अपभ्रंश साहित्य को आभीर आदि की भाषा कहा है। लगता है कि इस काल तक अपभ्रंश साहित्य की भाषा बन चुकी थी। पर साथ ही जनसामान्य की भाषा के रूप में इसके अनेक रूपों का विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलन रहा होगा जिन्हें आज की हिंदी की विभिन्न बोलियों का उत्स कहा जा सकता है। विद्वानों का मत है कि देश के विभिन्न भागों में, जिनमें गुजरात से लेकर गौड़ और कलिंग तक का क्षेत्र शामिल था, अनेक भाषाएँ बोली जाती थीं जिनका सामूहिक नाम अपभ्रंश था। (गोपालराय) तथापि पश्चिमी और पूर्वी भारत में रचित साहित्य की भाषा में पर्याप्त अंतर है इसीलिए विद्वानों ने अपभ्रंश के पश्चिमी और पूर्वी भेद किए हैं। पश्चिमी में आठवीं शताब्दी के स्वयंभू को छोड़ दें तो फिर दसवीं शताब्दी में अपभ्रंश साहित्य उपलब्ध होता है जो लगभग चौदहवीं शताब्दी तक चलता है। पूर्व में सबसे पहले सरहपा (आठवीं शताब्दी) का 'दोहा कोश' और 'चर्या गीत' मिलते हैं। उसके पश्चात शबरपा (780 ई.), भुसुकपा (800 ई.), कण्हपा (840 ई.), महीपा (870 ई.) तिलोपा (950 ई.) और शांतिपा (1000 ई.) आदि सिद्धों की ही रचनाएँ मिलती हैं। दसवीं शताब्दी के पश्चात इनकी रचनाएँ उपलब्ध नहीं होतीं।

     

    स्पष्ट है कि छठी शताब्दी में 'अपभ्रंश' शब्द का प्रयोग 'भाषा' के अर्थ में मिलने लगता है। परंतु उस समय का कोई साहित्य अर्थात भाषा का कोई रूप उपलब्ध नहीं है। अपभ्रंश की रचनाओं के प्रथम उदाहरण स्वयंभू और सरहपा की रचनाओं में ही मिलते हैं। यद्यपि इन दोनों ने ही अपनी रचनाओं के संदर्भ में 'अपभ्रंश' शब्द का उल्लेख नहीं किया है। स्वयंभू ने अवश्य एक स्थान पर 'अवहत्थ' शब्द का प्रयोग किया है जो 'अपभ्रंश' का रूपांतर हो सकता है। स्वयंभू ने अपनी भाषा को 'सायाण भास' अर्थात 'सामान्य भाषा', 'गामेल्ल भाष' अर्थात 'ग्रामीण भाषा' और 'देसी भाषा' कहा है, परंतु उसे उन्होंने 'संस्कृत-प्राकृत' से अलंकृत किया है। स्वयंभू 'कोसल' के थे अतः उनकी भाषा मध्यदेश की भाषा हो सकती है पर वह वास्तव में 'अलंकृत ग्रामीण भाषा' है। इससे इतना तो स्पष्ट है कि अपभ्रंश उस समय बोली के रूप में जीवित भाषा थी। सरहपा का मूल स्थान राहुल सांकृत्यायन ने 'मगध' माना है। सरहपा की भाषा अपने क्षेत्र की बोली के निकट है। जहाँ स्वयंभू की भाषा प्राकृत के बोझ से दबी हुई है, सरहपा की भाषा तत्कालीन सहज प्रयोग की भाषा है। इन दोनों की रचनाओं में व्याकरणगत अंतर भी है पर अधिक अंतर शब्द-चयन का है। सरहपा ने अपनी बोली के शब्दों का प्रयोग किया है।

     

    आठवीं शताब्दी और उसके पहले जिस भाषा का प्रयोग होता था उसके लिए आठवीं शताब्दी तक अवहत्थ, अवव्भंश, अवहंस, देशी भाषा आदि नाम प्रचलन में आ गए थे। पुष्पदंत (दसवीं शताब्दी) ने अपनी भाषा को 'अवहंस' कहा तो ग्यारहवीं शताब्दी में मैं' अद्दहमाण' (अब्दुल रहमान) ने अपनी भाषा को 'अवहट्ठ' कहा। चौदहवीं शताब्दी में ज्योतिरीश्वर ठाकुर और विद्यापति ने भी 'अवहट्ठ' शब्द का प्रयोग किया है।

     

    चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' ने विक्रम की सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक की भाषा को अपभ्रंश और परवर्ती अपभ्रंश को 'पुरानी हिंदी' कहा। वे लिखते हैं, विक्रम की सातवीं शताब्दी से ग्यारहवीं तक अपभ्रंश की प्रधानता रही और वह पुरानी हिंदी में परिणत हो गई। 'पुरानी हिंदी' की विशेषताएँ बताते हुए उन्होंने लिखा है इसमें देशी की प्रधानता है। विभक्तियाँ घिस गई हैं, खिर गई हैं, एक ही विभक्ति हँ या आहँ कई काम देने लगी है। एक कारक की विभक्ति से दूसरे का भी काम चलने लगा है। वैदिक भाषा की अविभक्तिक निर्देश की विरासत इसे भी मिली। विभक्तियों के खिर जाने से कई अव्यय या पद लुप्तविभक्तिक पद के आगे रखे जाने लगे, जो विभक्तियाँ नहीं हैं। क्रिया पदों में मार्जन हुआ। हाँ, इसने केवल प्राकृत ही के तद्भव और तत्सम पद नहीं लिए, किंतु अपुत्रा धनवती मौसी से भी कई तत्सम पद लिए। गुलेरी जी के अनुसार पुरानी अपभ्रंश संस्कृत और प्राकृत में मिलती हैं और परवर्ती अपभ्रंश पुरानी हिंदी से। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि अपभ्रंश कहाँ समाप्त होती है और पुरानी हिंदी कहाँ आरंभ होती है, इसका निर्णय करना कठिन, किंतु रोचक और बड़े महत्त्व का है। इन दो भाषाओं के समय और देश के विषय में कोई स्पष्ट रेखा नहीं खींची जा सकती। कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जिन्हें अपभ्रंश भी कह सकते हैं और पुरानी हिंदी भी। गुलेरी जी ने अपभ्रंश के उद्धरण देकर यह सिद्ध किया है कि किस प्रकार मात्र लेखन शैली में परिवर्तन कर देने से अपभ्रंश 'पुरानी हिंदी' हो जाती है।

     

    गुलेरी जी हेमचंद्र द्वारा उद्धृत दोहों की भाषा को शौरसेनी पर आधारित अपभ्रंश या 'पुरानी हिंदी' मानते हैं और उनका रचनाकाल ई. सन् 972-1142 निर्धारित करते हैं। इसके साथ ही वे राजा मुंज को 'पुरानी हिंदी' का कवि मानते हैं जो ई. सन् की दसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में विद्यमान था।

     

    गुलेरी जी ने ग्यारहवीं शताब्दी तक की अपभ्रंश की अपभ्रंश माना। परंतु जैसा कि हम देख चुके हैं आठवीं शताब्दी तक सिर्फ़ स्वयंभू और सरहपा की रचनाएँ ही मिलती हैं। इसके बाद भी जैन कवियों में सिर्फ़ देवसेन, पुष्पदंत और नयनंदी ही इस समय सीमा में आते हैं। सिद्ध कवियों की भाषा में तो वे सभी विशेषताएँ उपलब्ध हैं ही जिन्हें गुलेरी जी ने 'पुरानी हिंदी' की विशेषताएँ माना है। इसी आधार पर तो सरहपा को हिंदी का पहला कवि तक कहा जाता है।

     

    अतः मात्र तीन-चार कवियों के आधार पर तत्कालीन भाषा को 'पुरानी हिंदी' से अलग रखना उचित नहीं जान पड़ता। गुलेरी जी ने 'ग्यारहवीं से चौदहवीं' शताब्दी तक के जैन कवियों की भाषा के संबंध में कुछ विशेष तो नहीं कहा पर तार्किक आधार पर वह भी पुरानी हिंदी ही सिद्ध होती है, भले ही उनमें एकाध का झुकाव प्राकृत की ओर हो। इस संदर्भ में राहुल सांकृत्यायन का मत विशेष रूप से द्रष्टव्य है। 'हिंदी काव्यधारा' की अवतरणिका में उन्होंने अपभ्रंश को स्पष्ट रूप से हिंदी कहा है—वह (अपभ्रंश) उससे भी कहीं अधिक हिंदी भाषा है जितनी की आज की मालवी, मारवाड़ी, मल्ली (भोजपुरी) और मैथिली। गुलेरी जी ने लगभग यही बात कही थी। अंतर मात्र यह है कि सांकृत्यायन जी ने उसे हिंदी कहा है और गुलेरी जी ने 'पुरानी हिंदी'।

     

    राहुल जी अपभ्रंश को छांदस् (संस्कृत), पालि और प्राकृत से भिन्न मानते हैं। पालि और प्राकृत प्रायः संस्कृत का अनुकरण करती हैं पर अपभ्रंश में ऐसा नहीं है। वे लिखते हैं, यहाँ आकर भाषा में असाधारण परिवर्तन हो गया। उसका ढाँचा ही बिल्कुल बदल गया, उसने नए सुबंतों, तिङन्तों की सृष्टि की और ऐसी सृष्टि की है जिससे वह हिंदी से अभिन्न हो गई है, और संस्कृत-पालि-प्राकृत से अत्यंत भिन्न। 'कहेउ', 'गयउ', 'गउ', 'कहिज्जइ' ये शब्द बतलाते हैं कि अपभ्रंश का स्थान हिंदी के पास होना चाहिए या संस्कृत, पालि, प्राकृत के पास। वस्तुतः संस्कृत से पालि और प्राकृत तक का भाषा-विकास क्रमिक या अविच्छिन्न-प्रवाहयुक्त हुआ, मगर आगे वह क्रमिक विकास नहीं, बल्कि विच्छिन्न-प्रवाहयुक्त विकास जाति-परिवर्तन हो गया।

     

    यह ध्यान रखना आवश्यक है कि साहित्यिक भाषा और बोलचाल की भाषा में अंतर होता है। प्रारंभ से चौदहवीं शताब्दी के अंत तक जनसामान्य की भाषा का कोई रूप और उसके क्षेत्र का कोई परिचय उपलब्ध नहीं है। जो भाषाएँ आज हिंदी क्षेत्र में बोली जा रही हैं उनका कोई न कोई पूर्व रूप तो जनसामान्य में अवश्य ही रहा होगा। संभवतः इसी पूर्व रूप को भरतमुनि ने 'देशी भाषा' कहा होगा। छठी शताब्दी के आस-पास उसमें साहित्य-रचना भी प्रारंभ हुई होगी। पर वह भी आज उपलब्ध नहीं है। संभव है कि इस साहित्यिक भाषा को अपभ्रंश नाम दे दिया गया हो, यद्यपि सरहपा और स्वयंभू दोनों में से किसी ने भी अपनी भाषा को 'अपभ्रंश' नहीं कहा। यह भी निश्चित है कि तत्कालीन 'अपभ्रंश' संस्कृत, पालि, प्राकृत की अपेक्षा जन सामान्य के निकट थी और संभवतः तत्कालीन कवियों ने स्थानीय प्रयोगों को महत्त्व देते हुए इन्हीं भाषा-शैलियों को अपना लिया होगा। पर ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक आते-आते यह साहित्यिक अपभ्रंश प्राकृत के प्रभाव को कम करती हुई जनसामान्य के निकट आने लगी। 'संदेश रासक' और 'प्राकृत पैंगलम' के कुछ छंद इसके उदाहरण हैं। ऐसी स्थिति में यही उचित प्रतीत होता है कि पूर्ववती अपभ्रंश, परवर्ती अपभ्रंश, अवह‌ट्ठ आदि अलग-अलग नाम देने के स्थान पर संपूर्ण अपभ्रंश भाषा को हिंदी कहना चाहिए और अपभ्रंश साहित्य को हिंदी साहित्य।

     

    आजकल एक अन्य पारिभाषिक पद 'प्रारंभिक हिंदी' भी देखने में आ रहा है। इस संबंध में गोपाल राय लिखते हैं, इसका कारण है सिंघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में हिंदी के पाठक्रम में 'अर्ली हिंदी' अँग्रेज़ी पद का प्रयोग। हिंदी में इसका अनुवाद 'प्रारंभिक हिंदी' तो सटीक है पर कभी-कभी 'पुरानी हिंदी' और 'प्रारंभिक हिंदी' का पर्यायवाची पदों के रूप में प्रयोग होता है, जिससे भ्रम पैदा होता है। वस्तुतः 'पुरानी हिंदी' पद 'अपभ्रंश' (या दसवीं शताब्दी के बाद की अपभ्रंश) का द्योतक है। 'प्रारंभिक हिंदी' पद अब तक सुपरिभाषित नहीं है। मेरे विचार से इसके अंतर्गत मोटा मोटी रूप से 1450 ई. के पूर्व रचित अवधी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली, मैथिली और पिंगल की रचनाएँ रखी जानी चाहिए। इस प्रकार की पहली रचना ग्यारहवीं शताब्दी में रचित रोडा कृत राउरबेल है, जिसमे अवधी और टक्की (आधुनिक खड़ीबोली) में काव्यरचना के प्रथम उदाहरण मिलते हैं। खड़ीबोली में काव्य रचना के प्रारंभिक प्रयास शेख फ़रीद शकरगंज (1173-1265 ई.), अमीर ख़ुसरो (1253-1325 ई.), महाराष्ट्र के दामोदर पंडित संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर और गोंदा बाई तथा प्रसिद्ध सूफी संत शेख सरफुद्दीन अली कलंदर आदि की रचनाओं में देखे जा सकते हैं। पर भाषा की दृष्टि से इन रचनाओं की प्रामाणिकता संदिग्ध है। दक्खिनी हिंदी के प्रथम कवि सूफ़ी संत ख़्वाजा बंदा नवाज़ गेसूदराज की रचनाएँ भी 'प्रारंभिक हिंदी' की उदाहरण मानों जा सकती हैं, यद्यपि उनका लेखन काल 1412-1437 ई. है। भाषा की दृष्टि में गेसूदराज की रचनाएँ प्रामाणिक मानी जा सकती हैं। इस बात की पूरी संभावना है कि 1450 ई. के पूर्व कबीरदास ने भी कमोबेश मात्रा में रचनाएँ की हों, पर उनका प्रामाणिक पाठ आज उपलब्ध नहीं है, अतः भाषा की दृष्टि से हिंदी के स्वरूप निर्धारण में उनसे कोई सहायता मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती

     

    1450 ई. से पूर्व ब्रजभाषा में रचित काव्य भी विरल और भाषा की दृष्टि से पूर्णतः विश्वसनीय नहीं है। चालुक्य नरेश सोमेश्वर (1127 ई.) और महानुभाव पंथ के आचार्य चक्रधर (1194 ई. के लगभग) की तथाकथित ब्रजभाषा रचनाएँ प्रामाणिक पाठ की दृष्टि से विश्वसनीय नहीं मानी जा सकतीं। अमीर ख़ुसरो के ब्रजभाषा छंद भी प्रामाणिक पाठ की दृष्टि से संदिग्ध हैं और उनकी संख्या भी अधिक नहीं है। संत नामदेव (1270-1350 ई.) और उनके समकालीन त्रिलोचन ने भी ब्रजभाषा में वि कुछ पद लिखे थे। अग्रवाल कवि ने 1354 ई. में 'प्रद्युम्न चरित्र' नामक काव्यग्रंथ की रचना की थी। इसी प्रकार सधना और स्वामी रामानंद (दोनों का आविर्भाव काल अनुमानतः चौदहवीं शताब्दी) की भी कुछ ब्रजभाषा रचनाएँ मिलती हैं।

     

    वस्तुतः हिंदी की यदि बात करें तो परवर्ती काल में दामोदर पंडित के 'उक्ति-व्यक्ति प्रकरण', मुल्ला दाऊद कृत 'चंदायन' अथवा 'चांदायन' और विद्यापति की मैथिल रचनाओं को ही प्रारंभिक हिंदी की प्रामाणिक रचनाएँ स्वीकार किया जा सकता है। इनमें उक्ति-व्यक्ति प्रकरण की भाषा से तत्सम शब्दावली के प्रयोग की बढ़ती हुई प्रवृत्ति का पता चलता है। यह भी ज्ञात है कि इस काल में व्याकरणिक स्थिरता आनी प्रारंभ हो गई थी। विद्यापति की रचनाओं में सरलता एवं सरसता है, यद्यपि वह एक सीमा तक 'ब्रजबुलि' की ओर झुकी हुई है। 'चंदायन' तत्कालीन अवधी का अच्छा उदाहरण है।

     

    इस प्रकार, यद्यपि हिंदी के आरंभिक रूप की कोई निर्धारित समय-सीमा नहीं है तथापि सामान्यतः हम इसका काल विक्रमी की पंद्रह शताब्दी मान सकते हैं। इस दृष्टि से उपर्युक्त हिंदी को हिंदी का आरंभिक रूप कहा जा सकता है। पुरानी हिंदी (हिंदी) और प्रारंभिक हिंदी को पर्याय नहीं माना जा सकता, पर हिंदी के आरंभिक रूप में इन दोनों का सहज समावेश संभव है।

     

    (ग) हिंदी शब्द का अर्थ एवं प्रयोग

     

    (क) हिंदी और उसका अर्थ

     

    'हिंदी' का संबंध मूलतः 'हिंद' अथवा 'हिंदू' आदि शब्दों से है। 'हिंद' अथवा 'हिंदू' की अनेक व्युत्पत्तियाँ मिलती हैं। कुछ संस्कृत पंडित इसे 'हिन्' (नष्ट करना) 'दु' (दुष्ट) अर्थात 'दुष्टों' को नष्ट करने वाला मानते हैं तो कुछ की दृष्टि में इसकी व्युत्पत्ति है—'हीन' + 'दु' अर्थात् 'हीनों' (मलेच्छों) का दलन करने वाला। शब्द कल्पद्रुम' में 'हिंदू' को 'हीन + दुष् + डु' अर्थात् 'हीनों को दूषित करने वाला' माना गया है। इसकी एक व्युत्पत्ति 'यो हिंसायाः दूयते, सः हिंदू' की गई है अर्थात् हिंसा को देखकर दुखी होने वाले हिंदू हैं।

     

    उपर्युक्त सभी व्युत्पत्तियाँ कल्पना मात्र हैं। वास्तविकता यह है कि मूलतः यह शब्द 'हिंदू' न होकर सं. 'सिंधु' है। 'सिंधु' शब्द भी संस्कृत का नहीं है। डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार यह द्रविड़ भाषाओं का' सिद्' है जो आर्यों के आगमन के पश्चात् संस्कृतीकरण की प्रवृत्ति के कारण 'सिंधु' हो गया है। पश्चिमोत्तर भारत की नदी विशेष और उसके आसपास के क्षेत्र को 'सिंधु' कहा जाता है। भारत के ईरान से प्राचीन व्यापारिक संबंधों के प्रमाण अत्यंत पुष्ट हैं। ईरानियों ने यहाँ आने पर 'सिंधु' को 'हिंदु' रूप में उच्चरित किया क्योंकि हमारी 'स' ध्वनि वहाँ सदैव 'ह' (सप्त-हफ़्त) और महाप्राण ध्वनियाँ अल्पप्राण रूप में उच्चरित होती रही हैं। प्रारंभ में ईरानियों ने सिंधु नदी और आसपास के क्षेत्र को 'हिंदु' कहा। धीरे-धीरे वे भारत के जितने भू-भाग से परिचित होते गए, उसे 'हिंदु' कहने लगे और अंततः 'हिंदु' शब्द पूरे भारत का वाचक हो गया। अंत्य 'उ' के लोप से यह 'हिंद' हुआ और इसमें 'इक' प्रत्यय के योग से 'हिंदीक' बना जिसका अर्थ है 'हिंद का'। यह 'हिंदीक' ही 'क' के लोप से 'हिंदी' बना और संज्ञा अथवा विशेषण रूप में अनेक अर्थों-मलमल, एक विशेष प्रकार की तलवार, काला, डाकू, हिंद का-में प्रचलित रहा।

     

    'भाषा' के अर्थ में 'हिंदी' शब्द का प्रारंभिक प्रयोग भी फारस और अरब में ही छठी शताब्दी ई.पू. से मिलता है। भारत में भी इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम मुसलमानों द्वारा ही किया गया। मुसलमानों का संबंध मूलतः मध्य देश से था अतः इस क्षेत्र की भाषा को उन्होंने 'जबाने हिंदी' अथवा 'हिंदी जबान' कहा।

     

    प्रारंभ में इसका प्रयोग मुसलमानों की 'हिंदवी' के लिए हुआ। फिर यह 'हिंदवी' अथवा 'दक्खिनी' का समानार्थी हो गया।

     

    मुग़ल काल में 'हिंदी' 'हिंदवी भाषा' और 'हिंदुस्तानी' शब्द पर्यायवाची थे। मुसलमान लेखक अधिकतर 'हिंदी' और 'हिंदवी' का, हिंदू कवि 'भाषा' का और यूरोपीय यात्री, पादरी आदि 'हिंदुस्तानी' का प्रयोग करते थे। (माताबदल जायसवाल)

     

    सन् 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना के बाद सन् 1812 में कैप्टेन टेलर ने कॉलेज का वार्षिक विवरण प्रस्तुत करते समय 'हिंदी' शब्द का प्रयोग आधुनिक अर्थ में संभवतः पहली बार किया। तत्पश्चात् 1824 ई. में विलियम् प्राइस ने अपने को सर्वप्रथम 'हिंदी प्रोफ़ेसर' लिखा और ब्रजभाषा, खड़ी बोली, हिंदवी, हिंदुई, ठेठ हिंदी आदि नामों के स्थान पर 'हिंदी' नाम को चुना। (माता बदल जायसवाल) उसके बाद से यह हिंदी शब्द वर्तमान अर्थ में प्रयुक्त हो रहा है।

     

    (आ) हिंदी का अर्थ

    भारोपीय भाषा-परिवार से विकसित हिंदी का उद्भव शौरसेनी, मागधी तथा अर्धमागधी अपभ्रंश से स्वीकार किया जाता है। इन अपभ्रंशों से पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, पहाड़ी, बिहारी तथा पूर्वी हिंदी का विकास हुआ। पश्चिमी हिंदी में मुख्य रूप से हरियाणी, खड़ी बोली, ब्रजभाषा, बुंदेली तथा कन्नौजी बोलियाँ आती हैं। कुछ विद्वान् निमाड़ी को भी इसी में स्थान देते हैं। डॉ. भोलानाथ तिवारी तो ताजुज़्बेकी को भी पश्चिमी हिंदी की बोली मानते हैं। 'राजस्थानी' की बोलियाँ हैं—मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती और मालवी। 'पहाड़ी' में 'पश्चिमी पहाड़ी' तथा 'मध्यवर्ती पहाड़ी' आती हैं। 'बिहारी' की बोलियाँ हैं भोजपुरी, मगही और मैथिली, जबकि पूर्वी हिंदी में अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी बोलियों की गणना की जाती है।

     

    हिंदी के संबंध में प्रमुख रूप से पाँच मत प्रचलित हैं—

     

    1. अपने विस्तृत अर्थ में हिंदी उपर्युक्त सभी बोलियों (ताजुज़्बेकी को छोड़कर) के सम्मिलित रूप का नाम है। सामान्य भारतीय, चाहे वह उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम किसी भी दिशा से संबंध रखता है, इन सब को मिलाकर हिंदी शब्द का प्रयोग करता है। इस हिंदी के प्रयोक्ताओं की संख्या विश्व में अँग्रेज़ी तथा चीनी के बाद सर्वाधिक है। गोपाल राय के अनुसार, हिंदी के प्रायः सभी भाषाविज्ञानी 'भाषावैज्ञानिक' कुसौटी पर 'हिंदी' का प्रसार पश्चिम में हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्व में इलाहाबाद, प्रतापगढ़ और फ़ैज़ाबाद ज़िले तक तथा उत्तर में नेपाल की तराई से लेकर दक्षिण में रायपुर-खंडवा तक मानते हैं। पर 'व्यावहारिक' रूप में 'राजस्थानी', 'पहाड़ी' और 'बिहारी' उपवर्ग की भाषाओं को भी 'हिंदी' की उपभाषाएँ मानने का आग्रह किया जाता है। डॉ. रामविलास शर्मा ने 'हिंदी' को राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश की 'जातीय भाषा' और यहाँ की भाषाओं/बोलियों को 'हिंदी' की उपभाषाएँ मानने का तर्क पेश किया है भारतीय सविधान और उससे निर्देशित योजनाओं में भी इस क्षेत्र के निवासियों की 'मातृभाषा' हिंदी मान ली गई है। राजभाषा नियम 1976 यथासंशोधित, 1987) में भाषा की दृष्टि से समस्त भारत को चार क्षेत्रों में बाँटते हुए एक क्षेत्र के अंतर्गत बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली तथा अंडमान निकोबार द्वीपसमूह को रखा गया है। और यह माना गया है कि यहाँ की भाषा 'हिंदी' है। डॉ. भोलानाथ तिवारी लिखते हैं, हिंदी साहित्य के इतिहास में इस सभी बोलियों से प्राप्त साहित्य (जैसे डिंगल, ब्रज, खड़ी बोली, अवधी, मैथिली आदि) समाहित मिलता है। 'हिंदी' का यह बहुप्रचलित अर्थ है।

     

    2. अपने विस्तृततम अर्थ में 'हिंदी' में 'उर्दू' की भी गणना की जाती है। भाषा वैज्ञानिक नियमों के अनुसार 'उर्दू' हिंदी की ही एक शैली है, कोई पृथक भाषा नहीं। इसलिए भाषा के मूल तत्त्वों और व्याकरणिक समानता के आधार पर 'उर्दू' को भी 'हिंदी' में शामिल किया जाता है।

     

    3. 'भारत का भाषा सर्वेक्षण' में जार्ज ग्रियर्सन ने केवल पश्चिमी हिंदी की पाँच-हरियाणी, खड़ी बोली, ब्रजभाषा, बुंदेली तथा कन्नौजी तथा पूर्वी हिंदी की तीन-अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी को ही हिंदी को बोलियाँ माना। डॉ. भोलानाथ तिवारी इसमें 'निमाड़ी' को भी स्थान देते हैं। प्रो. सावित्री सिन्हा तथा रामदरश मिश्र भी पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी को ही हिंदी मानते हैं परंतु वे 'भोजपुरी' की गणना भी पूर्वी हिंदी के अंतर्गत ही करते हैं। अधिकांश भाषावैज्ञानिक ग्रियर्सन के मत से सहमत हैं। भोलानाथ तिवारी के शब्दों में, शुद्ध भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से हिंदी शब्द का यह अर्थ अशुद्ध नहीं कहा जा सकता।

     

    4. जॉर्ज ग्रियर्सन ने पहले सिर्फ़ पश्चिमी हिंदी अर्थात् पश्चिमी हिंदी की पाँच बोलियों को ही हिंदी माना था परंतु बाद में उन्होंने अपने मत में संशोधन कर लिया। डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने The language of India में हिंदी की दो उपशाखाएँ मानी थीं—1. आज की परिनिष्ठित हिंदी अर्थात कौरवी (खड़ी बोली) और हरियाणी बोली तथा 2. ब्रजभाषा, कन्नौजी और बुंदेली।

     

    5. हिंदी का एक संकुचिततम अर्थ भी है और वह है खड़ी बोली हिंदी पर आधारित परिनिष्ठित हिंदी। यह हिंदी का वह रूप है जो समस्त हिंदी भाषी क्षेत्र में शिक्षा का माध्यम है और जिसे भारतीय संविधान में राजभाषा हिंदी का स्थान भी दिया गया है। यही हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा भी कहलाती है। गोपाल राय के शब्दों में, आज व्यावहारिक रूप में 'हिंदी' का अर्थ खड़ी बोली पर आधारित आधुनिक परिनिष्ठित हिंदी हो गया है।

     

    स्पष्ट है कि व्यावहारिक दृष्टि से खड़ी बोली पर आधारित परिनिष्ठित हिंस ही 'हिंदी। कही जा सकती है। शुद्ध भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से पश्चिमी और पूर्वी हिंदी को हिंदी करेंगे जबकि भौगोलिक दृष्टि से सत्रह या अठारह बोलियाँ हिंदी की बोलियाँ कहलाने की अधिकारिणी हैं।

     

    (ख) हिंदी का उद्भव और विकास

     

    (अ) हिंदी का उद्भव

     

    हिंदी भाषा का संबंध संस्कृत और इस कारण भारोपीय भाषा-परिवार से है। भारोपीय परिवार को इंडोकेल्टिक, इंडोजर्मनिक, आर्य आदि नामों से भी जाना जाता है। भारोपीय परिवार की भाषाओं को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है—केंतुम और सतम्। यद्यपि इस नामकरण का कोई तार्किक आधार नहीं है, तथापि आज ये इसी नाम से जाने जाते हैं। केंतुम वर्ग में ग्रीक, लैटिन, जर्मन, अँग्रेज़ी, फ़्रांसीसी आदि भाषाएँ आती हैं। सतम् को पुनः तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है—रूसी, आर्मीनियम तथा भारत-ईरानी। संस्कृत का विकास भारत-ईरानी की भारतीय शाखा से हुआ है। भारोपीय परिवार की विभिन्न भाषाओं के विकास को वृक्ष रूप में इस प्रकार प्रस्तुत कर सकते हैं।

     

    ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से भारतीय आर्य भाषा को तीन कालों में बाँट सकते हैं—

     2

    1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषा (2000 ई.पू. से 500 ई. पू.)

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    2. मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा (500 ई. पू. से 1000 ई.)

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    53.आधुनिक भारतीय आर्य भाषा (1000 ई. से...)

     

    3. आधुनिक भारतीय आर्य भाषा—प्राचीन आर्य काल में ही संस्कृत के तीन क्षेत्रीय रूप दिखाई देने लगे थे—पुश्चिमोत्तरी, मध्यवर्ती और पूर्वी। मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं के विकास की दृष्टि से पालि के समय में दक्षिणी का विकास हुआ और इनकी संख्या चार हो गई। प्राकृत काल में इन क्षेत्रीय रूपों की संख्या बढ़कर सात हो गई। अपभ्रंश काल में इन क्षेत्रीय रूपों की विशिष्टताएँ और बढ़ गई। आज विद्वान इन्हीं क्षेत्रीय रूपों के आधार पर अपभ्रंश के सात रूपों की चर्चा करते हैं। अपभ्रंश के इन्हीं रूपों से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का विकास हुआ है।

     

    प्राकृत का क्षेत्रीय रूप     अपभ्रंश               आधुनिक आर्य भाषा/उपभाषा

    शौरसेनी                     शौरसेनी               गुजराती, राजस्थानी, पश्चिमी हिंदी,
                                                          पहाड़ी
    कैकेय                       कैकेय                  लहँदा
    टक्क                        टक्क                   पंजाबी
    ब्राचड                       ब्राचड                   सिंधी
    महाराष्ट्री                    महाराष्ट्री                 मराठी
    मागधी                      मागधी                   बिहारी, बंगाली, उड़िया, असमिया
    अर्धमागधी                  अर्धमागधी               पूर्वी हिंदी

     

    इस प्रकार हिंदी का विकास शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी अपभ्रंशों से पाँच उपभाषाओं पश्चिमी हिंदी, पहाड़ी, राजस्थानी, बिहारी और पूर्वी हिंदी के रूप में हुआ। इन उपभाषाओं से विभिन्न बोलियाँ विकसित हुईं। प्रायः हिंदी बोलियों की संख्या सत्रह मानी जाती है, परंतु कुछ विद्वान इनकी संख्या अठारह अथवा उन्नीस तक भी पहुँचा देते हैं। हिंदी की उपभाषाओं से विकसित बोलियाँ इस प्रकार हैं—

     

    अपभ्रंश                  उपभाषा                   बोलियाँ

    शौरसेनी                 पश्चिमी हिंदी                1. हरियाणी
                                                           2. खड़ी बोली
                                                           3. ब्रजभाषा
                                                           4. बुंदेली
                                                           5. कन्नौजी
                                                           6. निमाड़ी
                             राजस्थानी                   1. मारवाड़ी
                                                           2. जयपुरी
                                                           3. मेवाती
                                                           4. मालवी
                             पहाड़ी                       1. पश्चिमी पहाड़ी
                                                           2. मध्यवती पहाड़ी
                                                           (कुमाऊँनी-गढ़वाल)
    मागधी                  बिहारी                       1. भोजपुरी
                                                           2. मगही
                                                           3. मैथिली
    अर्धमागधी              पूर्वी हिंदी                    1. अवधी
                                                           2. बघेली
                                                           3. छत्तीसगढ़ी

     

    (घ) हिंदी का विकास

     

    हिंदी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश की राजधानी (मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी), पश्चिमी हिंदी (खड़ी बोली, ब्रजभाषा, हरियाणी, बुंदेली, कन्नौजी, निमाड़ी) पहाड़ी (पश्चिमी पहाड़ी, मध्यवर्ती पहाड़ी), मागधी अपभ्रंश की बिहारी (भोजपुरी, मगही, मैथिली) और अर्धमागधी अपभ्रंश की पूर्वी हिंदी (अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी) से हुआ है। इन अपभ्रंशों के उद्भव का संकेत इसी अध्याय में पहले किया जा चुका है। इन सभी बोलियों की ध्वनी, शब्द भंडार, व्याकरण, साहित्य आदि की दृष्टि से अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। परंतु हिंदी क्षेत्र में इनके अतिरिक्त एक अन्य भाषा रूप भी प्रचलित है, जिसका प्रचार इन सभी बोली-क्षेत्रों तक है जो आज पूरे हिंदी प्रदेश की संपर्क भाषा है, भारत की राष्ट्रभाषा है, जो अध्ययन-अध्यापन की भाषा है और जिसमें सभी बोली क्षेत्रों के लोग साहित्य-रचना कर रहे हैं। भाषा का यह रूप खड़ी बोली पर आधारित होते हुए भी उससे पर्याप्त भिन्न है। 

    हिंदी भाषा के विकास का सम्यक् विवेचन उसे तीन कालखंडों में विभाजित कर किया जा सकता है—

    1. प्रारंभिक अथवा आदिकाल (1000 ई.-1500 ई.)

    2. मध्यकाल (1500 ई.-1800 ई.)

    3. आधुनिककाल (1800 ई. -अद्यतन)

    किसी भा भाषा के विकास का अध्ययन मुख्य रूप से चार बिंदुओं के आधार पर किया जाता है—ध्वनि, व्याकरण, शब्द भंडार और साहित्य। इन आधारों पर हिंदी भाषा का विकास निम्नलिखित रूप में देखा जा सकता है।

     

    ध्वनि

    स्वर—अपभ्रंश में मुख्य रूप से आठ मूल स्वर थे—अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ। प्रारंभिक काल की हिंदी में दो स्वर और विकसित हो गए—ऐ, औ। ये दोनों संयुक्त स्वर थे, जिनका उच्चारण क्रमशः अएॅ तथा अओ था। डॉ. धीरेंद्र वर्मा ने वैदिक संस्कृत में ऐ तथा औ की स्थिति स्वीकार की है, तब इनका उच्चारण क्रमशः 'आई' तथा ' आउ' था। मध्यकाल में पूर्ववर्ती काल की तुलना में उदासीन स्वर, 'अ' का विकास हुआ। ए, ओ के कई रूपांतर भी इस काल में विकसित हुए। शब्दांत का मूल व्यंजन के बाद आने वाला 'अ' उच्चारण में लुप्त हो गया। कुछ स्थितियों में अक्षर के अंत में आने वाले 'अ' का लोप भी होने लगा। संयुक्त व्यंजन के पश्चात आने वाला 'अ' उच्चारण में यथावत बना रहा। 'ह' के पूर्व आने वाला' अ' कुछ-कुछ 'ए' जैसा उच्चरित होने लगा था। उस काल की कुछ पांडुलिपियों में यह 'ए' रूप में लिखा भी मिलता है। आधुनिककाल में अँग्रेज़ी से नई स्वर ध्वनि 'ऑ' को हिंदी ने ग्रहण किया है, यद्यपि अल्पशिक्षित और अशिक्षित वर्ग की भाषा में यह अभी भी 'आ' ही है। हिंदी प्रदेश के पश्चिमी भाग में संयुक्त स्वर 'ऐ' तथा 'औ' मूल स्वर के रूप में उच्चरित होने लगे हैं। पूर्वी हिंदी क्षेत्र में ये ध्वनियाँ अभी भी संयुक्त व्यंजन ही हैं। नैया, गैया, कौआ आदि शब्दों में पश्चिमी हिंदी तथा पूर्वी हिंदी दोनों में इनका उच्चारण संयुक्त स्वर अइ, अउ के रूप में होता है, यद्यपि धीरे-धीरे 'औ' पश्चिमी हिंदी में इन शब्दों में भी मूल स्वर का रूप ले रहा है। मध्यकाल में 'अ' का लोप शब्दांत में मूल व्यंजन के बाद और कुछ स्थितियों में अक्षरांत में होने लगा था। आधुनिक काल में अक्षरांत में 'अ' का लोप की प्रक्रिया पूर्ण हो गई है। शब्दांत में संयुक्त व्यंजन के बाद का 'अ' डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार पूर्णतः लुप्त हो गया है, परंतु अनेक वैयाकरण और भाषाविद अभी इसकी स्थिति एक सीमा तक स्वीकार करते हैं। इनके अतिरिक्त भी हिंदी में कई अन्य ध्वनियों को सुना जा सकता है। जैसे उ, इ, ए के जपित रूप भी इस काल में प्रयोग में आए हैं। कहीं-कहीं अर्ध विवृत्त दीर्घ ऐॅ (शेॅर), अर्धविवृत ह्रस्व पश्च स्वर 'ओॅ' (पुनि लेत सोॅई) अर्ध विवृत पश्च दीर्घ ओं (ऐसोॅ) आदि स्वर ध्वनियाँ भी सुनी जा सकती हैं। 'ऋ' लेखन में तो हिंदी में है परंतु उच्चारण के स्तर पर यह व्यंजन तथा स्वर का संयोग 'र् + इ' है

     

    व्यंजन—प्रारंभिक काल की हिंदी में मुख्य रूप से वही व्यंजन मिलते हैं जो अपभ्रंश में थे, परंतु इनमें कुछ अंतर अवश्य दृष्टिगत होते हैं। च्, छ्, ज्, झ् अपभ्रंश में और उसके पूर्व स्पर्श व्यंजन थे। इस काल में उच्चारण की दृष्टि से ये स्पर्श-संघर्षी हो गए। इसी प्रकार संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश की न्, ल्, स् ध्वनियाँ इस काल में वर्त्य हो गईं। डॉ. धीरेंद्र वर्मा के अनुसार दो अन्य ध्वनियाँ 'न्ह्' और 'म्ह्' इस काल में हिंदी में आईं। परंतु वास्तव में न्ह्, म्ह्, ल्ह्, अपभ्रंश काल से ही भाषा में प्रयुक्त हो रही हैं। यह अवश्य है कि वहाँ ये संयुक्त व्यंजन थे, इस काल में ये क्रमशः न्, म् ल्, के महाप्राण होकर मूल व्यंजन हो गए हैं। डॉ. धीरेंद्र वर्मा ने ‘ड़ू’ ‘ढ़ू’ तथा 'वू' को भी इसी काल में विकसित माना है। परंतु 'वू' का प्रयोग तो वैदिक काल से ही हो रहा था, यद्यपि आज इसका प्रयोग कहीं सुनाई नहीं देता। ड़ू तथा ढ़ू भी प्राकृत काल से ही प्रयोग में आ रहे हैं। तत्सम शब्दों के हिंदी में प्रयोग के कारण इस काल में 'श' का प्रयोग अपभ्रंश की तुलना में अधिक होने लगा था। संस्कृत तथा फ़ारसी शब्दों के आ जाने से कुछ नए संयुक्त व्यंजन भी हिंदी में आ गए।

     

    मध्ययुग में अरबी, फ़ारसी, तुर्की शब्दों के माध्यम से क़, ख़, ग़, ज़, फ़ ये पाँच नई ध्वनियाँ हिंदी में आ गईं। उच्च वर्ग के लोगों और फ़ारसी पढ़े-लिखे वर्ग में ये ध्वनियाँ विशेष रूप से प्रचलित थीं। सामान्य लोग अभी इनके स्थान पर क, ख, ग, ज, फ का प्रयोग ही करते थे। बिहारी उपभाषा के क्षेत्र में ङ् का महाप्राण रूप ‘ङ्ह्’ भी विकसित हुआ। च्, छ्, ज्, झ् का उच्चारण प्रारंभिक काल की तुलना में और अधिक वर्त्स्य हो गया। 'ञ्' का उच्चारण भी 'न्' के काफ़ी निकट हो गया। आधुनिक काल के प्रारंभिक वर्षों में तो क़, ख़, ग़, ज़, फ़ का हिंदी में पर्याप्त प्रचलन था। परंतु पिछले सौ वर्षों में अँग्रेज़ी का विशेष प्रचलन होने और उनमें क़, ख़, ग़ ध्वनियाँ न होने के कारण, विशेषतः स्वाधीनता के बाद क़, ख, ग़ के सही उच्चारण में कमी आई है। नई पीढ़ी तो इनका उच्चारण भूलती ही जा रही है। अँग्रेज़ी के प्रचलन के कारण ज़ और फ़ का उच्चारण अभी हो रहा है। कुछ संस्कृत शब्दों में 'म्' का प्रयोग भी होने लगा है, जैसे-संवाद (सम्वाद), संवेदना (संवेदना)। 'ञ्' का उच्चारण अब 'य्ँ' अथवा 'न्' जैसा होने लगा है। ङ् का प्रयोग भी बढ़ा है। पूर्वी क्षेत्र में मीटिंग, बाँग जैसे शब्दों का उच्चारण कुछ लोग मीटिङ्, बाङ् जैसा करते हैं। ङ् का महाप्राण कहीं-कहीं ङ्ह या ण्ह् जैसा उच्चरित होता है। 'व' ध्वनि मध्यकाल में द्वयोष्ट्य थी, परंतु अब धीरे-धीरे वह दंतोष्ठ्य होती जा रही है। 'ष' हिंदी क्षेत्र में लेखन में है, परंतु इसका उच्चारण 'श' होता है। ळ् का प्रयोग प्राकृत, अपभ्रंश से ही हिंदी में आया है, परंतु अपभ्रंश ळह् का प्रयोग हिंदी में कम होता है। तीनों कालों में संस्कृत, अरबी, फ़ारसी आदि के प्रभाव एवं भाषा के स्वाभाविक विकास के कारण कुछ ऐसे संयुक्त व्यंजनों, स्वरानुक्रमों और व्यंजनानुक्रमों के लोप की भी संभावना है, जो अपभ्रंश में थे। कुछ नए संयुक्त व्यंजन जैसे 'ड्र' भी हिंदी में आ गए हैं।

     

    व्याकरण

     

    प्रारंभिक काल की हिंदी अपने शुरुआती वर्षों में अपभ्रंश के समान थी, परंतु धीरे-धीरे इसमें से अपभ्रंश का प्रभाव कम होता गया। उदाहरणार्थ, अपभ्रंश एक सीमा तक संयोगात्मक भाषा थी और इसलिए उसके वाक्यों में पदक्रम बहुत निश्चित नहीं था। इसी प्रकार, संस्कृत का नपुंसक लिंग अपभ्रंश में पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ था। परंतु इस काल के अंत तक आते-आते हिंदी एक सीमा तक वियोगात्मक हो गई, फलतः उसका पदक्रम भी निश्चित होने लगा। हिंदी में सहायक क्रियाओं और कारक चिह्नों का प्रयोग बढ़ता गया। अपभ्रंश में जो नपुंसक लिंग दिखाई देता था, इस काल में पूर्णतः समाप्त हो गया। मध्यकाल में हिंदी की वियोगात्मकता और अधिक बढ़ गई, परिणामतः पदक्रम अधिक निश्चित हो गया। सहायक क्रियाओं और कारक चिह्नों का प्रयोग और बढ़ गया। उच्चवर्ग में फ़ारसी का प्रचार होने के कारण हिंदी की वाक्य-रचना पर फ़ारसी का प्रभाव पड़ने लगा। आधुनिक काल में हिंदी की वियोगात्मकता और बढ़ी है, यद्यपि हिंदी अभी भी पूर्णतः वियोगात्मक भाषा नहीं बनी है। पदक्रम भी पहले की तुलना में अधिक निश्चित हो गया है। हिंदी वाक्य-रचना मध्यकाल में फ़ारसी से प्रभावित हुई थी। आधुनिककाल में अँग्रेज़ी का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ है। अनुवाद के माध्यम से भी हिंदी अँग्रेज़ी के निकट आई है। इस कारण हिंदी वाक्य-रचना पर अँग्रेज़ी का पर्याप्त प्रभाव लक्ष्य किया जा सकता है। अँग्रेज़ी के मुहावरों, लोकोक्तियों के साथ ही निक्षिप्त वाक्य-रचना इसका स्पष्ट प्रमाण है। राजभाषा हिंदी में एक ही वाक्य में दो-तीन भाषाओं के शब्द सहजता से देखे जा सकते हैं। अपभ्रंश  की तुलना में कुछ अन्य विशेषताएँ भी हिंदी में देखी जा सकती हैं, जैसे, हिंदी में भाषा के साथ प्रयुक्त होने वाली क्रिया भी लिंग-भेद के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। संस्कृत में तीन वचन हैं—एकवचन, द्विवचन और बहुवचन। हिंदी में अपभ्रंश के समान दो ही वचन हैं—एकवचन और बहुवचन। संस्कृत और अपभ्रंश में विशेषण के अनुरूप ही लिंग, वचन और कारक में भी परिवर्तन हो जाता था, हिंदी में इस प्रकार का परिवर्तन लगभग समाप्त हो गया। हिंदी में केवल आकारांत विशेषणों में ही परिवर्तन होता है, उसमें भी अपवाद (बढ़िया) मिल जाते हैं। अपभ्रंश की तुलना में हिंदी में क्रियापद सरल भी हो गए हैं। यद्यपि पिछले कुछ वर्षों से करिए (कीजिए), मेरे को (मुझे), तेरे को, मेरे से, तेरे से, तेरे में आदि रूपों का प्रचार बढ़ रहा है, तथापि प्रेस, रेडियो तथा शिक्षा के प्रचार से हिंदी का मानक रूप स्थिर होता जा रहा है। यद्यपि दूरदर्शन के नए-नए चैनलों के धारावाहिक इस प्रक्रिया को कठिन बना रहे हैं। एक बात और, प्रारंभिक काल में ही हिंदी की विभिन्न बोलियों का स्वतंत्र व्याकरणिक अस्तित्व दिखाई देने लगा था। मध्यकाल में यह प्रवृत्ति और भी बढ़ गई। आज अनेक बोलियों के व्याकरणिक रूप निकटवर्ती बोलियों से पर्याप्त भिन्न हो गए हैं। उदाहरणार्थ, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली को आज आसानी से स्वतंत्र भाषा की संज्ञा दी जा सकती है।

     

    शब्द भंडार

     

    प्रारंभिक काल का शब्द भंडार प्रारंभिक वर्षों में अपभ्रंश का ही था। धीरे-धीरे उसमें कुछ परिवर्तन आए। भक्ति आंदोलन का आरंभ हो जाने के कारण तत्सम शब्दों का प्रयोग अपभ्रंश की तुलना में बढ़ने लगा था। तद्भव शब्दों का तो ख़ूब प्रचलन खड़ी बोली, पंजाबी, अवधी तथा दक्खिनी के शब्दों का सम्मिश्रण मिलता है। इ था हो, देशज शब्दों की भी कमी न थी। उस युग की हिंदी में डिंगल, मैथिली, ब्रज, मुसलमानों के भारत में आने के कारण अरबी, फ़ारसी, तुर्की व पश्तों के भी कुछ शब्द हिंदी में आ गए। इसके साथ ही यह संभावना भी है कि समाज की परिस्थिति में परिवर्तन के कारण अनेक शब्द अनावश्यक होने के कारण हिंदी से निकल गए होंगे।

     

    मध्यकाल में भक्ति-आंदोलन अपने चरम पर था, अतः तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक होने लगा। इस काल में यूरोप से भी कुछ संपर्क होने लगा था, अतः उनके साथ पुर्तगाली, स्पेनी, फ़्रांसीसी और अँग्रेज़ी शब्द हिंदी में आ गए। अरबी-फ़ारसी के लोक-प्रचलित शब्दों का अब खुलकर प्रयोग होने लगा। अनेक ऐसे विदेशी शब्द हिंदी की प्रकृति के अनुसार बोले जाने लगे; जैसे—उमर-दराज, हुकुम, हद्द, पातसाह, ग़रीब-निवाज़, इज़ाफ़ा, फ़ौज आदि। डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार, इस काल में आते-आते काफ़ी शब्द फ़ारसी (लगभग 3500), अरबी (लगभग 2500), पश्तो (लगभग 50) तथा तुर्की (लगभग 125) हिंदी में आ गए और इन आगत विदेशी शब्दों की संख्या लगभग 6000 से अधिक हो गई।

     

    आधुनिक काल में हिंदी शब्द भंडार में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। अँग्रेज़ी का प्रचार-प्रसार बढ़ा है, फलतः अनेक अँग्रेज़ी शब्द तेज़ी से हिंदी शब्द भंडार का अंग बनते जा रहे हैं। कोट, पैंट, रेडियो, टेलिफ़ोन, रेल जैसे शब्दों का प्रयोग अशिक्षित हिंदी भाषी भी निस्संकोच करता है। 1900 ई. के आसपास आर्य समाज का प्रभाव तेज़ी से बढ़ा और उसके बाद अँग्रेज़ों के विरुद्ध राष्ट्रीय पुनरुत्थान की विचारधारा के कारण तत्सम शब्दावली का प्रयोग बढ़ा। इस कारण अनेक तद्भव शब्द हिंदी से निकल गए। द्विवेदी युग और विशेषतः छायावाद युग का साहित्य इस तथ्य का प्रमाण है कि हिंदी में पर्याप्त तत्सम शब्दावली का प्रयोग होने लगा। 1935 ई. के बाद प्रगतिवादी आंदोलन के समय तद्भव शब्दावली का प्राधान्य हुआ। स्वाधीनता के बाद देश ने अनेक क्षेत्रों में व्यापक प्रगति की है। हिंदी आज गणित, रसायनशास्त्र, जीवविज्ञान, प्राणिविज्ञान, भौतिकी, मनोविज्ञान, इंजीनियरिंग, विधि आदि की भाषा बनी है। परिणामस्वरूप हज़ारों की संख्या में नए शब्द बने हैं। हिंदी में पारिभाषिक शब्दों की संख्या आज एक लाख से अधिक है। साहित्य में कहानी, उपन्यास आदि में तद्भव शब्दावली का अधिक प्रयोग हो रहा है, तो आलोचना की भाषा तत्समबहुला है। तात्कालिक आवश्यकताओं के कारण भी अनेक नए शब्द बने हैं और पुराने शब्द जैसे—सदन, आकाशवाणी आदि नए अर्थों में प्रयुक्त हो रहे हैं। फ़िल्मों ने हिंदी को 'फ़िल्माना' शब्द दिया है, तो राजनीतिक क्षेत्र ने 'आयाराम गयाराम' को नया अर्थ दिया है। हिंदी में अनेक नई प्रयुक्तियों का विकास हुआ है। खेल, बाज़ार भाव, विज्ञापन, कार्यालय आदि की दृष्टि से नए-नए शब्द हिंदी में आए हैं, और निर्मित हुए हैं, जैसे अनापत्ति, एवजी, ज्ञापन, निर्वचन, निःसंवर्ग, न्यास, पुनर्स्थापन, ग्रेड, एजेंसी, बैलिफ, बैंकर, राजपत्र, टी, डिसप्शन, फ्लिक, सर्व, बुशशाट, ओवर, अपील, कट, कवर, ड्राइव, गुडलैंथ, क्लेकोर्ट, एडवटिज, उपयोगी, बाज़ारी, मिली आदि। इतना ही नहीं, शब्द रचना की दृष्टि से भी नई प्रवृत्तियाँ उभरकर सामने आई हैं। हिंदी ही नहीं अँग्रेज़ी, अरबी-फ़ारसी के उपसर्गों और प्रत्ययों का तो हिंदी प्रयोग कर ही रही है, संकर समास भी ख़ूब बन रहे हैं, जैसे रेलगाड़ी, अजायबघर, दलबंदी, देशनिकाला, पावरोटी आदि। राजभाषा हिंदी में तो इनका ख़ूब प्रचार हो रहा है। जैसे—उपरजिस्ट्रार, अरद्द, मुद्राबंद, स्टांपित, डिक्रीदार, अरजिस्ट्रीकृत आदि। इस प्रकार अनेकानेक नए प्रभावों को ग्रहण कर हिंदी शब्द-भंडार की दृष्टि से समृद्ध से समृद्धतर होती जा रही है।

     

    साहित्य

     

    आदिकाल में संस्कृत और अपभ्रंश के अतिरिक्त डिंगल, पिंगल, मैथिली, खड़ी बोली आदि के साहित्य की रचना हुई। सिद्धों, नाथों और जैनियों के धार्मिक साहित्य की भाषा अपभ्रंश मिश्रित थी। सिद्धों में सरहपा, शबरपा, लुइपा; नाथों में गोरख, चौरंगी, बालानाथ तथा जैनियों में धर्मसूरि, पुष्पदंत, हेमचंद्र आदि प्रसिद्ध हैं। डिंगल साहित्य में 'सीसोदिया री ख्यात' तथा 'राठौडा री ख्यात' आदि प्रसिद्ध हैं। पिंगल का क्षेत्र पूर्वी राजस्थान व गुजरात से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ था। रासो काव्यधारा में पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव राम्रो, खुमाण रासो आदि प्रसिद्ध हैं। परंतु अधिकांश रासो साहित्य की प्रामाणिकता संदिग्ध है। विद्यापति 'मैथिली कोकिल' कहे जाते हैं। मुल्ला दाऊद, अमीर ख़ुसरो, बंदानवाज़ गैसूदराज आदि मुसलमान कवियों की रचनाएँ भी उल्लेख्य हैं। ख़ुसरो की खड़ीबोली का एक उदाहरण द्रष्टव्य है—

     

    एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा। 

    चारों ओर वह थाल फिरे, मोती उससे एक न गिरे॥ (उत्तर-आकाश)

     

    मध्यकाल साहित्य की दृष्टि से पर्याप्त समृद्ध है। इस काल की मुख्य भाषाएँ अवधी और ब्रज रहीं। तुलसीदास अवधी के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं और 'रामचरितमानस' अद्वितीय रचना। जायसी, कुतबन, मंझन भी अवधी के उल्लेख्य कवि हैं। ब्रजभाषा काव्य की दृष्टि से सूरदास, नंददास, तुलसीदास, नरोत्तमदास, केशव, बिहारी, देव,भूषण, मतिराम् आदि उल्लेख्य है। खड़ी बोली के रूप दादू, मलूकदास, रहीम जैसे कवियों के काव्य में मिल जाते हैं। कबीर आदि मिश्रित भाषा (सधुक्कड़ी) के कवि है। बुरहानुद्दीन, नुसरती, मुल्ला वजही, वली और उनके बाद मीर, सौदा, ग़लिब, जौक, दाग आदि उर्दू के प्रसिद्ध कवि हैं। गद्य साहित्य में व्रज भाषा में 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता, 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' तथा खड़ी बोली में रामप्रसाद निरंजनी का 'योग वासिष्ठ' तथा दौलत राम का 'पद्म पुराण' विशेष रूप से उल्लेख्य हैं।

     

    आधुनिक काल खड़ी बोली का काल है। इस काल में दिल्ली की भाषा खड़ी बोली-ब्रज, अवधी आदि को पीछे छोड़ प्रायः एक मात्र 'हिंदी क्षेत्र' की साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम और हिंदी भाषा का प्रतिनिधि रूप बन गई है।” (भोलानाथ तिवारी) अपवादतः जगन्नाथ दास 'रत्नाकर' तथा सत्यनारायण 'कविरत्न' ने ब्रजभाषा में श्रेष्ठ रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। खड़ी बोली पर आधारित मानक हिंदी में रचना करने वाले कवियों में प्रमुख हैं—भारतेंदु, हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, बच्चन, दिनकर, अज्ञेय आदि। गद्य लेखकों में भारतेंदु, प्रेमचंद, प्रसाद, जैनेंद्र, अमृतलाल नागर, यशपाल, अश्क, मोहन राकेश, कमलेश्वर, अज्ञेय आदि नाम उल्लेखनीय हैं। विधा की दृष्टि से इस भाषा में आज कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, आलोचना, जीवनी, यात्रा-साहित्य, संस्मरण, रिपोर्ताज, रेखाचित्र, लघुकथा आदि साहित्यिक रूपों का विकास हो रहा है। इस प्रकार आधुनिक युग में हिंदी का विकास तीव्र गति से हो रहा है।

     

    हिंदी ने अपने उद्भव से आज तक लंबी विकास-यात्रा तय की है। ध्वनि, व्याकरण-रूप-रचना, वाक्य-रचना, शब्द भंडार आदि सभी दृष्टियों से हिंद स्वयं को युगानुकूल बनाने में सफल रही है। यह सत्य है कि आज हिंदी पर अँग्रेज़ी भाषा का अत्यधिक प्रभाव दृष्टिगत होता है, परंतु आज विश्व 'लघु विश्व' में परिवर्तित हो गया है अतः इस प्रकार के प्रभाव को नितांत अवांछित नहीं माना जा सकता। वर्तमान युग की चुनौतियों को भाषाई दृष्टि से स्वीकार करते हुए भी यदि हिंदी एक सीमा तक विदेशी, विशेषतः अँग्रेज़ी प्रभाव को कुछ कम कर सके तो निश्चय ही यह एक और सफलता होगी। अपने विकास-क्रम में हिंदी ने अनेक हिंदीतर भारतीय, भाषाओं से भी प्रभाव ग्रहण किया है। यह प्रभाव हिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ण मान्यता दिलाने के प्रयास की दृष्टि से आवश्यक भी है। हिंदी भाषा को भविष्य निश्चय ही उज्ज्वल है।                                                                                                         

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